वाराणसी: संत शिरोमणि गुरु रविदास जी की जयंती के अवसर पर काशी इस समय अभूतपूर्व आध्यात्मिक उल्लास और श्रद्धा के महासागर में डूबी हुई है। शहर की गलियां, घाट, मंदिर प्रांगण और आयोजन स्थल—हर ओर भक्ति, सेवा और सामाजिक समरसता का जीवंत दृश्य देखने को मिल रहा है। गुरु रविदास जी के विचारों से अनुप्राणित श्रद्धालु उनके चरणों में शीश नवाकर स्वयं को धन्य मान रहे हैं। काशी मानो केवल एक नगर नहीं, बल्कि आस्था का विराट तीर्थ बन चुकी है, जहां हर सांस में भक्ति और हर कदम में सेवा का भाव झलक रहा है।
इस महाआयोजन की व्यापकता और भव्यता का अनुमान इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि इस वर्ष गुरु रविदास जयंती पर 15 से 20 लाख श्रद्धालुओं के काशी पहुंचने की संभावना जताई गई है। देश के कोने-कोने से आए भक्तों के साथ-साथ अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन सहित अनेक देशों से एक हजार से अधिक एनआरआई श्रद्धालु भी इस पावन अवसर पर वाराणसी पहुंचे हैं। विदेशी धरती से आए ये श्रद्धालु भारतीय संस्कृति, संत परंपरा और गुरु रविदास जी के मानवतावादी संदेश से गहरे रूप से जुड़े दिखाई दे रहे हैं।
श्रद्धालुओं की सुविधा, सुरक्षा और सुव्यवस्थित आवागमन को लेकर व्यापक इंतजाम किए गए हैं। शहर में 150 से अधिक टेंट सिटी विकसित की गई हैं, जहां ठहरने, भोजन, चिकित्सा और स्वच्छता की समुचित व्यवस्थाएं की गई हैं। इसके साथ ही आधा दर्जन से अधिक विशाल लंगर स्थल चौबीसों घंटे सेवा में लगे हुए हैं, जहां जाति, वर्ग और भेदभाव से ऊपर उठकर हजारों श्रद्धालु एक साथ प्रसाद ग्रहण कर रहे हैं। सेवा भाव का यह दृश्य गुरु रविदास जी के “मानव-मानव एक समान” के संदेश को सजीव रूप में प्रस्तुत कर रहा है।
मुख्य सत्संग और धार्मिक सभाओं के लिए अत्याधुनिक तकनीक से सुसज्जित जर्मन हैंगर पंडाल तैयार किया गया है, जिसमें एक साथ बड़ी संख्या में श्रद्धालु प्रवचन और सत्संग का लाभ उठा सकेंगे। भव्य मंच, साउंड सिस्टम और सुव्यवस्थित बैठने की व्यवस्था इस आयोजन को और भी गरिमामयी बना रही है।
गुरु रविदास जयंती का मुख्य समारोह 1 फरवरी को मनाया जाएगा। पूर्णिमा तिथि के साथ सुबह 05:52 बजे से प्रमुख धार्मिक अनुष्ठानों का शुभारंभ होगा। संत निरंजन दास चिमा ने जानकारी देते हुए बताया कि इस दौरान अमृतवाणी का पाठ, निशान साहब की रस्म, विशेष आरती, दिनभर सत्संग तथा विशाल लंगर का आयोजन किया जाएगा। शाम के समय भव्य और आकर्षक झांकियों का स्वागत होगा, जो गुरु रविदास जी के जीवन, उनके उपदेशों और सामाजिक चेतना को दर्शाएंगी।
मुख्य कार्यक्रमों के बाद संत निरंजन दास महाराज गुरु रविदास जी की जन्मस्थली सीर गोवर्धनपुर के लिए रवाना हुए, जिसे श्रद्धालु स्नेहपूर्वक ‘रैदासियों की काशी’ कहते हैं। यहां भी जयंती के अवसर पर श्रद्धा और उल्लास का अद्भुत संगम देखने को मिल रहा है। मंदिर परिसर में पहुंचते ही उनके अनुयायियों ने फूल-मालाओं से उनका भव्य स्वागत किया। “जो बोले सो निर्भय, गुरु रविदास की जय” के गगनभेदी नारों से पूरा क्षेत्र गूंज उठा और वातावरण भक्तिमय ऊर्जा से भर गया।
जयंती के उपलक्ष्य में काशी में तीन दिवसीय धार्मिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों की भव्य श्रृंखला भी आयोजित की जा रही है। 30 और 31 जनवरी को नगवां स्थित संत रविदास पार्क में 26 घंटे का अखंड सांस्कृतिक कार्यक्रम चल रहा है, जिसमें देशभर से आए 50 से अधिक कलाकार भजन, शास्त्रीय संगीत, लोक गायन और नृत्य की प्रस्तुतियों से श्रद्धालुओं को भावविभोर कर रहे हैं। कलाकारों की सुर-लहरियों और भक्तिमय नृत्य ने पूरे परिसर को आध्यात्मिक रंग में रंग दिया है।
दर्शन-पूजन के लिए श्रद्धालुओं की आस्था का आलम यह है कि मंदिर परिसर से बाहर तक लंबी कतारें लगी हुई हैं। अनुशासित ढंग से भक्त गुरु रविदास जी के दर्शन कर रहे हैं और प्रसाद ग्रहण कर रहे हैं। संत निरंजन दास महाराज ने दर्शन के उपरांत भक्तों से संवाद किया और सभी को आशीर्वाद प्रदान किया। श्रद्धालुओं के चेहरों पर संतोष, श्रद्धा और आनंद साफ झलक रहा है।
गुरु रविदास जयंती के इस विराट आयोजन ने काशी को न केवल आध्यात्मिक ऊर्जा से ओत-प्रोत कर दिया है, बल्कि समाज में समानता, भाईचारे और सेवा की भावना को भी सशक्त रूप से स्थापित किया है। यह आयोजन गुरु रविदास जी के उस कालजयी संदेश को दोहराता है, जिसमें मानवता ही सर्वोच्च धर्म और समरस समाज ही सच्ची भक्ति मानी गई है।
