आज जीवित्पुत्रिका व्रत आज माताएं रखेंगी निर्जला व्रत जीमूतवाहन की पूजा के साथ पुत्रों की दीर्घायु की कामना
वाराणसी और आसपास के क्षेत्रों में आज शनिवार को जीवित्पुत्रिका व्रत रखा जा रहा है। संतान की दीर्घायु, आरोग्य, सुख और कल्याण की कामना से माताएं इस व्रत को श्रद्धा और आस्था के साथ करती हैं। धार्मिक परंपरा में जीवित्पुत्रिका व्रत को जितिया व्रत के नाम से भी जाना जाता है। इस अवसर पर महिलाएं पूरे दिन निर्जला व्रत रखकर शाम के समय राजा जीमूतवाहन का विधि विधान से पूजन करती हैं और व्रत कथा सुनती हैं। ज्योतिषाचार्य पं राकेश पाण्डेय के अनुसार आश्विन कृष्ण पक्ष की प्रदोष व्यापिनी अष्टमी तिथि में जीवित्पुत्रिका व्रत करने की परंपरा है। निर्णयसिंधु में भी प्रदोष काल में अष्टमी तिथि मिलने पर जीमूतवाहन की पूजा का उल्लेख मिलता है। इसी आधार पर इस बार शनिवार को जीवित्पुत्रिका व्रत करना श्रेष्ठ बताया गया है।
आज शाम 4 बजकर 52 मिनट से 6 बजकर 20 मिनट तक पूजा
ज्योतिषाचार्य के अनुसार आज शनिवार को जीवित्पुत्रिका व्रत की पूजा के लिए शाम 4 बजकर 52 मिनट से 6 बजकर 20 मिनट तक का समय बताया गया है। इस अवधि में आर्द्रा नक्षत्र रहेगा। व्रत रखने वाली महिलाएं इसी समय के दौरान जीमूतवाहन का पूजन विधि विधान से कर सकती हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार माताएं यह कठिन व्रत अपने पुत्र की रक्षा, दीर्घायु, आरोग्य और जीवन में सुख समृद्धि की कामना से करती हैं। पूजा के दौरान परिवार और संतान के मंगल की प्रार्थना की जाती है। जीवित्पुत्रिका व्रत की परंपरा में मातृत्व की श्रद्धा और संतान के प्रति मंगलकामना को विशेष महत्व दिया गया है।
एक दिन पहले से शुरू हो जाती है व्रत की तैयारी
जीवित्पुत्रिका व्रत की धार्मिक परंपरा में व्रत से एक दिन पहले ब्रह्ममुहूर्त में जल, अन्न और फल ग्रहण करने की बात कही गई है। इसके बाद अष्टमी तिथि में महिलाएं पूरे दिन और रात निर्जला व्रत करती हैं। निर्जला व्रत होने के कारण इस दौरान पानी का सेवन भी नहीं किया जाता है। व्रत की कठिन साधना के पीछे संतान के दीर्घ जीवन और परिवार के कल्याण की धार्मिक भावना जुड़ी हुई है। व्रत रखने वाली महिलाएं अपनी श्रद्धा और पारिवारिक परंपरा के अनुसार पूजा की तैयारी करती हैं।
कुशा से निर्मित जीमूतवाहन की प्रतिमा का होता है पूजन
जीवित्पुत्रिका व्रत के दिन शाम के समय जीमूतवाहन की पूजा की जाती है। परंपरा के अनुसार कुशा से जीमूतवाहन की प्रतिमा तैयार कर उसका पूजन किया जाता है। पूजा में जल, पंचामृत, रक्षासूत्र, चंदन, पुष्प, अक्षत, धूप, दीप और नैवेद्य सहित अन्य पूजन सामग्री अर्पित की जाती है। इसके साथ ही व्रत की परंपरा में मिट्टी और गाय के गोबर से चील और सियारिन की प्रतिमाएं बनाने का भी उल्लेख मिलता है। इन प्रतिमाओं के माथे पर लाल सिंदूर का टीका लगाया जाता है और इसके बाद विधि के अनुसार पूजा संपन्न की जाती है।
जीमूतवाहन की कथा सुनने की है परंपरा
पूजन के बाद जीवित्पुत्रिका व्रत की कथा सुनने की परंपरा है। व्रत कथा में राजा जीमूतवाहन से जुड़ी कथा का वर्णन किया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार जीमूतवाहन त्याग, करुणा और परोपकार के प्रतीक माने जाते हैं। कथा के माध्यम से माताएं अपने पुत्रों और पौत्रों की लंबी आयु तथा उनके कल्याण की कामना करती हैं। पूजा और कथा के बाद ब्राह्मण को दान दक्षिणा देने की परंपरा भी बताई गई है। धार्मिक विश्वास के अनुसार दान दक्षिणा से परिवार के सुख और समृद्धि की कामना की जाती है। इन मान्यताओं को धार्मिक आस्था और परंपरा के रूप में ही देखा जाता है।
जीमूतवाहन से जुड़ी पौराणिक कथा का महत्व
पौराणिक परंपरा में जीमूतवाहन को त्याग और प्राणियों के प्रति करुणा के लिए स्मरण किया जाता है। जीवित्पुत्रिका व्रत की कथा में उनके जीवन से जुड़ा प्रसंग माताओं के बीच श्रद्धा के साथ सुना और सुनाया जाता है। कथा का मूल भाव त्याग, परोपकार, वचन पालन और जीवन की रक्षा से जुड़ा है। यही कारण है कि जीवित्पुत्रिका व्रत में केवल पूजा और उपवास ही नहीं बल्कि कथा श्रवण को भी महत्वपूर्ण धार्मिक परंपरा माना गया है।
पूजन सामग्री पहले से रखें तैयार
व्रत और पूजन करने वाली महिलाओं को पूजा की सामग्री पहले से तैयार रखने की सलाह दी जाती है। पूजन में जल, पंचामृत, रक्षासूत्र, चंदन, पुष्प, अक्षत, धूप, दीप और नैवेद्य रखा जाता है। इसके अलावा जीमूतवाहन की कुशा से निर्मित प्रतिमा तथा परंपरा के अनुसार मिट्टी और गाय के गोबर से तैयार की जाने वाली चील और सियारिन की प्रतिमाओं की व्यवस्था की जाती है। पूजा के दौरान परिवार की परंपरा और स्थानीय धार्मिक विधि के अनुसार अन्य सामग्री भी शामिल की जा सकती है।
रविवार सुबह 7 बजकर 27 मिनट के बाद होगा पारणा
निर्जला जीवित्पुत्रिका व्रत का पारणा अगले दिन रविवार को किया जाएगा। उपलब्ध पंचांग संबंधी जानकारी के अनुसार रविवार सुबह 7 बजकर 27 मिनट के बाद पारणा करना श्रेयस्कर बताया गया है। व्रत रखने वाली महिलाओं को पारणा से पहले अपने स्थानीय पंचांग में समय की पुष्टि कर लेना उचित रहेगा क्योंकि स्थान के अनुसार सूर्योदय और तिथि संबंधी गणना में अंतर हो सकता है। पारणा के बाद ही व्रत पूर्ण माना जाता है और महिलाएं अन्न जल ग्रहण करती हैं।
आस्था और मातृत्व की भावना से जुड़ा है जीवित्पुत्रिका व्रत
जीवित्पुत्रिका व्रत भारतीय धार्मिक परंपरा में मातृत्व की भावना और संतान के प्रति मंगलकामना से जुड़ा महत्वपूर्ण व्रत माना जाता है। आज शनिवार को बड़ी संख्या में महिलाएं निर्जला उपवास रखकर जीमूतवाहन का पूजन करेंगी और व्रत कथा का श्रवण करेंगी। पूजा के दौरान पुत्रों की दीर्घायु, आरोग्य और सुख की कामना की जाएगी। कठिन निर्जला व्रत के बीच श्रद्धा, संयम और विश्वास के साथ निभाई जाने वाली यह परंपरा पीढ़ियों से परिवारों में चली आ रही धार्मिक मान्यताओं का हिस्सा है।
LATEST NEWS