अक्षय तृतीया से बाबा विश्वनाथ पर रजत जलधारी, गंगाजल और इत्र की फुहार से मिलेगी शीतलता
वाराणसी। काशी विश्वनाथ मंदिर में सदियों पुरानी परंपरा के तहत इस वर्ष भी अक्षय तृतीया से भगवान भोलेनाथ को शीतलता प्रदान करने के लिए रजत जलधारी स्थापित की जाएगी। वैशाख शुक्ल पक्ष की तृतीया से शुरू होकर यह धार्मिक अनुष्ठान श्रावण पूर्णिमा तक लगातार चलता है, जिसमें बाबा विश्वनाथ का अभिषेक गंगाजल, गुलाब जल और इत्र की फुहार से किया जाता है।
गर्मी से राहत देने की अनूठी परंपरा
गर्मी के मौसम में भगवान शिव को शीतलता प्रदान करने के उद्देश्य से यह परंपरा निभाई जाती है। रजत जलधारी दरअसल चांदी का एक विशेष फव्वारा होता है, जिसे शिवलिंग के ऊपर स्थापित किया जाता है। इससे निरंतर जल की धारा प्रवाहित होती रहती है, जो बाबा का अभिषेक करती है।
गंगाजल के साथ गुलाब जल और इत्र का मिश्रण
जलधारी मंदिर परिसर में बने जलटैंक से जुड़ी होती है, जिसमें पाइप के माध्यम से लगातार गंगाजल पहुंचाया जाता है। इसके साथ ही जल में गुलाब जल और इत्र का भी मिश्रण किया जाता है, जिससे वातावरण सुगंधित और पवित्र बना रहता है।
मध्यान आरती के बाद शुरू होता है अभिषेक
मंदिर के अर्चक चेत नारायण के अनुसार, अक्षय तृतीया से ग्रीष्म ऋतु का प्रभाव बढ़ने लगता है। ऐसे में मध्यान भोग आरती के बाद से पूरे दिन जलधारी के माध्यम से बाबा का अभिषेक किया जाता है, जो निरंतर चलता रहता है।
300 साल से अधिक पुरानी परंपरा
बताया जाता है कि यह परंपरा लगभग 300 वर्षों से भी अधिक समय से चली आ रही है। मंदिर निर्माण के समय से ही हर वर्ष ग्रीष्मकाल में जलधारी स्थापित की जाती है। भक्तों का मानना है कि इससे भगवान भोलेनाथ को गर्मी से राहत मिलती है और उनकी कृपा प्राप्त होती है।
भक्तों द्वारा अर्पित किया जाता है लंगड़ा आम
इस दौरान भक्त भगवान को लंगड़ा आम का भोग भी अर्पित करते हैं, जो वाराणसी की विशेष पहचान है। यह परंपरा भी जलधारी आयोजन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती है।
तैयारियों में जुटा मंदिर प्रशासन
मंदिर प्रशासन इस आयोजन को लेकर तैयारियों में जुट गया है। हर वर्ष की तरह इस बार भी बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के आने की उम्मीद है। प्रशासन द्वारा सुरक्षा और व्यवस्थाओं को लेकर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।
आस्था और संस्कृति का अद्भुत संगम
रजत जलधारी का यह आयोजन केवल धार्मिक अनुष्ठान ही नहीं, बल्कि काशी की सांस्कृतिक विरासत का भी प्रतीक है। यह परंपरा भक्तों को आध्यात्मिक शांति प्रदान करती है और उन्हें भगवान शिव के प्रति अपनी श्रद्धा प्रकट करने का अवसर देती है।
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