काशी विश्वनाथ मंदिर का इतिहास और आध्यात्मिक महत्व | बाबा विश्वनाथ धाम की अमर गाथा

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सनातन आस्था का केंद्र काशी विश्वनाथ मंदिर, जहाँ इतिहास और आध्यात्म एक साथ जीवित हैं

वाराणसी (काशी): दुनिया के सबसे प्राचीन जीवित शहरों में से एक, काशी, केवल एक भौगोलिक स्थान नहीं है; यह भारतीय सनातन संस्कृति का वह स्पंदन है जो सदियों से अविचल और अविरल है। इस पवित्र नगरी के केंद्र में, जिसे स्वयं भगवान शिव ने अपने त्रिशूल पर धारण किया हुआ है, विराजमान हैं ‘बाबा विश्वनाथ’। काशी विश्वनाथ मंदिर केवल आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि भारत के आध्यात्मिक और ऐतिहासिक लचीलेपन का जीवंत प्रमाण है। गंगा के पश्चिमी तट पर स्थित यह ज्योतिर्लिंग, द्वादश ज्योतिर्लिंगों में प्रमुख माना जाता है, जहाँ दर्शन मात्र से ही जन्म-जन्मांतर के पाप धुल जाते हैं और जीव को मोक्ष की प्राप्ति होती है।

बाबा विश्वनाथ का इतिहास संघर्ष और पुनरुत्थान की एक ऐसी दास्तां है जो रोंगटे खड़ी कर देती है। इतिहास के पन्नों को पलटें तो पता चलता है कि इस मंदिर ने कई बार विदेशी आक्रांताओं की क्रूरता को झेला है। 11वीं सदी से लेकर 17वीं सदी तक, कुतुबुद्दीन ऐबक से लेकर औरंगजेब तक, कई शासकों ने इस मंदिर को ध्वस्त कर इसकी पवित्रता को खंडित करने का प्रयास किया। लेकिन, काशी की आस्था ईंट-पत्थरों से नहीं, बल्कि जनमानस के विश्वास से बनी थी। हर बार विध्वंस के बाद, बाबा का यह धाम और अधिक भव्यता के साथ खड़ा हुआ। वर्तमान मंदिर का निर्माण 1780 में इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होलकर द्वारा करवाया गया था, जो उनकी शिव भक्ति और अदम्य साहस का प्रतीक है। बाद में, पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह ने मंदिर के शिखरों को स्वर्ण से मढ़वाया, जिससे इसे ‘स्वर्ण मंदिर’ की भी उपाधि मिली। यह इतिहास हमें बताता है कि तलवार के बल पर इमारतों को तोड़ा जा सकता है, लेकिन आस्था के हिमालय को नहीं हिलाया जा सकता।

धार्मिक दृष्टिकोण से देखें तो काशी विश्वनाथ का महत्व शब्दों से परे है। स्कंद पुराण के काशी खंड में उल्लेख है कि प्रलय काल में भी काशी का लोप नहीं होता। यहाँ प्राण त्यागने वाले को स्वयं भगवान शिव तारक मंत्र देकर मोक्ष प्रदान करते हैं। मंदिर के गर्भगृह में स्थापित शिवलिंग स्वयंभू है, और यहाँ होने वाली आरती—विशेषकर भोर में होने वाली ‘मंगला आरती’—का अनुभव अलौकिक होता है। जब भस्म, चंदन और बेलपत्र से बाबा का श्रृंगार होता है और डमरूओं की गूंज गर्भगृह में गूंजती है, तो भक्तों को साक्षात् शिव के कैलाश में होने का आभास होता है। यहाँ नंदी बैल की विशाल प्रतिमा, जो ज्ञानवापी की ओर मुख करके बैठी है, आज भी उस प्रतीक्षा और धैर्य का प्रतीक है जो हिंदू धर्म की सहनशीलता को दर्शाता है।

21वीं सदी में काशी विश्वनाथ धाम ने एक नया और भव्य स्वरूप धारण किया है, जो प्राचीनता और आधुनिकता का अद्भुत संगम है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विजन के तहत निर्मित ‘काशी विश्वनाथ कॉरिडोर’ ने मंदिर के पुराने, संकरे रास्तों को एक विशाल और सुगम परिसर में बदल दिया है। पहले जहाँ भक्तों को तंग गलियों से होकर गुजरना पड़ता था, अब वहीं गंगा घाट (ललिता घाट) से सीधे बाबा के दरबार तक का रास्ता सुगम हो गया है। लगभग 5 लाख वर्ग फीट में फैला यह कॉरिडोर अब केवल एक मंदिर परिसर नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक केंद्र बन गया है, जहाँ मुमुक्षु भवन, वैदिक केंद्र और यात्री सुविधा केंद्र जैसी व्यवस्थाएं हैं। इस नवनिर्माण ने काशी की उस खोई हुई गरिमा को पुनः स्थापित किया है, जहाँ माँ गंगा का जल लेकर भक्त सीधे, बिना किसी अवरोध के, अपने आराध्य के चरणों में अर्पित कर सकते हैं।
अंततः, काशी विश्वनाथ मंदिर केवल पत्थर की दीवारों के भीतर सीमित नहीं है; यह एक अहसास है जो हर सनातनी के दिल में धड़कता है। यहाँ की हवाओं में ‘हर हर महादेव’ का जो उद्घोष गूंजता है, वह केवल एक नारा नहीं, बल्कि जीवन की नश्वरता और शिव की शाश्वतता का प्रमाण है। चाहे आप आस्तिक हों या नास्तिक, काशी विश्वनाथ का प्रांगण आपको एक ऐसी शांति देता है जहाँ जीवन की भागदौड़ थम सी जाती है। यह मंदिर हमें सिखाता है कि समय बदलता है, शासक बदलते हैं, लेकिन सत्य और शिव हमेशा अडिग रहते हैं। बाबा विश्वनाथ का यह धाम युगों-युगों तक मानवता को मुक्ति और शांति का मार्ग दिखाता रहेगा।

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