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केंद्रीय बजट से पहले घाटे का बजट चर्चा में, जानें इसके नफा-नुकसान

केंद्रीय बजट से पहले घाटे का बजट चर्चा में, जानें इसके नफा-नुकसान

एक फरवरी को केंद्रीय बजट पेश होगा, जिसके साथ घाटे के बजट की चर्चा तेज है; यह हमेशा नकारात्मक नहीं होता।

एक फरवरी को केंद्रीय बजट 2026 पेश किया जाएगा और इसके साथ ही आर्थिक शब्दावली से जुड़ी कई चर्चाएं एक बार फिर तेज हो गई हैं। बजट के दौरान अक्सर एक शब्द सुनने को मिलता है, घाटे का बजट। आम तौर पर यह शब्द सुनते ही लोगों के मन में चिंता पैदा होती है, लेकिन अर्थशास्त्र की दृष्टि से घाटे का बजट हमेशा नकारात्मक ही हो, ऐसा जरूरी नहीं है। भारत ही नहीं बल्कि दुनिया के कई देश अलग अलग परिस्थितियों में घाटे का बजट पेश करते रहे हैं।

घाटे का बजट उस स्थिति को कहा जाता है जब सरकार की अनुमानित कुल आय, उसके प्रस्तावित कुल खर्च से कम होती है। यानी सरकार जितना खर्च करने की योजना बनाती है, उतना राजस्व उसे टैक्स, शुल्क और अन्य स्रोतों से मिलने की उम्मीद नहीं होती। यह स्थिति अक्सर तब बनती है जब सरकार को विकास योजनाओं, सामाजिक कल्याण कार्यक्रमों, शिक्षा, स्वास्थ्य, रक्षा या आपदा प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में अधिक खर्च करना पड़ता है। ऐसे समय में सरकार अतिरिक्त खर्च को पूरा करने के लिए घाटे को स्वीकार करती है। इसलिए घाटे का बजट न तो पूरी तरह अच्छा माना जाता है और न ही पूरी तरह खराब। इसका असर इस बात पर निर्भर करता है कि घाटा किस उद्देश्य से और किन क्षेत्रों में किया जा रहा है।

घाटे का बजट बनने के पीछे कई कारण होते हैं। आर्थिक मंदी के दौर में टैक्स संग्रह कम हो जाता है, जबकि बेरोजगारी भत्ता और राहत योजनाओं पर खर्च बढ़ जाता है। इसके अलावा जनसंख्या वृद्धि, महंगाई, सब्सिडी का बोझ, चुनावी वादे और बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट भी सरकारी खर्च को बढ़ाते हैं। कई बार सरकार जानबूझकर घाटे का बजट लाती है ताकि बाजार में मांग बढ़े, निवेश को प्रोत्साहन मिले और अर्थव्यवस्था को गति दी जा सके। इस नजरिये से देखा जाए तो घाटे का बजट आर्थिक नीति का एक अहम उपकरण भी बन जाता है।

जब सरकार घाटे का बजट पेश करती है तो उसे इस अंतर को भरने के लिए अतिरिक्त संसाधन जुटाने पड़ते हैं। इसका सबसे आम तरीका उधार लेना होता है। सरकार देश के भीतर बैंकों, वित्तीय संस्थानों और आम जनता से सरकारी बॉन्ड या प्रतिभूतियां जारी कर धन जुटाती है। इसके साथ ही कुछ मामलों में विदेशी कर्ज भी लिया जाता है। कभी कभी केंद्रीय बैंक से सहायता ली जाती है, हालांकि इससे महंगाई बढ़ने का जोखिम भी जुड़ा होता है। इसके अलावा सार्वजनिक उपक्रमों में हिस्सेदारी बेचकर या संपत्तियों के निजीकरण के जरिए भी सरकार फंड जुटाने का रास्ता अपनाती है।

घाटे के बजट के अपने फायदे और नुकसान दोनों होते हैं। यदि उधार लिया गया पैसा शिक्षा, स्वास्थ्य, उद्योग और इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे उत्पादक क्षेत्रों में लगाया जाए तो भविष्य में आय बढ़ती है और घाटे को संभालना आसान हो जाता है। लेकिन यदि यही पैसा अनुत्पादक खर्चों में चला जाए तो कर्ज का बोझ लगातार बढ़ता जाता है और आर्थिक स्थिरता पर खतरा पैदा हो सकता है। यही कारण है कि बजट बनाते समय सरकार के लिए संतुलन बनाए रखना, पारदर्शिता बरतना और दीर्घकालिक सोच के साथ फैसले लेना बेहद जरूरी होता है।

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