मुंबई: देश की आर्थिक राजधानी मुंबई की तेज़ रफ्तार ज़िंदगी के बीच विले पार्ले का वह इलाका अब पहले जैसा नहीं रहा। दशकों तक जहां हवा में बिस्कुटों की सोंधी-मीठी खुशबू घुली रहती थी, वहां अब एक गहरी खामोशी पसरी है। भारत के सबसे भरोसेमंद और लोकप्रिय ब्रांड ‘पार्ले-जी’ (Parle-G) की ऐतिहासिक विले पार्ले फैक्ट्री का अध्याय आधिकारिक रूप से समाप्त हो चुका है। यह सिर्फ एक फैक्ट्री का बंद होना नहीं, बल्कि करोड़ों भारतीयों के बचपन, उनकी चाय की चुस्कियों और सामूहिक यादों से जुड़े एक पूरे औद्योगिक युग का अंत है।
1929 से 2026: स्वदेशी सोच से वैश्विक पहचान तक का सफर
पार्ले की औद्योगिक यात्रा की शुरुआत वर्ष 1929 में हुई थी, जब मोहनलाल दयाल चौहान ने मात्र 12 कर्मचारियों के साथ विले पार्ले में एक छोटी फैक्ट्री खरीदी। शुरुआती दौर में यहां टॉफी और कैंडी का उत्पादन होता था, लेकिन 1939 में देश में स्वदेशी भावना के उभार के साथ पार्ले ने ब्रिटिश बिस्कुटों के विकल्प के तौर पर अपना पहला देसी ‘ग्लूको’ बिस्कुट तैयार किया। यही बिस्कुट आगे चलकर पार्ले-जी के नाम से देशभर में मशहूर हुआ।
द्वितीय विश्व युद्ध के कठिन दौर में यह फैक्ट्री भारतीय सैनिकों और आम जनता के लिए सस्ते व पौष्टिक भोजन का बड़ा सहारा बनी। समय के साथ ‘पार्ले ग्लूको’ का नाम बदलकर ‘पार्ले-जी’ कर दिया गया, जहां ‘G’ को बाद में कंपनी ने अपने चर्चित नारे “जी माने जीनियस” के जरिए नई पहचान दी। यह मार्केटिंग रणनीति पार्ले-जी को पीढ़ियों तक प्रासंगिक बनाए रखने में अहम साबित हुई।
पैकेट की मासूम बच्ची: एक प्रतीक, एक रहस्य
पार्ले-जी के साथ जुड़ी सबसे चर्चित पहचान उसके पैकेट पर बनी वह मासूम बच्ची रही है। दशकों तक इसे लेकर तरह-तरह की कहानियां चलती रहीं—कभी किसी प्रसिद्ध हस्ती का बचपन बताया गया, तो कभी किसी असली बच्ची से जोड़ा गया। लेकिन सच्चाई यह है कि यह चेहरा किसी वास्तविक व्यक्ति का नहीं है। इसे 1960 के दशक में कलाकार मगनलाल दहिया ने डिजाइन किया था। यह चित्र मासूमियत, भरोसे और पारिवारिक मूल्यों का प्रतीक बन गया, जिसने पार्ले-जी को भावनात्मक रूप से हर घर से जोड़ दिया।
विज्ञापन की दुनिया में भी पार्ले-जी हमेशा आगे रहा। 90 के दशक में बच्चों के पसंदीदा सुपरहीरो शक्तिमान से लेकर गुलजार साहब के शब्दों से सजे प्रेरणादायक कैंपेन तक, ब्रांड ने हर दौर में खुद को नए अंदाज़ में पेश किया। पीले वैक्स पेपर में लिपटा बिस्कुट और उसे खोलते ही आने वाली खुशबू आज भी लाखों लोगों के लिए शुद्ध नॉस्टैल्जिया है।
फैक्ट्री के भीतर: जहां हर दिन इतिहास बनता था
विले पार्ले की इस फैक्ट्री के भीतर बिस्कुट बनने की प्रक्रिया किसी जादुई कारखाने से कम नहीं थी। विशाल मिक्सरों में गेहूं का आटा, चीनी और ग्लूकोज का मिश्रण तैयार होता, रोलर्स से गुजरते हुए बिस्कुटों को उनका खास डिजाइन मिलता और फिर लगभग 100 मीटर लंबे गैस ओवन में उनकी सोंधी सिकाई होती। इस पूरी प्रक्रिया से उठती खुशबू विले पार्ले स्टेशन से गुजरने वाली लोकल ट्रेनों के यात्रियों के लिए एक पहचान बन चुकी थी—मानो शहर खुद बता रहा हो कि पार्ले-जी तैयार है।
2016 से 2026: उत्पादन बंद, पुनर्विकास को हरी झंडी
हालांकि इस ऐतिहासिक फैक्ट्री में उत्पादन 2016 के मध्य में ही बंद हो गया था, लेकिन इसका भविष्य तय हुआ 7 जनवरी 2026 को, जब महाराष्ट्र राज्य पर्यावरण प्रभाव मूल्यांकन प्राधिकरण (SEIAA) ने इसके पुनर्विकास को मंजूरी दे दी। करीब 13.54 एकड़ में फैला यह भूखंड अब एक बड़े आधुनिक कमर्शियल कॉम्प्लेक्स में तब्दील होगा। इसके लिए परिसर में मौजूद 21 पुरानी इमारतों को गिराने की अनुमति दी गई है।
यह फैसला शहरी विकास और बदलती मुंबई की जरूरतों के लिहाज से अहम है, लेकिन भावनात्मक रूप से यह उस ‘पुरानी मुंबई’ के एक और अध्याय के बंद होने जैसा है—जिसने एक साधारण बिस्कुट को वैश्विक पहचान बनते देखा।
एक विरासत, जो कभी खत्म नहीं होगी
पार्ले-जी की सबसे बड़ी ताकत उसकी सादगी और किफायती कीमत रही है। लगभग 25 वर्षों तक ₹5 की कीमत बनाए रखना किसी भी बिजनेस मॉडल के लिए असाधारण उपलब्धि मानी जाती है। आज पार्ले-जी न सिर्फ भारत, बल्कि दुनिया के कई देशों में सबसे ज्यादा बिकने वाले बिस्कुटों में शामिल है।
भले ही विले पार्ले की ऐतिहासिक फैक्ट्री अब इतिहास बन चुकी हो, लेकिन पार्ले-जी का स्वाद, उसकी खुशबू और चाय के प्याले में डूबे उस बिस्कुट की यादें कभी नहीं मिटेंगी। फैक्ट्री बंद हो सकती है, इमारतें बदल सकती हैं, लेकिन भारतीयों के दिलों में बसा वह ‘स्वाद भरा, शक्ति भरा’ रिश्ता हमेशा अमर रहेगा।
