रामनगर की विश्व प्रसिद्ध रामलीला का आज होगा प्रथम गणेश पूजन 25 सितंबर से शुरू होगी अलौकिक लीला मिर्जापुर के अंश पांडेय निभाएंगे प्रभु श्रीराम की भूमिका
रामनगर(वाराणसी): काशी की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पहचान मानी जाने वाली विश्व प्रसिद्ध रामनगर रामलीला का शुभारंभ रविवार दो अगस्त को प्रथम गणेश पूजन के साथ होगा। शुभ मुहूर्त में शाम चार बजकर पचास मिनट पर रामनगर चौक स्थित पक्की पर विधिवत पूजन संपन्न कराया जाएगा। इसी के साथ लगभग एक माह तक चलने वाली उस ऐतिहासिक परंपरा का विधिवत आरंभ होगा जिसकी ख्याति देश ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में है। इस वर्ष रामलीला का मंचन पच्चीस सितंबर से प्रारंभ होगा। रामनगर की रामलीला केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि भारतीय संस्कृति लोक परंपरा और सनातन जीवन दर्शन का जीवंत स्वरूप मानी जाती है।
स्वर परीक्षा के बाद पांच स्वरूपों का हुआ चयन
रामनगर दुर्ग में शुक्रवार शाम कुंवर अनंत नारायण सिंह की उपस्थिति में स्वर परीक्षा आयोजित की गई। इसमें बाइस बालकों ने भाग लिया। संस्कृत के श्लोक और रामचरितमानस की चौपाइयों का सस्वर पाठ कराया गया। स्वर की कोमलता स्पष्ट उच्चारण और भाव अभिव्यक्ति के आधार पर पांच स्वरूपों का चयन किया गया। इस वर्ष मिर्जापुर के अंश पांडेय प्रभु श्रीराम की भूमिका निभाएंगे। चंदौली के पंडित दीनदयाल उपाध्याय नगर निवासी रुद्र उपाध्याय को माता सीता के स्वरूप के लिए चुना गया है। प्रह्लादघाट निवासी श्रेयांश उपाध्याय भरत की भूमिका निभाएंगे। महमूरगंज के यक्ष तिवारी लक्ष्मण और मिर्जापुर के जमालपुर निवासी शिवांक उपाध्याय शत्रुघ्न का स्वरूप धारण करेंगे। चयन प्रक्रिया के दौरान रामलीला अधिकारी जे पी पाठक तथा व्यास शिवदत्त सहित कई गणमान्य लोग उपस्थित रहे।
आज से शुरू होगा कठिन प्रशिक्षण
प्रथम गणेश पूजन के बाद चयनित पांचों बालकों का प्रशिक्षण बलुआघाट धर्मशाला में प्रारंभ होगा। व्यास शिवदत्त के संरक्षण में ये सभी बालक रामलीला समाप्त होने तक अपने घरों से दूर रहेंगे। इस दौरान वे संवाद कंठस्थ करने के साथ साथ भाव भंगिमा मंच संचालन और पारंपरिक अभिनय शैली का अभ्यास करेंगे। रामनगर की रामलीला में अभिनय केवल मंचीय प्रस्तुति नहीं बल्कि साधना का रूप माना जाता है। इसी कारण स्वरूपों को अनुशासित वातावरण में विशेष प्रशिक्षण दिया जाता है।
करीब दो सौ वर्ष पुरानी है रामनगर रामलीला की गौरवशाली परंपरा
रामनगर की रामलीला का इतिहास अठारहवीं शताब्दी से जुड़ा माना जाता है। काशी नरेश महाराजा उदित नारायण सिंह ने इस परंपरा को व्यवस्थित स्वरूप प्रदान किया। तब से लेकर आज तक यह रामलीला बिना किसी आधुनिक मंच या कृत्रिम तकनीक के अपने मूल स्वरूप में आयोजित की जाती है। यही इसकी सबसे बड़ी विशेषता है। यहां पूरी रामलीला नगर के विभिन्न स्थलों पर चलायमान रूप में होती है। अयोध्या जनकपुर चित्रकूट पंचवटी लंका और अन्य प्रसंगों के लिए अलग अलग स्थायी स्थल निर्धारित हैं। हजारों दर्शक पात्रों के साथ एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचते हैं और स्वयं को त्रेता युग के वातावरण में अनुभव करते हैं।
रामचरितमानस की परंपरा को जीवंत रखती है यह लीला
रामनगर की रामलीला गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित रामचरितमानस पर आधारित है। संवादों का उच्चारण पारंपरिक शैली में किया जाता है। किसी प्रकार के फिल्मी संगीत या आधुनिक मंचीय प्रभाव का उपयोग नहीं किया जाता। प्रत्येक प्रसंग मानस की चौपाइयों और दोहों के अनुसार प्रस्तुत किया जाता है। यही कारण है कि यह रामलीला धार्मिक आयोजन के साथ साथ भारतीय लोकनाट्य की अनमोल धरोहर मानी जाती है।
यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी है यह परंपरा
रामनगर की रामलीला को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विशेष पहचान तब मिली जब भारत की रामलीला परंपरा को यूनेस्को ने मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की प्रतिनिधि सूची में शामिल किया। रामनगर की रामलीला इस गौरवशाली परंपरा का सबसे प्रतिष्ठित और प्राचीन उदाहरण मानी जाती है। देश विदेश से शोधकर्ता संस्कृति प्रेमी और पर्यटक हर वर्ष इस अद्भुत आयोजन को देखने वाराणसी पहुंचते हैं। इसकी मौलिकता अनुशासन और परंपरा आज भी पहले की तरह सुरक्षित है।
काशी नरेश की उपस्थिति बढ़ाती है गरिमा
रामनगर रामलीला की एक अनूठी विशेषता काशी नरेश की पारंपरिक उपस्थिति भी है। विभिन्न महत्वपूर्ण प्रसंगों में काशी नरेश अपनी राजपरंपरा के अनुरूप उपस्थित रहते हैं। श्रद्धालु इसे केवल सांस्कृतिक आयोजन नहीं बल्कि आस्था का उत्सव मानते हैं। काशी नरेश की सहभागिता इस आयोजन की ऐतिहासिक गरिमा को और अधिक प्रतिष्ठित बनाती है।
विश्वभर से पहुंचते हैं श्रद्धालु और शोधकर्ता
रामनगर की रामलीला देखने के लिए प्रत्येक वर्ष भारत के विभिन्न राज्यों के अलावा विदेशों से भी शोधकर्ता इतिहासकार संस्कृति विशेषज्ञ और पर्यटक वाराणसी पहुंचते हैं। इसकी पारंपरिक प्रस्तुति लोक अभिनय शैली धार्मिक अनुशासन और जीवंत वातावरण भारतीय सांस्कृतिक विरासत का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। यही कारण है कि यह आयोजन पर्यटन और सांस्कृतिक अध्ययन का भी प्रमुख केंद्र बन चुका है।
पच्चीस सितंबर से शुरू होगी रामभक्ति की अनुपम यात्रा
प्रथम गणेश पूजन के साथ आज से रामनगर में आध्यात्मिक वातावरण और अधिक भक्तिमय हो जाएगा। आने वाले दिनों में चयनित स्वरूप कठोर प्रशिक्षण प्राप्त करेंगे और पच्चीस सितंबर से शुरू होने वाली विश्व प्रसिद्ध रामलीला में भगवान श्रीराम के आदर्श जीवन चरित्र को जीवंत करेंगे। काशी की यह अद्भुत परंपरा आज भी करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है और भारतीय संस्कृति की अमूल्य धरोहर के रूप में विश्वभर में अपनी विशिष्ट पहचान बनाए हुए है।
पृष्ठभूमि
रामनगर की रामलीला का आयोजन प्रत्येक वर्ष आश्विन मास में पारंपरिक विधि विधान के साथ किया जाता है। इसका संचालन रामनगर दुर्ग की परंपरा के अनुसार होता है। लगभग एक महीने तक चलने वाली यह लीला विश्व की सबसे लंबी और सबसे व्यवस्थित पारंपरिक रामलीलाओं में गिनी जाती है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि समय के साथ आधुनिकता बढ़ने के बावजूद इसकी मूल परंपरा और प्रस्तुति शैली में कोई मूलभूत परिवर्तन नहीं किया गया है। यही कारण है कि रामनगर की रामलीला भारतीय संस्कृति की जीवंत पहचान बन चुकी है।
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