सारनाथ को यूनेस्को विश्व धरोहर सूची में मिला स्थान लगभग छह दशक के वैज्ञानिक शोध और अट्ठाईस वर्ष की आधिकारिक प्रक्रिया का मिला परिणाम
वाराणसी: सारनाथ के लिए यह ऐतिहासिक क्षण केवल एक अंतरराष्ट्रीय सम्मान नहीं बल्कि कई दशकों तक चले वैज्ञानिक अध्ययन सांस्कृतिक संरक्षण और संस्थागत प्रयासों की बड़ी उपलब्धि के रूप में देखा जा रहा है। भगवान गौतम बुद्ध के प्रथम धर्मोपदेश स्थल के रूप में विश्वभर में प्रसिद्ध सारनाथ को यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल किया जाना भारत की बौद्ध विरासत और सांस्कृतिक इतिहास के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह सफलता किसी एक वर्ष या एक संस्था के प्रयासों का परिणाम नहीं बल्कि लगभग अट्ठावन वर्ष तक चले शोध अंतरराष्ट्रीय सहयोग और अट्ठाईस वर्ष लंबी आधिकारिक नामांकन प्रक्रिया का निष्कर्ष है।
वर्ष उन्नीस सौ अड़सठ में शुरू हुई थी वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाने की पहल
सारनाथ को विश्व धरोहर सूची तक पहुंचाने की कहानी वर्ष उन्नीस सौ अड़सठ से शुरू होती है। उस समय अमेरिका और उत्तर प्रदेश सरकार के सहयोग से सारनाथ की ऐतिहासिक सांस्कृतिक और पुरातात्विक महत्ता को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने की दिशा में गंभीर प्रयास प्रारंभ किए गए। उस दौर में यह महसूस किया गया कि बौद्ध धर्म के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखने के बावजूद सारनाथ को वह वैश्विक पहचान नहीं मिल सकी थी जिसका वह वास्तविक रूप से अधिकारी था। इसके बाद विभिन्न संस्थानों और विशेषज्ञों ने लगातार इस दिशा में अध्ययन और दस्तावेजीकरण का कार्य जारी रखा।
बीएचयू के वैज्ञानिकों और इतिहासकारों के शोध ने तैयार किया मजबूत आधार
काशी हिंदू विश्वविद्यालय के विद्वानों और शोधकर्ताओं ने इस पूरी प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वर्ष उन्नीस सौ तिरानवे में प्रो राणा पीबी सिंह और अन्य इतिहासकारों तथा वैज्ञानिकों ने पहली बार अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका में सारनाथ पर विस्तृत अध्ययन प्रकाशित किया। इस शोध में यह स्पष्ट किया गया कि विश्व बौद्ध धरोहर के प्रमुख केंद्रों में शामिल होने के बावजूद सारनाथ अभी तक यूनेस्को की सूची में क्यों स्थान नहीं बना सका। शोध में इसके ऐतिहासिक महत्व पुरातात्विक साक्ष्यों सांस्कृतिक निरंतरता और संरक्षण की आवश्यकता को वैज्ञानिक आधार के साथ प्रस्तुत किया गया। यही अध्ययन आगे चलकर नामांकन प्रक्रिया का महत्वपूर्ण आधार बना।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने निभाई अहम जिम्मेदारी
सारनाथ के संरक्षण और विश्व धरोहर सूची में नामांकन की दिशा में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने लगातार कार्य किया। पुरातात्विक अवशेषों के संरक्षण दस्तावेजों के संकलन और अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप प्रस्ताव तैयार करने में विभाग की महत्वपूर्ण भूमिका रही। इसके साथ ही अंतरराष्ट्रीय स्मारक और स्थल परिषद आईसीओएमओएस ने भी तकनीकी मूल्यांकन और विशेषज्ञ परीक्षण की जिम्मेदारी निभाई। इस पूरी प्रक्रिया में ऐतिहासिक प्रमाण संरक्षण व्यवस्था सांस्कृतिक महत्व और प्रबंधन प्रणाली का विस्तार से मूल्यांकन किया गया।
उन्नीस सौ अट्ठानवे में संभावित सूची से शुरू हुई आधिकारिक प्रक्रिया
सारनाथ को यूनेस्को विश्व धरोहर सूची में शामिल कराने की औपचारिक प्रक्रिया वर्ष उन्नीस सौ अट्ठानवे में संभावित सूची में शामिल किए जाने के साथ शुरू हुई। इसके बाद कई वर्षों तक दस्तावेज तैयार किए गए विशेषज्ञों की टिप्पणियों के आधार पर संशोधन किए गए और संरक्षण संबंधी विभिन्न मानकों को पूरा किया गया। इस दौरान कई बार प्रस्ताव को और अधिक मजबूत बनाने के लिए अतिरिक्त जानकारी और तकनीकी दस्तावेज भी तैयार किए गए।
प्रो राणा पीबी सिंह ने प्रकाशित किए तीन महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय शोध
प्रो राणा पीबी सिंह ने सारनाथ पर तीन महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय शोध प्रकाशित किए जिनमें इसकी सांस्कृतिक विरासत ऐतिहासिक महत्व और वैश्विक पहचान के विभिन्न पहलुओं का विस्तृत विश्लेषण किया गया। आईसीओएमओएस की समिति के सदस्य के रूप में भी उन्होंने नामांकन प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका निभाई। विशेषज्ञों का मानना है कि उनके शोध और अकादमिक योगदान ने सारनाथ की दावेदारी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मजबूत करने में महत्वपूर्ण सहयोग दिया।
वर्ष दो हजार चौबीस में संशोधित प्रस्ताव और दो हजार पच्चीस में हुआ विस्तृत मूल्यांकन
वर्ष दो हजार चौबीस में सारनाथ का संशोधित प्रस्ताव आईसीओएमओएस के समक्ष प्रस्तुत किया गया। इसके बाद अक्टूबर दो हजार पच्चीस में बांग्लादेश के प्रोफेसर मोहम्मद हबीब आईसीओएमओएस के नामित विशेषज्ञ के रूप में सारनाथ पहुंचे। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों की टीम के साथ स्थल का विस्तृत निरीक्षण किया। निरीक्षण के दौरान संरक्षण प्रबंधन पर्यटक सुविधाओं और विरासत संरक्षण से जुड़े विभिन्न पहलुओं का मूल्यांकन किया गया। जिन बिंदुओं पर सुधार की आवश्यकता बताई गई उन्हें निर्धारित समय में पूरा किया गया।
अंतिम रिपोर्ट के बाद यूनेस्को तक पहुंचा प्रस्ताव
दिसंबर दो हजार पच्चीस में अंतिम मूल्यांकन रिपोर्ट तैयार की गई। इसके बाद जनवरी और फरवरी में आवश्यक दस्तावेज आईसीओएमओएस को सौंपे गए। विस्तृत परीक्षण और तकनीकी समीक्षा के बाद आईसीओएमओएस ने अपनी अनुशंसा के साथ प्रस्ताव यूनेस्को को भेज दिया। इसके उपरांत सारनाथ को विश्व धरोहर सूची में स्थान प्रदान किया गया जिससे यह स्थल विश्व स्तर पर संरक्षित सांस्कृतिक धरोहरों की प्रतिष्ठित सूची का हिस्सा बन गया।
विश्व बौद्ध विरासत के केंद्र के रूप में और मजबूत होगी सारनाथ की पहचान
विशेषज्ञों का मानना है कि यूनेस्को विश्व धरोहर सूची में शामिल होने के बाद सारनाथ की वैश्विक पहचान और अधिक मजबूत होगी। इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शोध पर्यटन सांस्कृतिक आदान प्रदान और संरक्षण कार्यों को नई गति मिलने की संभावना है। साथ ही स्थानीय स्तर पर पर्यटन आधारित रोजगार और आधारभूत सुविधाओं के विकास को भी बढ़ावा मिलेगा। वाराणसी और सारनाथ आने वाले देश विदेश के पर्यटकों तथा बौद्ध श्रद्धालुओं की संख्या में भी वृद्धि होने की उम्मीद व्यक्त की जा रही है।
सारनाथ का ऐतिहासिक महत्व
सारनाथ वह पवित्र स्थल है जहां भगवान गौतम बुद्ध ने ज्ञान प्राप्ति के बाद अपना प्रथम धर्मोपदेश दिया था जिसे धर्मचक्र प्रवर्तन के नाम से जाना जाता है। यही स्थान बौद्ध संघ की स्थापना का भी साक्षी माना जाता है। धामेक स्तूप अशोक स्तंभ चौखंडी स्तूप मूलगंध कुटी विहार और पुरातात्विक अवशेष सारनाथ की ऐतिहासिक पहचान को विश्व स्तर पर स्थापित करते हैं। अब यूनेस्को विश्व धरोहर सूची में शामिल होने के बाद सारनाथ केवल भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया की साझा सांस्कृतिक विरासत के रूप में और अधिक प्रतिष्ठित स्थान प्राप्त करेगा।
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