वाराणसी: समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के निर्देश पर गठित 11 सदस्यीय प्रतिनिधि मंडल के मणिकर्णिका घाट दौरे से पहले वाराणसी की सियासत एक बार फिर गरमा गई है। सपा नेताओं का यह प्रतिनिधि मंडल राजमाता अहिल्याबाई की मूर्ति को खंडित किए जाने के मामले की जमीनी हकीकत जानने के लिए आज मणिकर्णिका घाट जाने वाला था। पार्टी नेताओं का कहना है कि यह दौरा पूरी तरह तथ्यात्मक जानकारी जुटाने के उद्देश्य से किया जाना था, ताकि घटना से जुड़ी वास्तविक स्थिति को प्रदेश कार्यालय तक पहुंचाया जा सके।
हालांकि, प्रतिनिधि मंडल के इस ऐलान से पहले ही पुलिस प्रशासन ने सपा के कई पदाधिकारियों और नेताओं को नजरबंद कर लिया। बताया जा रहा है कि संभावित कानून-व्यवस्था की स्थिति को देखते हुए यह कदम उठाया गया है। नजरबंदी की कार्रवाई के बाद सपा नेताओं में रोष देखने को मिला और कई नेताओं ने अपने-अपने आवासों पर पुलिस तैनाती की तस्वीरें सोशल मीडिया पर साझा कर प्रशासन पर सवाल खड़े किए। इन तस्वीरों के सामने आने के बाद मामला और अधिक राजनीतिक रंग लेता नजर आ रहा है।
समाजवादी पार्टी का कहना है कि प्रतिनिधि मंडल का उद्देश्य किसी तरह का प्रदर्शन या टकराव नहीं था, बल्कि एक संवेदनशील मुद्दे पर तथ्यों की निष्पक्ष जांच करना था। पार्टी नेताओं का आरोप है कि बिना किसी ठोस कारण के उन्हें नजरबंद किया गया, जिससे यह संदेश जा रहा है कि विपक्ष की आवाज को दबाने की कोशिश की जा रही है। वहीं, प्रशासनिक सूत्रों का कहना है कि सुरक्षा और शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए एहतियातन कदम उठाए गए हैं।
प्रतिनिधि मंडल में पार्टी के कई वरिष्ठ और प्रमुख चेहरे शामिल हैं, जिनमें तीन सांसद भी हैं। इसमें सपा के महानगर अध्यक्ष दिलीप डे, जिलाध्यक्ष सुजीत यादव, चंदौली के सांसद वीरेंद्र सिंह, बलिया के सांसद सनातन पांडेय, मछली-शहर की सांसद प्रिया सरोज, स्नातक एमएलसी आशुतोष सिन्हा, पूर्व मंत्री सुरेंद्र सिंह पटेल, सुल्तानपुर की पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष, दक्षिणी विधानसभा क्षेत्र के पूर्व प्रत्याशी किशन दीक्षित, राज्य कार्यकारिणी सदस्य महेंद्र पाल उर्फ पिंटू पाल और अजहर अली सिद्दीकी शामिल हैं। पार्टी सूत्रों के अनुसार, इन सभी प्रतिनिधि सदस्यों को प्रदेश मुख्यालय से औपचारिक पत्र भेजा गया था।
सपा नेताओं का कहना है कि प्रतिनिधि मंडल मौके पर जाकर स्थानीय लोगों, प्रशासन और अन्य संबंधित पक्षों से बातचीत कर पूरी जानकारी जुटाने वाला था। इसके बाद एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार कर प्रदेश कार्यालय को सौंपी जानी थी, ताकि पार्टी नेतृत्व आगे की रणनीति तय कर सके। लेकिन नजरबंदी के चलते यह प्रक्रिया फिलहाल बाधित हो गई है।
इस पूरे घटनाक्रम ने वाराणसी में राजनीतिक हलचल को तेज कर दिया है। एक ओर सपा इसे लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन बता रही है, तो दूसरी ओर प्रशासन कानून-व्यवस्था की दुहाई दे रहा है। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर सियासी बयानबाजी और तेज होने के संकेत मिल रहे हैं, क्योंकि मामला अब केवल एक दौरे तक सीमित न रहकर राजनीतिक अधिकारों और प्रशासनिक कार्रवाई के सवाल से जुड़ गया है।
