वाराणसी जनपद के काशी विद्यापीठ विकास खण्ड अंतर्गत ग्राम पंचायत रमसीपुर में बने सामुदायिक शौचालय को लेकर सामने आया मामला अब सिर्फ एक गांव तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह सरकार की स्वच्छता नीति, प्रशासनिक जवाबदेही और जमीनी हकीकत पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। स्वच्छ भारत मिशन के तहत करोड़ों रुपये की लागत से बनाए गए सामुदायिक शौचालय का उपयोग करने के बदले प्रति व्यक्ति 5 रुपये की वसूली किए जाने का आरोप सामने आने के बाद पूरे क्षेत्र में आक्रोश का माहौल है।
स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार, गांव के सामुदायिक शौचालय पर तैनात महिला केयर टेकर द्वारा हर उपयोगकर्ता से 5 रुपये लिए जा रहे हैं। हैरानी की बात यह है कि यह वसूली गुपचुप तरीके से नहीं, बल्कि खुले तौर पर की जा रही है और इसके लिए बाकायदा एक वसूली रजिस्टर भी रखा गया है, जिसमें शौचालय का उपयोग करने वाले ग्रामीणों से हस्ताक्षर कराए जा रहे हैं। यह रजिस्टर अब खुद इस कथित अवैध वसूली का सबसे बड़ा सबूत बनकर सामने आ रहा है।
महिला केयर टेकर का कहना है कि वह अपने स्तर से कोई मनमानी नहीं कर रही हैं। उनका स्पष्ट आरोप है कि ग्राम पंचायत सचिव के निर्देश पर यह वसूली की जा रही है। केयर टेकर के अनुसार, सचिव द्वारा ही प्रति व्यक्ति 5 रुपये लेने का आदेश दिया गया और उसी के तहत रजिस्टर बनवाकर वसूली की प्रक्रिया शुरू कराई गई। इस बयान के सामने आने के बाद प्रशासनिक तंत्र की भूमिका पर भी सवाल उठने लगे हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि भारत सरकार और राज्य सरकार द्वारा जारी गाइडलाइंस के अनुसार सामुदायिक शौचालयों का उपयोग आम जनता के लिए निःशुल्क होता है, ताकि गरीब, मजदूर, महिलाएं और बुजुर्ग बिना किसी आर्थिक बाधा के स्वच्छ सुविधा का लाभ ले सकें। ऐसे में शौचालय के उपयोग पर शुल्क लगाना न केवल सरकारी दिशा-निर्देशों का उल्लंघन है, बल्कि स्वच्छ भारत मिशन की मूल भावना के भी खिलाफ है।
ग्रामीण महिलाओं और मजदूर वर्ग के लोगों का कहना है कि रोजमर्रा की जरूरत के लिए 5 रुपये देना भी उनके लिए एक अतिरिक्त बोझ बन गया है। कई लोगों ने यह भी आरोप लगाया कि पैसा न देने पर शौचालय का उपयोग करने से रोका जाता है या अपमानजनक व्यवहार किया जाता है, जिससे लोगों की गरिमा और अधिकारों पर सीधा प्रहार हो रहा है।
इस मामले के उजागर होते ही गांव में आक्रोश बढ़ता जा रहा है। ग्रामीणों ने मांग की है कि पूरे प्रकरण की निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच कराई जाए, वसूली रजिस्टर को तत्काल जब्त किया जाए और यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो संबंधित ग्राम पंचायत सचिव, केयर टेकर तथा अन्य जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाए। साथ ही अब तक वसूले गए पैसे का हिसाब सार्वजनिक किया जाए और जरूरत पड़ी तो राशि ग्रामीणों को वापस की जाए।
यह मामला सिर्फ रमसीपुर गांव का नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की कार्यशैली पर सवाल खड़ा करता है। स्वच्छता के नाम पर करोड़ों खर्च करने वाली योजनाएं अगर जमीनी स्तर पर शुल्क और वसूली का जरिया बन जाएं, तो सरकार के अभियान की विश्वसनीयता पर भी असर पड़ता है। अब यह देखना अहम होगा कि जिला प्रशासन इस खबर को कितनी गंभीरता से लेता है और क्या समय रहते ठोस कार्रवाई कर जनता को राहत दिलाई जाती है।
