कानपुर में आयोजित कुल हिंद इस्लामिक इल्मी अकादमी की अहम बैठक में उलमा ने डिजिटल सोने में ऑनलाइन निवेश को लेकर स्पष्ट और महत्वपूर्ण फैसला लिया है। बैठक में सर्वसम्मति से यह तय किया गया कि मुसलमानों के लिए डिजिटल गोल्ड में ऑनलाइन निवेश शरीयत के खिलाफ है। उलमा का कहना है कि इस प्रक्रिया में सोने की वास्तविक खरीद बिक्री नहीं होती, बल्कि यह पूरी तरह आभासी लेन देन पर आधारित होती है। ऐसे निवेश में केवल ऐप के माध्यम से कीमतों के उतार चढाव के अनुसार राशि घटती बढ़ती रहती है, जबकि सोना वास्तविक रूप से खरीदार के कब्जे में नहीं आता। इसी कारण इसे शेयर बाजार जैसी सट्टा प्रवृत्ति के समान माना गया है, जो शरीयत के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है।
बैठक में बताया गया कि वर्तमान समय में कई मोबाइल ऐप और डिजिटल प्लेटफार्म डिजिटल सोने में निवेश का विकल्प दे रहे हैं, जिसमें निवेशक ऑनलाइन राशि जमा करता है और सोने की कीमत बढ़ने या घटने के अनुसार उसके खाते में धनराशि कम या ज्यादा दिखाई जाती है। उलमा ने इस व्यवस्था को स्पष्ट रूप से अस्वीकार्य बताया और कहा कि इस तरह की आभासी खरीद बिक्री में न तो सोने की वास्तविक डिलीवरी होती है और न ही नकद लेन देन के उसूल पूरे होते हैं, जो इस्लामी कानून में आवश्यक माने गए हैं। इसलिए मुसलमानों को चाहिए कि वे सोने की खरीद बिक्री ऑनलाइन माध्यम से न करें और इसकी जगह प्रत्यक्ष और नकद लेन देन को ही प्राथमिकता दें, जिसमें सोना वास्तविक रूप से हाथ में आए और सौदा पूरी पारदर्शिता के साथ हो।
इस महत्वपूर्ण फैसले के साथ ही बैठक में एक अन्य धार्मिक मसले पर भी विचार किया गया। सर्दी के मौसम में मस्जिदों में नमाजियों की सुविधा के लिए फर्श पर फोम बिछाने को लेकर पूछे गए सवाल पर उलमा ने स्पष्ट किया कि इस पर नमाज अदा करने में कोई हर्ज नहीं है। उन्होंने कहा कि ठंड से बचाव और सुविधा के उद्देश्य से फोम या इसी तरह की वस्तु का उपयोग जायज है और इससे नमाज की शरई स्थिति पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
यह बैठक जमीयत बिल्डिंग रजबी रोड कानपुर में आयोजित की गई, जिसमें डिजिटल सोने पर ऑनलाइन निवेश के सवाल पर विस्तार से विचार विमर्श हुआ और शरीयत के अनुरूप निर्णय लिया गया। बैठक में मुफ्ती इकबाल अहमद कामसी, मौलाना खलील अहमद मजाहिरी, मुफ्ती अब्दुर्रशीद कासमी, मौलाना अमीनुल हक अब्दुल्राह, मौलाना अनीस खान कासमी, मौलाना इनामुल्लाह कासमी सहित कई प्रमुख उलमा मौजूद रहे। सभी ने इस बात पर जोर दिया कि बदलते समय में नई वित्तीय प्रणालियों को अपनाने से पहले शरीयत के मूल सिद्धांतों को समझना और उनका पालन करना बेहद जरूरी है।
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