वाराणसी टकसाल सिनेमा शूटआउट केस में सभी आरोपी बरी, पूर्व सांसद धनंजय सिंह हाईकोर्ट जाने की तैयारी में
वाराणसी के चर्चित टकसाल सिनेमा शूटआउट केस में एमपी एमएलए कोर्ट द्वारा सभी आरोपियों को बरी किए जाने के बाद मामला एक बार फिर सुर्खियों में आ गया है। इस फैसले के बाद पूर्व सांसद धनंजय सिंह की लीगल टीम ने न्यायालय के निर्णय को चुनौती देने का मन बना लिया है। टीम का कहना है कि फैसले के कई पहलुओं से वे संतुष्ट नहीं हैं और अब इस मामले को उच्च न्यायालय में ले जाने की तैयारी की जा रही है।
करीब दो दशक पुराने मामले में आया फैसला
यह मामला 4 अक्टूबर 2002 का है, जब वाराणसी के टकसाल सिनेमा के पास गोलीबारी की घटना हुई थी। इस केस में विधायक अभय सिंह, एमएलसी विनीत सिंह समेत कुल छह लोगों को आरोपी बनाया गया था। लंबे समय तक चली सुनवाई के बाद वाराणसी की एमपी एमएलए कोर्ट ने सभी आरोपियों को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया। अदालत के इस फैसले ने न केवल राजनीतिक बल्कि सामाजिक हलकों में भी चर्चा को जन्म दिया है।
धनंजय सिंह की लीगल टीम ने फैसले पर उठाए सवाल
पूर्व सांसद धनंजय सिंह की कानूनी टीम का कहना है कि अदालत के फैसले में कई महत्वपूर्ण बिंदुओं को नजरअंदाज किया गया है। टीम के मुताबिक, पूरे जजमेंट का विस्तार से अध्ययन किया जा रहा है और उसके बाद ही आगे की रणनीति तय की जाएगी। उनका मानना है कि इस मामले में न्याय पूरी तरह नहीं हुआ है, इसलिए उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया जाएगा।
अभय सिंह के अलिबी पर विवाद
सुनवाई के दौरान अभय सिंह की ओर से यह दलील दी गई थी कि घटना के समय वे अयोध्या के एक अस्पताल में भर्ती थे। इस दावे को धनंजय सिंह ने पूरी तरह खारिज करते हुए कहा कि यह एक झूठा बचाव है। उनका कहना है कि इस तरह के अलिबी के आधार पर आरोपी को राहत मिलना न्याय प्रक्रिया पर सवाल खड़े करता है।
वाहन नंबर को लेकर भी हुई बहस
मामले की सुनवाई के दौरान वाहन के नंबर को लेकर भी तीखी बहस देखने को मिली। बचाव पक्ष ने दावा किया कि जिस नंबर का जिक्र किया जा रहा है वह एक जेसीबी मशीन का है। वहीं धनंजय सिंह का कहना है कि संबंधित जेसीबी का पंजीकरण वर्ष 2004 में हुआ था, जबकि घटना 2002 की है। इस विरोधाभास को लेकर भी अदालत में विस्तृत चर्चा हुई।
दोस्ती से दुश्मनी तक का सफर
अभय सिंह और धनंजय सिंह के बीच का विवाद नया नहीं है। दोनों की दोस्ती लखनऊ विश्वविद्यालय के दिनों से मानी जाती है, जो समय के साथ कट्टर दुश्मनी में बदल गई। राजनीतिक और व्यक्तिगत मतभेदों के चलते दोनों के बीच कई बार टकराव की स्थिति भी सामने आई है। टकसाल शूटआउट केस इसी लंबे विवाद का एक अहम अध्याय माना जाता है।
आगे की कानूनी लड़ाई पर टिकी नजरें
अब जब निचली अदालत से सभी आरोपी बरी हो चुके हैं, तो इस मामले की अगली दिशा उच्च न्यायालय तय करेगा। धनंजय सिंह की लीगल टीम द्वारा हाईकोर्ट जाने की तैयारी से साफ है कि यह मामला अभी समाप्त नहीं हुआ है। आने वाले दिनों में इस केस से जुड़े नए कानूनी पहलू सामने आ सकते हैं, जिन पर पूरे प्रदेश की नजर बनी रहेगी।
इस फैसले ने एक बार फिर न्यायिक प्रक्रिया, साक्ष्यों की भूमिका और लंबे समय तक चलने वाले मामलों की जटिलताओं को उजागर किया है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि उच्च न्यायालय में इस मामले को किस नजरिए से देखा जाता है और क्या इस केस में कोई नया मोड़ आता है।
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