Fri, 02 Jan 2026 11:13:29 - By : SANDEEP KR SRIVASTAVA
नई दिल्ली/वाराणसी: आगामी 1 फरवरी से पान मसाला, गुटखा और सिगरेट के शौकीनों की जेब पर भारी बोझ पड़ने वाला है। सरकार ने तंबाकू उत्पादों और पान मसाला पर कराधान (Taxation) की व्यवस्था में बड़ा बदलाव किया है, जिसके तहत अब इन उत्पादों पर अतिरिक्त उत्पाद शुल्क (Additional Excise Duty) और 'स्वास्थ्य उपकर' (Health Cess) वसूला जाएगा। वित्त मंत्रालय द्वारा इस संबंध में बुधवार को एक विस्तृत अधिसूचना जारी कर दी गई है, जिससे यह साफ हो गया है कि बजट सत्र के दौरान ही इन उत्पादों की कीमतें नए सिरे से तय होंगी। यह नई कर प्रणाली वर्तमान में लागू क्षतिपूर्ति उपकर (Compensation Cess) का स्थान लेगी, लेकिन इसका सीधा असर खुदरा कीमतों में बढ़ोतरी के रूप में देखने को मिलेगा।
वित्त मंत्रालय की अधिसूचना के मुताबिक, यह नई लेवी वस्तु एवं सेवा कर (GST) के अतिरिक्त होगी, जिससे कीमतों में उछाल आना तय माना जा रहा है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि पान मसाला और तंबाकू उत्पादों पर 40 प्रतिशत की दर से जीएसटी लागू होगा, जबकि बीड़ी पर यह दर 18 प्रतिशत रहेगी। हालांकि, असली मार अतिरिक्त उत्पाद शुल्क के रूप में पड़ने वाली है। सरकार ने 'स्वास्थ्य एवं राष्ट्रीय सुरक्षा' के नाम पर एक नया उपकर लगाने का फैसला किया है। इस कदम का उद्देश्य न केवल राजस्व बढ़ाना है, बल्कि हानिकारक उत्पादों के उपभोग को हतोत्साहित करना भी है।
नए नियमों के तहत गुटखा और तंबाकू उत्पादों पर जो अतिरिक्त शुल्क लगाए गए हैं, वे बेहद चौंकाने वाले हैं। अधिसूचना के अनुसार, गुटखा पर 91 प्रतिशत, चबाने वाले तंबाकू पर 82 प्रतिशत और जर्दा युक्त सुगंधित तंबाकू पर भी 82 प्रतिशत अतिरिक्त उत्पाद शुल्क लगेगा। यह शुल्क सीधे तौर पर उत्पाद की लागत को बढ़ा देगा। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि चबाने वाले तंबाकू, फिल्टर खैनी, जर्दा और गुटखा के लिए जीएसटी और उपकर का निर्धारण अब पैकेट पर घोषित खुदरा बिक्री मूल्य (Retail Sale Price) के आधार पर किया जाएगा। इसका मतलब है कि एमआरपी जितनी ज्यादा होगी, टैक्स का बोझ भी उसी अनुपात में बढ़ता जाएगा।
बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि फरवरी की शुरुआत से ही दुकानदार और वितरक नए स्टॉक पर बढ़ी हुई कीमतें वसूलना शुरू कर देंगे। सिगरेट और बीड़ी जैसे उत्पादों पर अतिरिक्त उत्पाद शुल्क लगने से ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों के उपभोक्ताओं का बजट बिगड़ना तय है। सरकार द्वारा उठाए गए इस सख्त कदम को स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता और राजस्व घाटे की भरपाई के रूप में देखा जा रहा है, लेकिन आम उपभोक्ता के लिए इसका सीधा अर्थ यही है कि अब अपनी तलब मिटाने के लिए उसे पहले से कहीं ज्यादा कीमत चुकानी होगी।