साल का पहला चंद्रग्रहण 3 मार्च को, दोपहर 3:20 से 6:47 तक रहेगा प्रभाव; नौ घंटे पहले लगेगा सूतक
इस वर्ष का पहला चंद्रग्रहण 3 मार्च को फाल्गुन पूर्णिमा के दिन लगने जा रहा है। खगोलीय दृष्टि से यह घटना दोपहर 3:20 बजे प्रारंभ होगी और शाम 6:47 बजे समाप्त होगी। धार्मिक परंपराओं के अनुसार ग्रहण से लगभग नौ घंटे पूर्व सूतक काल शुरू हो जाएगा। सूतक लगते ही मंदिरों के कपाट बंद कर दिए जाएंगे और पूजा-अर्चना स्थगित रहेगी।
क्या है चंद्रग्रहण, वैज्ञानिक कारण
वैज्ञानिक दृष्टि से चंद्रग्रहण तब होता है जब पृथ्वी सूर्य और चंद्रमा के बीच आ जाती है और पृथ्वी की छाया चंद्रमा पर पड़ती है। यह केवल पूर्णिमा के दिन ही संभव है, क्योंकि उसी समय सूर्य, पृथ्वी और चंद्रमा लगभग एक सीध में होते हैं।
जब पृथ्वी की पूर्ण छाया (उम्ब्रा) चंद्रमा को ढक लेती है तो पूर्ण चंद्रग्रहण होता है, और जब आंशिक छाया पड़ती है तो आंशिक चंद्रग्रहण कहा जाता है। ग्रहण के दौरान कभी-कभी चंद्रमा लालिमा लिए दिखाई देता है, जिसे “ब्लड मून” भी कहा जाता है। इसका कारण पृथ्वी के वायुमंडल द्वारा सूर्य के प्रकाश का प्रकीर्णन (स्कैटरिंग) है, जिसमें लाल तरंगदैर्ध्य का प्रकाश चंद्रमा तक पहुंचता है।
खगोलविदों के अनुसार चंद्रग्रहण को नंगी आंखों से देखना सुरक्षित होता है। इसके लिए किसी विशेष चश्मे या उपकरण की आवश्यकता नहीं होती, हालांकि बेहतर दृश्य के लिए दूरबीन या टेलीस्कोप का उपयोग किया जा सकता है।
सूतक काल क्या है और कब लगेगा
हिंदू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार चंद्रग्रहण से नौ घंटे पहले सूतक काल प्रारंभ हो जाता है। यदि ग्रहण 3:20 बजे शुरू हो रहा है तो सूतक सुबह लगभग 6:20 बजे से प्रभावी माना जाएगा। सूतक लगते ही मंदिरों के कपाट बंद कर दिए जाते हैं और देवी-देवताओं की प्रतिमाओं को स्पर्श नहीं किया जाता।
सूतक काल में क्या माना जाता है
- भोजन बनाना और खाना वर्जित माना जाता है
- पूजा-पाठ और शुभ कार्य स्थगित रहते हैं
- गर्भवती महिलाओं को विशेष सावधानी बरतने की सलाह दी जाती है
ग्रहण समाप्ति के बाद स्नान, दान और मंत्रजाप का विशेष महत्व बताया गया है। इसके पश्चात मंदिरों की साफ-सफाई कर पुनः पूजा-अर्चना प्रारंभ की जाती है।
पौराणिक महत्व और कथा
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार समुद्र मंथन के समय राहु नामक असुर ने देवताओं के बीच बैठकर अमृत पान कर लिया था। भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से उसका सिर धड़ से अलग कर दिया। अमृत पी लेने के कारण उसका सिर अमर हो गया और वह राहु कहलाया। मान्यता है कि राहु समय-समय पर सूर्य और चंद्रमा को ग्रसता है, जिससे ग्रहण लगता है।
धार्मिक ग्रंथों में ग्रहण काल को आध्यात्मिक साधना और मंत्रजाप के लिए अत्यंत फलदायी माना गया है। इस दौरान किए गए जप, तप और दान का विशेष पुण्य प्राप्त होता है। फाल्गुन पूर्णिमा का दिन स्वयं में होलिका दहन और आध्यात्मिक ऊर्जा से जुड़ा होता है, ऐसे में इस दिन पड़ने वाला चंद्रग्रहण धार्मिक दृष्टि से और भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
किन राशियों पर प्रभाव
ज्योतिषाचार्यों के अनुसार ग्रहण का प्रभाव विभिन्न राशियों पर अलग-अलग पड़ सकता है। हालांकि वैज्ञानिक दृष्टि से चंद्रग्रहण एक प्राकृतिक खगोलीय घटना है और इसका व्यक्तिगत जीवन पर सीधा प्रभाव सिद्ध नहीं है। फिर भी कई लोग परंपरा के अनुसार मंत्रजाप, दान और उपवास का पालन करते हैं।
क्या करें और क्या न करें
करें
- ग्रहण समाप्ति के बाद स्नान करें
- जरूरतमंदों को दान दें
- मंत्रजाप और ध्यान करें
न करें
- सूतक काल में शुभ कार्य आरंभ न करें
- धार्मिक मान्यता के अनुसार अनावश्यक बाहर न निकलें
- ग्रहण काल में भोजन न करें
निष्कर्ष
3 मार्च को पड़ने वाला यह चंद्रग्रहण खगोलीय दृष्टि से एक रोचक और महत्वपूर्ण घटना है, वहीं धार्मिक और पौराणिक परंपराओं में भी इसका विशेष स्थान है। जहां वैज्ञानिक इसे प्राकृतिक प्रक्रिया मानते हैं, वहीं आस्था से जुड़े लोग इसे आध्यात्मिक साधना का अवसर मानते हैं। ऐसे में यह दिन विज्ञान और विश्वास—दोनों दृष्टिकोणों से विशेष महत्व रखता है।
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