होर्मुज संकट के बीच भारत की ऊर्जा कूटनीति सफल, वैकल्पिक स्रोतों से बढ़ी आपूर्ति ने थामी बाजार की रफ्तार
नई दिल्ली: मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में आई रुकावटों ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को अस्थिर कर दिया है, लेकिन इस चुनौतीपूर्ण दौर में भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा को प्रभावी ढंग से संभालते हुए संतुलित और दूरदर्शी रणनीति का परिचय दिया है। दुनिया के कई बड़े देश जहां तेल और गैस की आपूर्ति को लेकर दबाव में हैं, वहीं भारत ने कूटनीतिक सक्रियता और आपूर्ति के विविधीकरण के जरिए हालात को काफी हद तक नियंत्रित रखा है।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज का वैश्विक महत्व और भारत की निर्भरता
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से दुनिया के कुल ऊर्जा व्यापार का लगभग बीस प्रतिशत गुजरता है। इस मार्ग में आई बाधाओं के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अनिश्चितता बढ़ी है। भारत के लिए यह स्थिति अधिक संवेदनशील रही है, क्योंकि देश अपने कुल कच्चे तेल आयात का लगभग चालीस से पचास प्रतिशत इसी मार्ग से प्राप्त करता रहा है। इसके बावजूद देश में तेल और गैस की उपलब्धता अपेक्षाकृत स्थिर बनी हुई है, जो समय पर उठाए गए नीतिगत और कूटनीतिक कदमों का परिणाम मानी जा रही है।
आपूर्ति में सुधार और रणनीतिक बदलाव
पेट्रोलियम मंत्रालय के अनुसार पिछले एक महीने में कच्चे तेल, एलपीजी और एलएनजी की उपलब्धता में उल्लेखनीय सुधार दर्ज किया गया है। अधिकारियों का कहना है कि भारत ने अपनी ऊर्जा आपूर्ति को एक ही क्षेत्र पर निर्भर रखने के बजाय कई नए स्रोतों की ओर मोड़ा है। विशेष रूप से अफ्रीका और अन्य उभरते देशों के साथ बढ़ते सहयोग ने इस संकट के प्रभाव को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
ऊर्जा जरूरतें और सरकार की प्राथमिकता
भारत की ऊर्जा जरूरतें तेजी से बढ़ रही हैं। देश प्रतिदिन लगभग पांच दशमलव पांच से पांच दशमलव छह मिलियन बैरल कच्चा तेल आयात करता है। एलपीजी की सालाना मांग करीब इकतीस मिलियन टन है, जिसमें से लगभग साठ प्रतिशत आयात के जरिए पूरा किया जाता है। प्राकृतिक गैस की खपत का भी बड़ा हिस्सा विदेशों पर निर्भर है। ऐसे में आपूर्ति में किसी भी तरह की बाधा सीधे आम उपभोक्ताओं और उद्योगों पर असर डाल सकती थी। इसे देखते हुए सरकार ने एलपीजी और एलएनजी की आपूर्ति को प्राथमिकता में रखा, ताकि घरेलू जरूरतों पर कोई संकट न आए।
वैकल्पिक स्रोतों की ओर बढ़ता भारत
ऊर्जा आपूर्ति के मोर्चे पर भारत ने अमेरिका, रूस, कनाडा और नॉर्वे के साथ साथ पश्चिम अफ्रीका के देशों जैसे नाइजीरिया, अल्जीरिया, घाना, कांगो और अंगोला के साथ अपने संबंधों को मजबूत किया है। इसके अलावा एलएनजी के लिए कैमरून, इक्वेटोरियल गिनी और मोजाम्बिक जैसे देशों के साथ भी संपर्क बढ़ाया गया है। इन प्रयासों के चलते कई नए स्रोतों से आपूर्ति शुरू हो चुकी है, जिससे बाजार में स्थिरता बनी हुई है।
मध्य पूर्व से आपूर्ति बनाए रखने के प्रयास
मध्य पूर्व से आने वाली आपूर्ति को बनाए रखने के लिए भी वैकल्पिक रास्तों का सहारा लिया गया है। सऊदी अरब और यूएई ने अपनी कुछ सप्लाई ऐसी पाइपलाइनों के जरिए भेजनी शुरू की है, जो स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को बाईपास करती हैं। इससे भारत को सीमित मात्रा में ही सही, लेकिन निरंतर आपूर्ति मिलती रही है, जो इस संकट के समय राहत देने वाला कदम साबित हुआ है।
रूस से आयात में तेजी
इस बीच रूस से कच्चे तेल के आयात में भी उल्लेखनीय तेजी देखी गई है। मार्च में भारत द्वारा रूस से तेल खरीद फरवरी के मुकाबले लगभग नब्बे प्रतिशत तक बढ़ गई। यह वृद्धि ऐसे समय में दर्ज की गई जब पश्चिम एशिया से कुल आपूर्ति में लगभग पंद्रह प्रतिशत की गिरावट देखी गई। अमेरिका द्वारा सीमित समय के लिए दी गई छूट के कारण भारत को समुद्र में पहले से मौजूद रूसी तेल खेपों की खरीद की अनुमति मिली, जिसका देश ने रणनीतिक तरीके से लाभ उठाया।
भविष्य की दिशा और विशेषज्ञों की राय
विशेषज्ञों का मानना है कि इस वैश्विक संकट के बीच भारत की ऊर्जा रणनीति ने न केवल मौजूदा चुनौतियों को संतुलित किया है, बल्कि भविष्य के लिए भी एक मजबूत आधार तैयार किया है। विविध स्रोतों पर निर्भरता बढ़ाने और कूटनीतिक संतुलन बनाए रखने की नीति भारत को आने वाले समय में वैश्विक ऊर्जा परिदृश्य में अधिक स्थिर और सक्षम स्थिति में स्थापित कर सकती है।
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