वाराणसी: शिव की नगरी काशी में गुरुवार 29 अक्टूबर को करवा चौथ का पर्व पारंपरिक आस्था और उत्साह के साथ मनाया जा रहा है। पति की दीर्घायु, अच्छे स्वास्थ्य, सुखमय दांपत्य जीवन और अखंड सौभाग्य की कामना के साथ सुहागिन महिलाएं निर्जला व्रत रख रही हैं। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि पर मनाया जाने वाला यह पर्व भारतीय संस्कृति में प्रेम, विश्वास, समर्पण और पारिवारिक रिश्तों की आत्मीयता का प्रतीक माना जाता है। काशी सहित उत्तर भारत के विभिन्न क्षेत्रों में इस अवसर पर घरों में पूजा की तैयारियां की गई हैं। बाजारों में मिट्टी के करवे, छलनी, दीपक, पूजन सामग्री, मिठाइयों, मेहंदी और शृंगार के सामान की खरीदारी के बीच पर्व का पारंपरिक रंग दिखाई दे रहा है। दिनभर उपवास रखने के बाद महिलाओं को शाम को चंद्रमा के दर्शन और पूजन का इंतजार रहेगा।
आस्था और परंपरा से जुड़ा है करवा चौथ का व्रत
करवा चौथ का पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारतीय पारिवारिक जीवन और सांस्कृतिक परंपराओं से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। इस दिन विवाहित महिलाएं सूर्योदय से पहले सरगी ग्रहण करती हैं और इसके बाद व्रत का संकल्प लेकर दिनभर उपवास रखती हैं। पारंपरिक मान्यता के अनुसार, व्रती महिलाएं भगवान शिव, माता पार्वती, भगवान गणेश और कार्तिकेय की आराधना करती हैं। शाम को करवा चौथ की कथा सुनने और विधि विधान से पूजन करने के बाद चंद्रमा के उदित होने की प्रतीक्षा की जाती है। चंद्र दर्शन के बाद चंद्रदेव को अर्घ्य अर्पित किया जाता है और परंपरा के अनुसार पति के हाथों से जल ग्रहण कर व्रत का पारण किया जाता है। धार्मिक मान्यताओं में इस व्रत को दांपत्य जीवन की सुख समृद्धि और पति की दीर्घायु की कामना से जोड़ा जाता है।
काशी में शाम 7 बजकर 57 मिनट पर चंद्रोदय की संभावना
करवा चौथ के दिन चंद्रमा के दर्शन का विशेष महत्व है। उपलब्ध पंचांग संबंधी गणनाओं के अनुसार, वाराणसी में गुरुवार को चंद्रोदय का संभावित समय शाम 7 बजकर 57 मिनट बताया गया है। हालांकि, कुछ पंचांगों में चंद्रोदय का समय रात 8 बजकर 2 मिनट दिया गया है। इस अंतर को देखते हुए व्रती महिलाओं को स्थानीय पंचांग और अपने क्षेत्र में चंद्रमा के वास्तविक दर्शन के अनुसार पूजन करना चाहिए। चंद्रमा के उदित होने का समय और उसका दिखाई देना अलग हो सकता है, क्योंकि बादल, धुंध, आसपास की इमारतें और क्षितिज की स्थिति भी दर्शन को प्रभावित कर सकती हैं। इसलिए निर्धारित समय के आसपास चंद्रमा के दर्शन की प्रतीक्षा करना उचित रहेगा।
करवा चौथ के दिन चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद ही पारंपरिक रूप से व्रत खोला जाता है। दिनभर निर्जला उपवास रखने वाली महिलाओं के लिए शाम का समय पर्व का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव होता है। चंद्रमा के दर्शन के बाद महिलाएं विधि विधान से पूजा करती हैं और अपने पति तथा परिवार के सुखमय जीवन की कामना करती हैं। काशी में भी महिलाएं इसी परंपरा के अनुसार व्रत और पूजन की तैयारियों में जुटी हैं।
शुभ मुहूर्त और पंचांग के अनुसार होगा पूजन
पंचांग संबंधी उपलब्ध गणनाओं के अनुसार, वाराणसी में करवा चौथ की पूजा का संभावित शुभ समय शाम 5 बजकर 19 मिनट से 6 बजकर 36 मिनट तक बताया गया है। वहीं, चतुर्थी तिथि गुरुवार की रात तक रहने की गणना है। धार्मिक अनुष्ठानों में तिथि, नक्षत्र, योग और मुहूर्त का विशेष महत्व माना जाता है। हालांकि, अलग अलग पंचांगों और गणना पद्धतियों में समय में कुछ अंतर हो सकता है। ऐसे में पूजा करने वाली महिलाओं को अपने परिवार की परंपरा और स्थानीय पंचांग के अनुसार अनुष्ठान करना चाहिए।
करवा चौथ के अवसर पर विभिन्न ज्योतिषीय योगों को लेकर भी धार्मिक चर्चा होती है। व्रत से जुड़े शुभ योगों और मुहूर्तों का उल्लेख अलग अलग पंचांगों में किया जाता है। इन गणनाओं को धार्मिक और ज्योतिषीय मान्यताओं के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। पर्व का मूल भाव श्रद्धा, संकल्प, पारिवारिक मंगल और दांपत्य जीवन के प्रति समर्पण से जुड़ा है।
सोलह शृंगार कर शिव परिवार की करेंगी आराधना
करवा चौथ पर सोलह शृंगार का विशेष सांस्कृतिक महत्व है। महिलाएं पारंपरिक परिधान पहनकर मेहंदी, सिंदूर, बिंदी, चूड़ियों और अन्य शृंगार सामग्री से सजती संवरती हैं। घरों में पूजा की चौकी सजाकर भगवान शिव, माता पार्वती, भगवान गणेश और कार्तिकेय की आराधना की जाती है। माता पार्वती को अखंड सौभाग्य की प्रतीक देवी के रूप में पूजने की परंपरा है। महिलाएं पूजा के दौरान अपने पति की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और परिवार में सुख शांति बनाए रखने की प्रार्थना करती हैं।
पूजन में कुमकुम, सिंदूर, अक्षत, धूप, दीप, गंगाजल और पंचामृत सहित विभिन्न सामग्री का उपयोग किया जाता है। पंचामृत दूध, दही, घी, शहद और शर्करा से तैयार किया जाता है। मिट्टी के टोंटीदार करवे में जल भरकर उसे पूजन सामग्री के साथ रखा जाता है। कई परिवारों में हलवा, मिठाई और अठावरी का नैवेद्य अर्पित करने की परंपरा भी है। पूजा की विधि और सामग्री परिवारों तथा क्षेत्रीय परंपराओं के अनुसार अलग अलग हो सकती है।
शाम के समय महिलाएं सामूहिक रूप से करवा चौथ की कथा सुनती हैं और पारंपरिक रीति रिवाजों का पालन करती हैं। चंद्रमा के दर्शन के समय छलनी से चंद्रमा को देखने और फिर पति का चेहरा देखने की परंपरा प्रचलित है। इसके बाद चंद्रदेव को अर्घ्य अर्पित किया जाता है। पति के हाथों से जल ग्रहण कर व्रत का पारण किया जाता है। यह परंपरा पति पत्नी के बीच प्रेम, विश्वास और एक दूसरे के प्रति समर्पण की भावना को अभिव्यक्त करती है।
क्या है करवा चौथ की पौराणिक कथा
करवा चौथ के अवसर पर वीरवती की कथा विशेष रूप से सुनाई जाती है। लोकपरंपरा के अनुसार, वीरवती अपने भाइयों की इकलौती बहन थीं। विवाह के बाद जब उन्होंने पहली बार करवा चौथ का व्रत रखा, तो भूख और प्यास के कारण उनकी स्थिति कमजोर होने लगी। अपनी बहन की परेशानी देखकर उनके भाइयों ने पेड़ के पीछे प्रकाश उत्पन्न कर उन्हें चंद्रमा के उदय होने का आभास कराया। वीरवती ने उस प्रकाश को चंद्रमा समझकर अर्घ्य दिया और भोजन कर लिया। कथा के अनुसार, व्रत समय से पहले खोलने के बाद उन्हें कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। बाद में उन्होंने श्रद्धा और नियमपूर्वक व्रत किया और उनके पति से जुड़ी विपत्ति दूर हुई। यह कथा व्रत के संकल्प और धार्मिक आस्था के महत्व को समझाने के लिए सुनाई जाती है।
करवा चौथ से जुड़ी एक अन्य प्रसिद्ध लोककथा पतिव्रता करवा की है। लोकमान्यता के अनुसार, करवा ने अपने पति की रक्षा के लिए साहस और दृढ़ संकल्प का परिचय दिया था। उनकी निष्ठा और समर्पण को इस पर्व की परंपरा में विशेष स्थान प्राप्त है। अलग अलग क्षेत्रों में इन कथाओं के विभिन्न रूप प्रचलित हैं, लेकिन इनके मूल भाव में प्रेम, विश्वास, निष्ठा और परिवार के कल्याण की कामना प्रमुख है।
धार्मिक आस्था के साथ दांपत्य प्रेम का प्रतीक
करवा चौथ का महत्व व्रत रखने और चंद्रमा के दर्शन करने तक सीमित नहीं है। यह पर्व पति पत्नी के बीच भावनात्मक जुड़ाव, परस्पर सम्मान और एक दूसरे के सुखद भविष्य की कामना को भी अभिव्यक्त करता है। समय के साथ इस पर्व के स्वरूप में बदलाव आया है। कई परिवारों में पति भी अपनी पत्नी के प्रति प्रेम और सम्मान व्यक्त करते हुए व्रत में सहभागी बनते हैं। हालांकि, व्रत की परंपराएं परिवार, क्षेत्र और व्यक्तिगत धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अलग अलग हो सकती हैं।
काशी की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान के बीच करवा चौथ का पर्व विशेष स्थान रखता है। घरों में पूजा की तैयारियों, पारंपरिक शृंगार, कथा श्रवण और चंद्रमा के दर्शन की प्रतीक्षा के बीच पर्व का उल्लास दिखाई दे रहा है। दिनभर उपवास रखने के बाद चंद्रमा को अर्घ्य अर्पित कर महिलाएं अपने पति और परिवार के सुखमय जीवन की कामना करेंगी। इस प्रकार करवा चौथ धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक विरासत और दांपत्य जीवन के प्रति समर्पण का पर्व है, जो पीढ़ियों से चली आ रही परंपराओं को जीवंत बनाए रखता है।
LATEST NEWS