वाराणसी में जमीन के नाम पर लाखों की ठगी का मामला कोर्ट के आदेश पर एफआईआर दर्ज करने के निर्देश
वाराणसी: जमीन दिलाने के नाम पर लाखों रुपये की कथित ठगी का एक गंभीर मामला सामने आया है, जिसने न केवल पीड़ित को गहरे संकट में डाल दिया बल्कि जमीन के लेनदेन में बढ़ते जोखिमों को भी उजागर कर दिया है। मामला इतना जटिल और संवेदनशील हो गया कि अंततः न्यायालय को हस्तक्षेप करना पड़ा। अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट कोर्ट संख्या 02 वाराणसी ने धारा 173 4 बीएनएसएस के तहत प्रार्थना पत्र स्वीकार करते हुए संबंधित थाने को एफआईआर दर्ज कर मामले की जांच के स्पष्ट निर्देश दिए हैं।
पीड़ित द्वारा प्रस्तुत प्रार्थना पत्र के अनुसार आरोपी ने उसे जमीन दिलाने का भरोसा देकर अपने प्रभाव और संपर्क का उपयोग करते हुए विश्वास में लिया। इसके बाद सुनियोजित तरीके से चंदौली जिले में स्थित एक जमीन दिखाकर उसे अपनी संपत्ति बताया और लगभग छह लाख रुपये में सौदा तय कराया। पीड़ित ने भरोसा करते हुए किस्तों में भुगतान किया जिसमें पांच लाख रुपये बैंक माध्यम से और शेष नकद दिए गए।
रजिस्ट्री के नाम पर टालमटोल और फिर संपर्क समाप्त
जब जमीन की रजिस्ट्री का समय आया तो आरोपी का व्यवहार बदलने लगा। कभी तारीख बदलना तो कभी स्थान बदलने की बात कहकर वह लगातार टालमटोल करता रहा। एक समय ऐसा भी आया जब उसने फोन उठाना तक बंद कर दिया। पीड़ित घंटों तक इंतजार करता रहा लेकिन आरोपी नहीं पहुंचा। इसके बाद जब पीड़ित ने आरोपी से संपर्क कर पैसे वापस मांगे तो उसे केवल आश्वासन मिला और समय बीतता गया।
चेक बाउंस और धमकी के आरोप
पीड़ित के अनुसार आरोपी ने बाद में एक चेक देकर रकम लौटाने का भरोसा दिलाया लेकिन वह चेक भी बाउंस हो गया। इसके बाद जब लगातार दबाव बनाया गया तो आरोपी द्वारा कथित रूप से गाली गलौज और जान से मारने की धमकी दी गई। पूरे घटनाक्रम से यह आशंका मजबूत होती है कि मामला केवल लेनदेन का विवाद नहीं बल्कि एक सोची समझी ठगी की साजिश हो सकती है।
वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने रखा सशक्त पक्ष
इस मामले में वरिष्ठ अधिवक्ता श्रीकांत प्रजापति ने पीड़ित की ओर से प्रभावी तरीके से पक्ष रखते हुए कहा कि इस तरह के प्रकरण समाज में बढ़ती धोखाधड़ी की प्रवृत्ति को दर्शाते हैं। उन्होंने बताया कि न्यायालय का हस्तक्षेप यह दर्शाता है कि कानून व्यवस्था अब ऐसे मामलों को गंभीरता से लेने के लिए बाध्य है। उन्होंने यह भी कहा कि न्यायालय का यह आदेश न केवल इस मामले में बल्कि अन्य पीड़ितों के लिए भी एक महत्वपूर्ण उदाहरण साबित हो सकता है।
वहीं अधिवक्ता धनंजय साहनी ने पूरे मामले का विधिक विश्लेषण प्रस्तुत करते हुए स्पष्ट किया कि इसमें आपराधिक साजिश और धोखाधड़ी के सभी तत्व मौजूद हैं। उन्होंने कहा कि जांच एजेंसियों को निष्पक्षता और तेजी के साथ कार्य करते हुए साक्ष्यों के आधार पर दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करनी चाहिए। उनके अनुसार कानून का प्रभाव तभी दिखता है जब पीड़ित को समय पर न्याय मिले और दोषी को दंड।
पहले भी की गई थी शिकायत
गौरतलब है कि पीड़ित ने इस मामले को लेकर पहले स्थानीय थाना और उच्च अधिकारियों के समक्ष भी शिकायत दर्ज कराई थी, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं होने पर उसे न्यायालय की शरण लेनी पड़ी। अब कोर्ट के आदेश के बाद पुलिस को विधिक प्रक्रिया के तहत एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू करनी होगी।
जमीन लेनदेन में सतर्कता की जरूरत
यह मामला एक बार फिर यह संकेत देता है कि जमीन जैसे बड़े निवेश में पूरी जांच और सत्यापन अत्यंत आवश्यक है। बिना पर्याप्त दस्तावेज और सत्यापन के किया गया लेनदेन गंभीर आर्थिक नुकसान का कारण बन सकता है। साथ ही यह भी स्पष्ट होता है कि जब प्रशासनिक स्तर पर कार्रवाई नहीं होती तो न्यायालय अंतिम सहारा बनकर सामने आता है।
फिलहाल सभी की नजर इस बात पर टिकी है कि पुलिस जांच किस दिशा में आगे बढ़ती है और पीड़ित को न्याय मिलने में कितना समय लगता है। इस पूरे प्रकरण ने न केवल एक व्यक्ति की पीड़ा को उजागर किया है बल्कि व्यवस्था में जवाबदेही की आवश्यकता को भी रेखांकित किया है।
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