जौनपुर/वाराणसी: में सियासी सरगर्मी के बीच तकनीक का घातक प्रहार, सांसद प्रिया सरोज की एआई फोटो मामले ने पकड़ा तूल
जौनपुर: उत्तर प्रदेश की राजनीति में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस एआई का एक ऐसा काला पक्ष सामने आया है जिसने जनप्रतिनिधियों की सुरक्षा और डिजिटल नैतिकता पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। मछलीशहर संसदीय क्षेत्र से समाजवादी पार्टी की युवा सांसद प्रिया सरोज की कथित तौर पर एआई तकनीक से तैयार की गई भ्रामक और आपत्तिजनक तस्वीरों को सोशल मीडिया पर प्रसारित करने के मामले में अब कानूनी शिकंजा कस गया है। वाराणसी स्थित साइबर क्राइम थाने में इस सनसनीखेज प्रकरण को लेकर भाजपा के जौनपुर जिला मीडिया प्रभारी आमोद सिंह और अधिवक्ता विशाल सिंह के विरुद्ध गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया है। यह मामला न केवल राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है बल्कि इसे एक महिला जनप्रतिनिधि के खिलाफ सुनियोजित चरित्र हनन की बड़ी साजिश के रूप में देखा जा रहा है।
तकनीक का दुरुपयोग और सियासी षड्यंत्र का आरोप
सांसद प्रिया सरोज ने इस पूरे मामले को लेकर अपनी कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। उनका स्पष्ट रूप से कहना है कि राजनीतिक विरोध अपनी जगह है लेकिन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ में किसी महिला की मर्यादा और उसकी सामाजिक छवि को धूमिल करने के लिए तकनीक का ऐसा प्रयोग कतई स्वीकार्य नहीं है। शिकायत के अनुसार आरोपियों ने फेसबुक और इंस्टाग्राम जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का सहारा लेकर एआई द्वारा संपादित ऐसी तस्वीरें साझा कीं जो पहली नजर में भ्रामक और अपमानजनक प्रतीत होती हैं। सांसद ने इसे अपनी बढ़ती राजनीतिक लोकप्रियता और सामाजिक साख को नुकसान पहुंचाने का एक संगठित प्रयास बताया है। उन्होंने पुलिस प्रशासन से मांग की है कि इस मामले में ऐसी कठोर कार्रवाई की जाए जो भविष्य में किसी भी डिजिटल अपराधी के लिए एक नजीर साबित हो सके।
पुलिस की कार्रवाई और डिजिटल साक्ष्यों का संजाल
वाराणसी साइबर क्राइम पुलिस ने मामले की गंभीरता को देखते हुए तत्काल प्रभाव से प्राथमिकी दर्ज कर ली है। जांच टीम अब उन डिजिटल फुटप्रिंट्स को खंगाल रही है जिनके जरिए ये तस्वीरें इंटरनेट पर फैलाई गईं। पुलिस को साक्ष्य के तौर पर कई स्क्रीनशॉट और लिंक उपलब्ध कराए गए हैं। साइबर विशेषज्ञ अब इस बात की जांच कर रहे हैं कि ये तस्वीरें मूल रूप से किस डीपफेक टूल या एआई सॉफ्टवेयर के जरिए बनाई गईं और सबसे पहले किस आईपी एड्रेस से इन्हें अपलोड किया गया। कानून के जानकारों का मानना है कि आईटी एक्ट की संबंधित धाराओं के साथ साथ मानहानि और जालसाजी की धाराओं में दर्ज यह मामला आरोपियों के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है क्योंकि डिजिटल साक्ष्य मिटाना लगभग नामुमकिन माना जाता है।
बचाव में तर्क सिर्फ शेयर किया बनाया नहीं
दूसरी ओर इस मामले में नामजद किए गए भाजपा नेता आमोद सिंह ने अपना पक्ष रखते हुए आरोपों को खारिज करने की कोशिश की है। उन्होंने सफाई देते हुए कहा कि उनकी मंशा किसी की छवि खराब करने की नहीं थी। उनका तर्क है कि संबंधित तस्वीरें पहले से ही सोशल मीडिया के विभिन्न समूहों और प्लेटफॉर्म पर वायरल हो रही थीं और उन्होंने केवल उन्हें डाउनलोड करके अपनी वॉल पर साझा किया था। सिंह का दावा है कि उन्होंने पोस्ट के साथ मर्यादित शब्दों का प्रयोग किया था लेकिन विवाद बढ़ने के बाद उन्होंने उक्त पोस्ट हटा लिया। हालांकि पुलिस इस दलील को किस तरह देखती है यह जांच का विषय बना हुआ है क्योंकि भ्रामक सामग्री को आगे बढ़ाना भी कानून के दायरे में जांच का हिस्सा हो सकता है।
एआई का बढ़ता खतरा और चुनावी नैतिकता
यह घटनाक्रम केवल एक प्राथमिकी तक सीमित नहीं है बल्कि यह आधुनिक दौर के उस खतरे की ओर भी संकेत करता है जहां सत्य और मशीनी झूठ के बीच का अंतर धीरे धीरे धुंधला होता जा रहा है। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में जहां राजनीति अक्सर व्यक्तिगत आरोपों और हमलों के इर्द गिर्द चर्चा में रहती है वहां एआई का यह प्रयोग एक नए खतरे के रूप में देखा जा रहा है। तकनीकी विशेषज्ञों और बुद्धिजीवियों का मानना है कि यदि समय रहते इस प्रकार की गतिविधियों पर प्रभावी नियंत्रण नहीं किया गया तो आने वाले समय में चुनावी संघर्ष वैचारिक मुद्दों की जगह डिजिटल प्रचार और चरित्र हनन की दिशा में बढ़ सकता है। फिलहाल पूरे मामले में वाराणसी पुलिस की आगामी कार्रवाई और जांच रिपोर्ट पर सभी की निगाहें टिकी हुई हैं।
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