वाराणसी: अदालत का बड़ा फैसला दशक भर पुराने एनडीपीएस मामले में राजकुमार यादव को मिली राहत, कानूनी गलियारों में चर्चा तेज
वाराणसी: उत्तर प्रदेश की न्याय नगरी काशी में वर्षों से लंबित एक हाई प्रोफाइल एनडीपीएस मामले ने उस वक्त एक नया मोड़ ले लिया जब स्थानीय अदालत ने आरोपी की जमानत अर्जी पर मुहर लगा दी। लगभग दस साल पुराने इस कानूनी प्रकरण में वाराणसी स्थित अपर सत्र न्यायाधीश एफटीसी 14वें वित्त आयोग की अदालत ने आरोपी राजकुमार यादव को सशर्त रिहाई के आदेश जारी किए हैं। यह निर्णय इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इसमें अभियोजन के कड़े विरोध के बावजूद बचाव पक्ष ने कानूनी तथ्यों और मानवीय संवेदनाओं का ऐसा ताना बाना बुना जिसने अदालत को संतुष्ट कर दिया।
यह पूरा मामला साल 2016 का है जब रोहनिया पुलिस ने एक विशेष अभियान के दौरान राजकुमार यादव को गिरफ्तार करने का दावा किया था। पुलिसिया रिकॉर्ड और मुकदमा अपराध संख्या 651 (2016) के अनुसार 4 सितंबर 2016 की दरम्यानी रात को आरोपी के पास से 300 ग्राम अफीम बरामद होने की बात कही गई थी। एनडीपीएस एक्ट की धारा 8/18 के तहत दर्ज इस मुकदमे ने शुरुआती दौर में काफी सुर्खियां बटोरी थीं लेकिन समय बीतने के साथ यह कानूनी पेचीदगियों और तारीखों के जाल में उलझता चला गया। इस लंबी अवधि के दौरान आरोपी की अनुपस्थिति और उसके खिलाफ जारी गैर जमानती वारंट ने मामले को और भी पेचीदा बना दिया था।
सुनवाई के दौरान अदालत में चली लंबी बहस
सुनवाई के दौरान अदालत का दृश्य काफी गहमागहमी भरा रहा। सरकारी वकील ने जमानत का पुरजोर विरोध करते हुए दलील दी कि नशीले पदार्थों की तस्करी समाज के लिए एक कैंसर की तरह है और आरोपी पूर्व में अदालती कार्यवाही से बचता रहा है। अभियोजन पक्ष ने रिकॉर्ड का हवाला देते हुए कहा कि आरोपी की लापरवाही के कारण ही न्यायिक प्रक्रिया में इतना विलंब हुआ इसलिए उसे किसी भी प्रकार की राहत देना न्यायोचित नहीं होगा। हालांकि जब बचाव पक्ष के वकीलों की टीम ने अपनी दलीलें शुरू कीं तो मामले का पलड़ा धीरे धीरे बदलता नजर आया।
अधिवक्ता श्रीकांत प्रजापति ने रखा कानूनी पक्ष
बचाव पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता श्रीकांत प्रजापति ने अदालत को आश्वस्त किया कि आरोपी अब पूरी तरह से कानून का पालन करने के लिए संकल्पबद्ध है। उन्होंने तार्किक रूप से स्पष्ट किया कि आरोपी ने स्वयं न्यायालय के समक्ष आत्मसमर्पण किया है जो उसके सुधरे हुए आचरण और न्याय व्यवस्था में अटूट विश्वास को दर्शाता है। श्री प्रजापति ने जोर देकर कहा कि लंबे समय तक जेल में रखना सजा का विकल्प नहीं हो सकता खासकर तब जब आरोपी ट्रायल में सहयोग करने का हलफनामा दे रहा हो।
अधिवक्ता विनोद यादव ने सामाजिक पक्ष रखा
वहीं अधिवक्ता विनोद यादव ने इस कानूनी लड़ाई को एक सामाजिक और पारिवारिक दृष्टिकोण प्रदान किया। उन्होंने अदालत के समक्ष आरोपी की पृष्ठभूमि रखते हुए बताया कि राजकुमार यादव एक साधारण दूध व्यवसायी है और अपने पूरे परिवार का इकलौता सहारा है। उन्होंने तर्क दिया कि एक व्यक्ति की लंबे समय तक अनुपस्थिति से न केवल न्यायिक कार्य प्रभावित होता है बल्कि एक पूरा परिवार भुखमरी की कगार पर पहुंच जाता है। उन्होंने अदालत से अपील की कि न्याय करते समय सामाजिक परिस्थितियों और आरोपी के जीविकोपार्जन के अधिकार को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।
अधिवक्ता धनंजय साहनी ने सुधार के अवसर पर दिया जोर
इस बहस को तार्किक परिणति तक पहुंचाते हुए अधिवक्ता धनंजय साहनी ने स्पष्ट किया कि आरोपी 15 अप्रैल 2026 से ही जिला कारागार वाराणसी में निरुद्ध है और उसने अपनी ओर से प्रायश्चित और सहयोग की भावना प्रदर्शित की है। उन्होंने कहा कि न्याय का मूल मंत्र केवल दंड देना नहीं बल्कि सुधार का अवसर प्रदान करना भी है। बचाव पक्ष की इन संयुक्त और प्रभावी दलीलों के बाद अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों और वर्तमान परिस्थितियों का बारीकी से अवलोकन किया।
एक दशक पुराने मामले में मिली सशर्त राहत
अंततः दोनों पक्षों की लंबी बहस सुनने के बाद अदालत ने राजकुमार यादव की दूसरी जमानत अर्जी को स्वीकार कर लिया। न्यायाधीश ने आरोपी को एक लाख रुपये के निजी मुचलके और उतनी ही राशि के दो स्थानीय जमानतदार पेश करने की शर्त पर रिहा करने का आदेश दिया। हालांकि अदालत ने कड़ी हिदायत दी है कि आरोपी मुकदमे की प्रत्येक तारीख पर हाजिर होगा और किसी भी गवाह या साक्ष्य को प्रभावित करने की कोशिश नहीं करेगा। एक दशक से चल रहे इस कानूनी संघर्ष में आई यह राहत न केवल आरोपी के परिवार के लिए बड़ी खबर है बल्कि यह फैसला कानूनी शोधकर्ताओं के लिए भी एक उदाहरण बन गया है कि कैसे ठोस पैरवी से जटिल मामलों में भी न्याय की राह आसान हो सकती है।
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