वाराणसी: रामनगर/स्वाधीनता के स्वर्णिम इतिहास का एक युग हुआ शांत, राष्ट्रभक्ति की अमर ज्योति हीरामणि देवी पंचतत्व में विलीन, अंतिम विदाई में उमड़ा भावनाओं का अथाह सागर
वाराणसी: रामनगर की धरती शनिवार को एक ऐसे क्षण की साक्षी बनी, जिसने केवल एक परिवार या एक शहर को नहीं, बल्कि उन सभी लोगों के हृदय को भावुक कर दिया जिनके भीतर देश, इतिहास और स्वतंत्रता संग्राम के प्रति सम्मान की भावना जीवित है। भारत के स्वतंत्रता आंदोलन की जीवंत गाथा और राष्ट्रसेवा, त्याग तथा संघर्ष की प्रतीक 94 वर्षीय स्वतंत्रता संग्राम सेनानी श्रीमती हीरामणि देवी का पंचतत्व में विलीन होना केवल एक व्यक्तित्व का अवसान नहीं, बल्कि स्वाधीनता के उस स्वर्णिम अध्याय का विराम माना जा रहा है जिसने देश को आजादी दिलाने के लिए अपना सबकुछ समर्पित कर दिया था।
मूल रूप से बिहार के भभुआ जनपद के रूपपुर गांव की निवासी और वर्तमान में रामनगर स्थित रोमा अपार्टमेंट में रह रहीं हीरामणि देवी के निधन की सूचना जैसे ही लोगों तक पहुंची, पूरे क्षेत्र में शोक और संवेदनाओं की लहर फैल गई। उनके आवास पर अंतिम दर्शन के लिए पहुंचने वालों का सिलसिला लगातार जारी रहा। हर आने वाला व्यक्ति केवल श्रद्धांजलि देने नहीं बल्कि स्वतंत्रता संघर्ष की उस जीवित विरासत को अंतिम प्रणाम करने पहुंच रहा था, जिसने अपने जीवन के संघर्ष से आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा देने का कार्य किया।
जब अंतिम यात्रा बनी भावनाओं और सम्मान का महासंगम
यह अंतिम यात्रा केवल एक पारंपरिक विदाई नहीं थी बल्कि यह राष्ट्र के प्रति समर्पित जीवन को नमन करने का वह क्षण था जहां आंखों में आंसू और दिलों में सम्मान एक साथ दिखाई दे रहे थे। इस दुखद और भावुक घड़ी में कैंट विधायक सौरभ श्रीवास्तव ने भी संवेदनशीलता का परिचय देते हुए अपने सभी कार्यक्रमों को स्थगित कर सीधे रामनगर स्थित उनके आवास पर पहुंचकर श्रद्धांजलि अर्पित की।
उन्होंने पार्थिव शरीर पर पुष्प अर्पित कर गहरी संवेदना व्यक्त की और एक आत्मीय संबंध की तरह अंतिम यात्रा में कंधा देकर उन्हें विदाई दी। वहां मौजूद लोगों ने इस दृश्य को अत्यंत भावुक बताया। कई लोगों की आंखें उस समय नम हो गईं जब अंतिम यात्रा के दौरान जनप्रतिनिधि और आम नागरिक एक साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रहे थे।
भारत माता के जयकारों के बीच गूंजती रही अमर रहने की आवाज
अंतिम यात्रा के दौरान वातावरण केवल शोक से नहीं बल्कि गर्व और सम्मान की भावना से भी भरा दिखाई दिया। भारत माता के जयकारों और हीरामणि देवी अमर रहें के नारों से पूरा वातावरण गूंजता रहा। ऐसा लग रहा था मानो एक युग अपने अंतिम पड़ाव की ओर बढ़ रहा हो और हजारों दिल उस युग को आंखों से विदा कर रहे हों।
इस दौरान बड़ी संख्या में भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ता, सामाजिक कार्यकर्ता, बुद्धिजीवी और स्थानीय नागरिक मौजूद रहे। अंतिम यात्रा में शामिल हर व्यक्ति के चेहरे पर भावुकता साफ दिखाई दे रही थी। उपस्थित लोगों में संतोष द्विवेदी, डॉ अनुपम गुप्ता, जीतेन्द्र पांडेय, सृजन श्रीवास्तव, रितेश राय, रितेश पाल, ऋषभ सिन्हा, कुलदीप सेठ, गोविन्द मौर्य, सुरेश बहादुर सिंह, बबलू निषाद सहित कई प्रमुख लोग शामिल रहे।
जब भारत छोड़ो आंदोलन में दिखाई थी अदम्य साहस की मिसाल
हीरामणि देवी केवल स्वतंत्रता सेनानी नहीं थीं बल्कि उनका जीवन साहस, संघर्ष और राष्ट्रभक्ति की जीवित कहानी रहा। वर्ष 1942 के ऐतिहासिक भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान जब देश अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ एकजुट होकर सड़कों पर उतरा था, तब उन्होंने भी पूरे साहस के साथ इस आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई थी।
देशभक्ति के इसी जज्बे ने उन्हें अंग्रेजी शासन के दमन का सामना करने के लिए मजबूर किया। उन्हें पटना जेल में कारावास की कठिन परिस्थितियों से गुजरना पड़ा, लेकिन उनके हौसले कभी कमजोर नहीं पड़े। वह हर परिस्थिति में देशहित को सर्वोपरि मानती रहीं।
आजादी के बाद शिक्षा को बनाया समाज परिवर्तन का माध्यम
देश की आजादी के बाद उन्होंने संघर्ष का रास्ता नहीं छोड़ा बल्कि समाज निर्माण का नया अध्याय शुरू किया। उन्होंने शिक्षा को समाज परिवर्तन का सबसे सशक्त माध्यम माना और सरकारी विद्यालय में प्रधानाचार्या के रूप में कार्य करते हुए हजारों विद्यार्थियों का भविष्य संवारने का कार्य किया। बिहार की मोहनिया और भभुआ क्षेत्र उनकी कर्मभूमि रहे, जहां उन्होंने शिक्षा और समाज सेवा के जरिए अनेक लोगों के जीवन को दिशा देने का प्रयास किया।
उनका जीवन केवल व्यक्तिगत उपलब्धियों तक सीमित नहीं था बल्कि वह समाज और राष्ट्र के लिए निरंतर समर्पण का प्रतीक बन गया।
देशभक्ति इस परिवार की पहचान रही
हीरामणि देवी का परिवार भी राष्ट्रसेवा और जनहित के मूल्यों से जुड़ा रहा। उनके पति स्वर्गीय शिव परीक्षा सिंह भी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे और देश की आजादी के संघर्ष में सक्रिय भूमिका निभा चुके थे। बाद में वह वर्ष 1977 में विधायक भी निर्वाचित हुए। इस परिवार ने अपने जीवन का हर अध्याय समाज और देश के नाम समर्पित किया।
आज भले ही हीरामणि देवी हमारे बीच भौतिक रूप से मौजूद नहीं हैं, लेकिन उनका संघर्ष, उनकी राष्ट्रभक्ति, उनकी शिक्षा के प्रति निष्ठा और समाज सेवा की भावना आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बनकर हमेशा जीवित रहेगी। इतिहास के पन्नों में उनका नाम केवल एक स्वतंत्रता सेनानी के रूप में नहीं बल्कि एक ऐसी प्रेरक शक्ति के रूप में दर्ज रहेगा, जिसने अपने जीवन से राष्ट्रप्रेम को जीवंत रूप दिया।
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