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काशी में मां कालरात्रि की आराधना से गूंजा देवी धाम: नवरात्रि सप्तमी पर विशेष पूजा

Sandeep Srivastava Sub Editor News Report Newspaper
Last updated: 17/10/2026 07:45
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Sandeep Srivastava
Sandeep Srivastava Sub Editor News Report Newspaper
BySandeep Srivastava
Sandeep Srivastava serves as a Sub Editor at News Report, a registered Hindi newspaper dedicated to ethical, accurate, and reader-focused journalism. He is responsible for copy...
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11 Min Read
काशी के कालिका गली स्थित मंदिर में मां कालरात्रि की मूर्ति, आसपास पूजा करते श्रद्धालु।
शारदीय नवरात्रि की सप्तमी पर काशी के देवी धाम में मां कालरात्रि की विशेष आराधना की गई।
Contents
  • काशी में मां कालरात्रि की आराधना से गूंजा देवी धाम
  • काशी की नवदुर्गा परंपरा में मां कालरात्रि का विशेष स्थान
  • कैसा है मां कालरात्रि का दिव्य स्वरूप
  • मां कालरात्रि की पौराणिक कथा
  • सप्तमी पर मां कालरात्रि की पूजा विधि
  • मां कालरात्रि का मूल पूजा मंत्र
  • मां कालरात्रि का ध्यान श्लोक
  • देवी की सार्वभौमिक स्तुति
  • मां कालरात्रि को गुड़ का भोग लगाने की परंपरा
  • मां कालरात्रि की पूजा का धार्मिक महत्व
  • मां शुभंकरी का संदेश साहस और सदाचार के मार्ग पर चलें

काशी में मां कालरात्रि की आराधना से गूंजा देवी धाम

वाराणसी। धर्म और अध्यात्म की प्राचीन नगरी काशी में शारदीय नवरात्रि के सातवें दिन शनिवार 17 अक्टूबर 2026 को मां दुर्गा के सातवें स्वरूप मां कालरात्रि की पूजा अर्चना की जा रही है। नवरात्रि की सप्तमी तिथि पर मां के दर्शन और पूजन का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। काशी के चौक क्षेत्र स्थित कालिका गली में विराजमान मां कालरात्रि के मंदिर का नवदुर्गा दर्शन परंपरा में विशेष स्थान है। मान्यता है कि मां कालरात्रि अपने भक्तों के भय और संकट दूर कर उन्हें साहस तथा शक्ति प्रदान करती हैं। इसी कारण उन्हें शुभंकरी नाम से भी जाना जाता है। श्रद्धालु मां के चरणों में शीश झुकाकर परिवार की सुख समृद्धि आरोग्य और शांति की कामना करते हैं।

काशी की नवदुर्गा परंपरा में मां कालरात्रि का विशेष स्थान

काशी में नवरात्रि के दौरान नवदुर्गा के नौ स्वरूपों के दर्शन की प्राचीन धार्मिक परंपरा निभाई जाती है। इस परंपरा के अनुसार नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी तीसरे दिन मां चंद्रघंटा चौथे दिन मां कूष्मांडा पांचवें दिन मां स्कंदमाता छठे दिन मां कात्यायनी सातवें दिन मां कालरात्रि आठवें दिन मां महागौरी और नौवें दिन मां सिद्धिदात्री की आराधना की जाती है। सप्तमी के दिन मां कालरात्रि का दर्शन इस धार्मिक यात्रा का महत्वपूर्ण पड़ाव माना जाता है। कालिका गली स्थित मंदिर में दर्शन करने पहुंचने वाले श्रद्धालु देवी के समक्ष पूजा अर्चना कर अपने जीवन में सुख शांति और सकारात्मकता की कामना करते हैं। हालांकि वर्तमान में मंदिर में श्रद्धालुओं की भीड़ और कतारों की वास्तविक स्थिति की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है।

कैसा है मां कालरात्रि का दिव्य स्वरूप

धार्मिक ग्रंथों में मां कालरात्रि का स्वरूप अत्यंत तेजस्वी और उग्र बताया गया है। उनका वर्ण श्याम है और उनके केश खुले हुए हैं। देवी के तीन नेत्रों का वर्णन मिलता है जिनसे दिव्य तेज प्रकट होता है। पारंपरिक मान्यता के अनुसार उनके गले में विद्युत के समान चमकने वाली माला सुशोभित रहती है। उनका वाहन गर्दभ अर्थात गधा माना जाता है। मां के चार हाथों का वर्णन मिलता है। इनमें से दो हाथों में अस्त्र धारण करने और अन्य दो हाथों से भक्तों को अभय तथा वरदान देने की मुद्रा का उल्लेख है। देवी का यह स्वरूप अधर्म के विनाश और धर्म की रक्षा का प्रतीक माना जाता है।

मां कालरात्रि का स्वरूप देखने में भले ही भयकारी प्रतीत होता हो लेकिन धार्मिक मान्यताओं में उन्हें भक्तों का कल्याण करने वाली देवी माना गया है। काल का संबंध समय और विनाश से तथा रात्रि का संबंध अंधकार से जोड़ा जाता है। इस दृष्टि से मां कालरात्रि का नाम भय अज्ञान और नकारात्मकता पर विजय पाने वाली शक्ति का प्रतीक माना जाता है। भक्त उन्हें शुभंकरी कहकर स्मरण करते हैं और प्रार्थना करते हैं कि उनके जीवन में आने वाली कठिनाइयों का सामना करने के लिए साहस और विवेक प्राप्त हो।

मां कालरात्रि की पौराणिक कथा

मां कालरात्रि की आराधना का संबंध देवी शक्ति के उन पौराणिक आख्यानों से जुड़ा है जिनमें देवी ने दानवी शक्तियों का अंत कर धर्म की रक्षा की। देवी माहात्म्य जिसे दुर्गा सप्तशती भी कहा जाता है उसमें चंड मुंड और रक्तबीज जैसे असुरों के विरुद्ध देवी के युद्ध का वर्णन मिलता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार जब दानवी शक्तियों के अत्याचार से देवता परेशान हुए तो उन्होंने आदिशक्ति की आराधना की। इसके बाद देवी ने विभिन्न स्वरूपों में प्रकट होकर असुरों का सामना किया। इन कथाओं में देवी की शक्ति को अन्याय और अधर्म के विनाश का आधार बताया गया है।

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रक्तबीज की कथा देवी शक्ति के उग्र स्वरूप से जुड़ी प्रमुख कथाओं में शामिल है। पौराणिक वर्णन के अनुसार रक्तबीज को ऐसा वरदान प्राप्त था कि उसके रक्त की बूंद धरती पर गिरने से उसके समान एक नया असुर उत्पन्न हो जाता था। इस कारण युद्ध में उसे पराजित करना कठिन हो गया। तब देवी ने उसके रक्त को धरती पर गिरने से रोकने की युक्ति अपनाई और अंततः उसका वध किया। देवी माहात्म्य में इस प्रसंग के साथ काली और चामुंडा के स्वरूपों का भी वर्णन मिलता है। अलग अलग धार्मिक परंपराओं में मां कालरात्रि और इन उग्र देवी स्वरूपों के बीच संबंध की व्याख्या में अंतर हो सकता है। इस कथा का आध्यात्मिक संदेश यह है कि बुराइयों का सामना करने के लिए साहस विवेक और दृढ़ संकल्प आवश्यक हैं।

सप्तमी पर मां कालरात्रि की पूजा विधि

नवरात्रि के सातवें दिन मां कालरात्रि की पूजा प्रातः स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करके की जाती है। पूजा स्थल को साफ करने के बाद मां दुर्गा की प्रतिमा या तस्वीर के सामने दीप प्रज्वलित किया जाता है। इसके बाद गणेश जी का स्मरण करके देवी की पूजा का संकल्प लिया जाता है। जिन घरों में नवरात्रि के पहले दिन कलश स्थापना की गई है वहां अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार कलश और अखंड ज्योति की पूजा की जाती है। मां को पुष्प अक्षत रोली चंदन धूप और दीप अर्पित किए जाते हैं। इसके बाद देवी के मंत्रों का जाप दुर्गा चालीसा या दुर्गा सप्तशती का पाठ और आरती की जाती है।

धार्मिक परंपरा में मां कालरात्रि को गुड़ अथवा गुड़ से बनी मिठाई का भोग लगाने का उल्लेख मिलता है। श्रद्धालु अपनी सामर्थ्य और पारिवारिक परंपरा के अनुसार फल तथा अन्य नैवेद्य भी अर्पित कर सकते हैं। पूजा के बाद देवी को प्रणाम कर प्रसाद वितरित किया जाता है। व्रत रखने वाले श्रद्धालु अपनी सेहत और क्षमता के अनुसार फलाहार करते हैं। धार्मिक आस्था में बाहरी अनुष्ठानों के साथ मन की एकाग्रता संयम सदाचार और श्रद्धा को भी महत्वपूर्ण माना जाता है।

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मां कालरात्रि का मूल पूजा मंत्र

मां कालरात्रि की पूजा के दौरान इस मंत्र का जाप किया जाता है।

ॐ देवी कालरात्र्यै नमः

इस मंत्र के माध्यम से भक्त मां कालरात्रि को नमन करते हुए उनके शक्ति स्वरूप का स्मरण करते हैं और जीवन में साहस शांति तथा कल्याण की कामना करते हैं। श्रद्धालु अपनी श्रद्धा और सुविधानुसार मंत्र का जाप कर सकते हैं।

मां कालरात्रि का ध्यान श्लोक

एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता

लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी

वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टकभूषणा

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वर्धनमूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयंकरी

यह ध्यान श्लोक मां कालरात्रि के पारंपरिक स्वरूप का वर्णन करता है। इसके माध्यम से भक्त देवी के दिव्य तेज और शक्ति का ध्यान करते हैं।

देवी की सार्वभौमिक स्तुति

या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः

इस श्लोक का भाव है कि जो देवी समस्त प्राणियों में शक्ति के रूप में विद्यमान हैं उन्हें बार बार नमन है। यह स्तुति देवी की सर्वव्यापकता और सृष्टि में व्याप्त शक्ति का स्मरण कराती है।

मां कालरात्रि को गुड़ का भोग लगाने की परंपरा

नवरात्रि की सप्तमी पर मां कालरात्रि को गुड़ अथवा गुड़ से बनी मिठाई अर्पित करने की परंपरा प्रचलित है। इसके साथ पुष्प फल और अन्य नैवेद्य भी श्रद्धा के अनुसार चढ़ाए जाते हैं। भोग लगाने के बाद देवी की आरती की जाती है और प्रसाद वितरित किया जाता है। धार्मिक मान्यता में भोग अर्पित करना देवी के प्रति श्रद्धा कृतज्ञता और समर्पण व्यक्त करने का माध्यम है। पूजा में किसी विशेष सामग्री को लेकर अनावश्यक दिखावा करने के बजाय श्रद्धा और सदाचार को महत्व दिया जाता है।

मां कालरात्रि की पूजा का धार्मिक महत्व

मां कालरात्रि की आराधना का आध्यात्मिक संदेश भय और निराशा का सामना साहस तथा विवेक के साथ करना है। धार्मिक मान्यताओं में उन्हें संकटों से रक्षा करने वाली देवी माना जाता है। सप्तमी के दिन श्रद्धालु उनसे प्रार्थना करते हैं कि उनके मन से भय दूर हो और वे कठिन परिस्थितियों में सही निर्णय लेने की शक्ति प्राप्त करें। देवी का उग्र स्वरूप यह संदेश देता है कि अन्याय और बुराई के सामने खड़े होने के लिए दृढ़ इच्छाशक्ति आवश्यक है। इसी कारण मां कालरात्रि की पूजा को साहस आत्मविश्वास और आध्यात्मिक शक्ति से जोड़कर देखा जाता है।

काशी में नवदुर्गा दर्शन की परंपरा केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं है बल्कि यह नगर की प्राचीन सांस्कृतिक विरासत और जन आस्था से भी जुड़ी है। कालिका गली स्थित मां कालरात्रि मंदिर में सप्तमी के दिन दर्शन करने वाले श्रद्धालु परिवार के मंगल बच्चों के उज्ज्वल भविष्य और समाज में सुख शांति की कामना करते हैं। पुराने शहर की संकरी गलियों में दर्शन के लिए पहुंचने वाले लोगों को स्थानीय आवागमन की स्थिति का ध्यान रखना चाहिए और बुजुर्गों तथा बच्चों की सुविधा का विशेष ख्याल रखना चाहिए।

मां शुभंकरी का संदेश साहस और सदाचार के मार्ग पर चलें

नवरात्रि का सातवां दिन मां कालरात्रि की पूजा के साथ आत्ममंथन और सकारात्मक बदलाव का अवसर भी माना जाता है। देवी का स्वरूप भक्तों को भय और नकारात्मक विचारों से बाहर निकलने तथा कठिन परिस्थितियों में धैर्य बनाए रखने की प्रेरणा देता है। मां की आराधना के माध्यम से श्रद्धालु अपने जीवन में सत्य साहस करुणा और सदाचार को अपनाने का संकल्प लेते हैं।

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