बुरा ना मानो होली है, संपादकीय कक्ष से निकल कर बनारसी फगुनाहट में रंगी पूरी टीम
वाराणसी: फागुन की हवा जब काशी की गलियों से गुजरती है तो उसका असर सीधे दिल पर होता है। यहां मौसम सिर्फ बदलता नहीं, मिजाज भी बदल देता है। यही रंग इस बार हमारे समाचार पत्र के संपादकीय कक्ष में भी साफ दिखाई दे रहा है। जहां सामान्य दिनों में खबरों की गंभीरता, शब्दों की सटीकता और शीर्षकों की धार पर लंबी बहसें होती हैं, वहीं इन दिनों माहौल में गुलाल सी हल्की मुस्कान और ठहाकों की मिठास घुली हुई है। काम जारी है, खबरें बन रही हैं, लेकिन अंदाज में फागुन की छौंक साफ महसूस की जा सकती है।
गंभीर संपादक पर चढ़ा बनारसी रंग
चीफ एडिटर आकाश तिवारी उर्फ मृदुल जी, जो आम दिनों में अपनी सधी हुई भाषा और तेज संपादकीय टिप्पणियों के लिए जाने जाते हैं, इन दिनों कुछ अलग ही अंदाज में नजर आ रहे हैं। मीटिंग शुरू होती है तो पहले फाइलें खुलती हैं, फिर अचानक सवाल उठता है कि इस बार होली का रंग किस पर पहले चढ़ेगा। टीम के सदस्य भी पीछे नहीं रहते। कोई कहता है कि सर पर तो पहले से ही सभी रंगों का असर है, बस गुलाल की औपचारिकता बाकी है। गंभीर चेहरों के बीच यह हल्की नोकझोंक पूरे माहौल को जीवंत बना देती है।
सब एडिटर की हेडिंग में तुकबंदी
सब एडिटर संदीप श्रीवास्तव, जो हर अल्पविराम और पूर्ण विराम पर बारीकी से नजर रखते हैं, इन दिनों शीर्षकों में भी फागुनी तुकबंदी खोज लेते हैं। हाल ही में उन्होंने मुस्कुराते हुए सुझाव दिया कि एक दिन की हेडिंग हो फागुन आया संपादक मुस्कुराया। यह सुनते ही कक्ष में ठहाके गूंज उठे। किसी ने मजाक में कहा कि ध्यान रखिए कहीं प्रूफ की स्याही में भी रंग न घुल जाए। काम की गंभीरता बरकरार है, पर उसमें अपनापन और सहजता की परत जुड़ गई है।
रिपोर्टिंग टीम में भी रंग और रस
दिलीप जी अपने ठेठ बनारसी अंदाज के लिए पहले से पहचाने जाते हैं। इन दिनों उनके चेहरे पर ऐसी शरारती मुस्कान रहती है मानो किसी को रंग लगाने की योजना मन में चल रही हो। सावन नायक का जोश फागुन में और बढ़ जाता है। हर थोड़ी देर में पूछ लेते हैं कि इस बार ठंडई का इंतजाम कौन देखेगा। पद्युम पटेल ने तो बाकायदा मन ही मन योजना बना ली है कि किसे किस दिन चुपके से रंगा जाएगा।
तपेश्वर चौधरी, जिनकी रिपोर्टिंग में हमेशा तीखापन नजर आता है, कहते हैं कि होली पर खबर भी ऐसी लिखी जाए जिसमें रस और मुस्कान दोनों हों। अमित मिश्रा हमेशा की तरह माहौल को हल्का रखने में आगे रहते हैं। उनका सुझाव है कि संपादकीय में भी दो पंक्तियां फागुन पर जरूर होनी चाहिए ताकि पाठक भी मुस्कुरा उठें। अमित वर्मा पूरे माहौल को सहेजते हुए कभी किसी को छेड़ते हैं तो कभी खुद ही रंगे जाने की तैयारी में दिखते हैं।
बैठक से बैठकी तक का सफर
इन दिनों संपादकीय बैठकें थोड़ी अलग रंगत में हो रही हैं। चाय के साथ चर्चा सिर्फ ब्रेकिंग खबरों की नहीं, बल्कि इस बात की भी होती है कि होली पर दफ्तर का माहौल कैसा रहेगा। कोई कहता है कि सबसे पहले चीफ एडिटर को गुलाल लगाया जाए, तो कोई सब एडिटर को रंगे बिना होली अधूरी मानता है। यह सब हल्के फुल्के अंदाज में होता है, लेकिन काम की रफ्तार पर इसका कोई असर नहीं पड़ता।
काशी की होली और अपनापन
काशी की होली की खासियत यही है कि यहां मजाक में भी स्नेह होता है और ठिठोली में भी अपनापन। पुरानी बातों को हंसी में याद करना, एक दूसरे को चिढ़ाना और फिर गले मिल जाना, यही बनारसी परंपरा है। हमारी पूरी न्यूज रिपोर्ट टीम भी इसी रंग में रंगी हुई है। खबरें बन रही हैं, बहसें भी हो रही हैं, लेकिन चेहरे पर मुस्कान बनी हुई है।
अगर इस लेख में किसी की थोड़ी ज्यादा खिंचाई हो गई हो या किसी पर रंग कुछ अधिक चढ़ गया हो तो इसे दिल पर न लें। यह फागुन की मस्ती है, काशी की बयार है और हमारी टीम की तरफ से पाठकों को एक स्नेह भरा अभिवादन है। बाकी तो आप समझ ही गए होंगे।
बुरा ना मानो होली है।
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