अवैध डॉग फाइटिंग पर हाई कोर्ट का अहम फैसला, कोई भी दर्ज करा सकता है एफआईआर
पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने अवैध डॉग फाइटिंग जैसे क्रूर और गैरकानूनी कृत्यों को लेकर महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि ऐसे मामलों में यदि कोई संज्ञेय अपराध सामने आता है, तो कोई भी व्यक्ति, भले ही वह पीड़ित न हो, एफआईआर दर्ज करा सकता है।
एफआईआर दर्ज करना पुलिस की जिम्मेदारी
चीफ जस्टिस शील नागू और जस्टिस संजीव बेरी की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि यदि किसी संज्ञेय अपराध की सूचना दी जाती है, तो पुलिस के लिए एफआईआर दर्ज करना अनिवार्य है। यदि पुलिस ऐसा करने से इनकार करती है, तो संबंधित व्यक्ति को कानूनी उपाय अपनाने का अधिकार है।
जनहित याचिका पर सुनाया गया फैसला
यह फैसला भारती रामचंद्रन द्वारा दायर जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया गया। याचिका में राज्य सरकार को अवैध डॉग फाइटिंग पर रोक लगाने और स्वतंत्र जांच एजेंसी गठित करने के निर्देश देने की मांग की गई थी।
अदालत ने कहा कि इस तरह के मामलों से निपटने के लिए मौजूदा कानून पर्याप्त हैं और उनके तहत कार्रवाई की जा सकती है।
कानून में पहले से मौजूद हैं प्रावधान
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से दायर हलफनामे में बताया गया कि प्रत्येक जिले में पशु क्रूरता निवारण सोसाइटी का गठन किया जा चुका है, जिसकी अध्यक्षता उपायुक्त करते हैं। ये संस्थाएं पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 के तहत कार्य कर रही हैं और उन्हें ऐसे मामलों में कार्रवाई का अधिकार है।
अदालत ने माना कि जब इस तरह का ढांचा पहले से मौजूद है, तो अलग से स्वतंत्र जांच एजेंसी की आवश्यकता नहीं है।
डॉग फाइटिंग है दंडनीय अपराध
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 की धारा 11(1) के तहत पशुओं के साथ मारपीट, यातना देना या अनावश्यक पीड़ा पहुंचाना दंडनीय अपराध है।
वहीं धारा 31 के तहत किसी स्थान पर पशु लड़ाई आयोजित करना, उसका प्रबंधन करना या इसके लिए धन लेना संज्ञेय अपराध की श्रेणी में आता है।
समस्या कानून की नहीं, क्रियान्वयन की
याचिका में आरोप लगाया गया था कि कुछ लोग निजी तौर पर खतरनाक नस्ल के कुत्तों की लड़ाई कराते हैं और संबंधित अधिकारी इस पर प्रभावी कार्रवाई नहीं कर रहे हैं। इस पर कोर्ट ने टिप्पणी की कि समस्या कानून की कमी नहीं, बल्कि उसके सही और प्रभावी क्रियान्वयन की है।
अदालत ने याचिका का किया निपटारा
अंततः हाई कोर्ट ने यह कहते हुए याचिका का निपटारा कर दिया कि मौजूदा कानूनी व्यवस्था पर्याप्त है और अतिरिक्त निर्देश देने की आवश्यकता नहीं है। साथ ही अदालत ने यह संदेश दिया कि ऐसे अपराधों पर रोक लगाने के लिए प्रशासन और नागरिक दोनों को सक्रिय भूमिका निभानी होगी।
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