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इलाहाबाद हाईकोर्ट का लिव इन पर बड़ा फैसला: संबंध खत्म होने पर महिला को गुजारा भत्ता का अधिकार

Sandeep Srivastava Sub Editor News Report Newspaper
Last updated: 20/02/2026 11:06
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Sandeep Srivastava
Sandeep Srivastava Sub Editor News Report Newspaper
BySandeep Srivastava
Sandeep Srivastava serves as a Sub Editor at News Report, a registered Hindi newspaper dedicated to ethical, accurate, and reader-focused journalism. He is responsible for copy...
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4 Min Read
न्याय के तराजू और लिव इन रिलेशनशिप में एक जोड़े का प्रतीकात्मक चित्रण
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लिव इन रिलेशनशिप में रहने वाली महिलाओं के गुजारा भत्ता अधिकार पर महत्वपूर्ण निर्णय दिया।
Contents
  • प्रयागराज में लिव इन रिलेशनशिप पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की अहम कानूनी व्याख्या
  • मामले की पृष्ठभूमि और न्यायालय का दृष्टिकोण
  • लिव इन रिलेशनशिप पर कानूनी दृष्टि
  • आधुनिक सामाजिक संदर्भ में जिम्मेदारी का सिद्धांत
  • कानूनी विशेषज्ञों की राय और सामाजिक प्रभाव
  • निष्कर्ष

प्रयागराज में लिव इन रिलेशनशिप पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की अहम कानूनी व्याख्या

प्रयागराज में स्थित हाइकोर्ट ने लिव इन रिलेशनशिप से जुड़े अधिकारों और जिम्मेदारियों को लेकर एक अहम कानूनी व्याख्या प्रस्तुत की है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई महिला किसी पुरुष के साथ लंबे समय तक पति पत्नी की तरह रह चुकी है और बाद में संबंध समाप्त हो जाता है तो उसे गुजारा भत्ता पाने का अधिकार है। न्यायालय ने यह भी कहा कि केवल औपचारिक विवाह का प्रमाण न होने के आधार पर पुरुष अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते। इस फैसले को सामाजिक यथार्थ के अनुरूप माना जा रहा है जहां कई जोड़े बिना औपचारिक विवाह के वर्षों तक साथ जीवन बिताते हैं।

मामले की पृष्ठभूमि और न्यायालय का दृष्टिकोण

यह मामला एक लोको पायलट द्वारा दायर याचिका से जुड़ा था जिसमें निचली अदालत के भरण पोषण संबंधी आदेश को चुनौती दी गई थी। डिवीजन बेंच ने तथ्यों और रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों के आधार पर निचली अदालत के आदेश को सही ठहराया। अदालत ने माना कि दोनों पक्ष लंबे समय तक पति पत्नी की तरह साथ रहे थे। उन्होंने घरेलू जीवन साझा किया और महिला की सामाजिक पहचान भी उसी संबंध के आधार पर बनी थी। ऐसे में संबंध समाप्त होने के बाद महिला को आर्थिक रूप से असहाय छोड़ देना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता।

लिव इन रिलेशनशिप पर कानूनी दृष्टि

न्यायालय ने अपने फैसले में यह रेखांकित किया कि भारतीय समाज में लिव इन रिलेशनशिप को लेकर भिन्न भिन्न धारणाएं हो सकती हैं। इसके बावजूद जब कोई रिश्ता लंबे समय तक स्थिर रूप में चलता है और दोनों पक्षों के आचरण से पति पत्नी जैसा संबंध स्पष्ट होता है तो कानून उस रिश्ते की वास्तविकता को नजरअंदाज नहीं कर सकता। अदालत के अनुसार कानून केवल दस्तावेजी औपचारिकताओं तक सीमित नहीं है बल्कि रिश्ते की प्रकृति उसकी अवधि और उसमें शामिल पक्षों की परस्पर निर्भरता को भी ध्यान में रखता है।

आधुनिक सामाजिक संदर्भ में जिम्मेदारी का सिद्धांत

फैसले में यह भी कहा गया कि आधुनिक समय में रिश्तों के स्वरूप बदल रहे हैं लेकिन जिम्मेदारी का सिद्धांत नहीं बदला है। कोई व्यक्ति वर्षों तक साथ रहने के बाद यह कहकर अपनी जिम्मेदारी से पीछे नहीं हट सकता कि विवाह पंजीकृत नहीं था या धार्मिक रीति रिवाजों के अनुसार शादी नहीं हुई थी। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि भरण पोषण का उद्देश्य किसी को दंडित करना नहीं है बल्कि उस व्यक्ति को सम्मानजनक जीवन जीने का अवसर देना है जो संबंध टूटने के बाद कमजोर स्थिति में आ जाता है।

कानूनी विशेषज्ञों की राय और सामाजिक प्रभाव

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यह निर्णय लिव इन रिलेशनशिप से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण नजीर के रूप में देखा जाएगा। इससे यह संदेश जाता है कि लंबे समय तक चले रिश्तों में जिम्मेदारी से बचने की कोशिशों को अदालतें गंभीरता से नहीं लेंगी। सामाजिक स्तर पर भी यह फैसला एक स्पष्ट संकेत देता है कि रिश्तों में केवल साथ रहना ही नहीं बल्कि एक दूसरे के प्रति जिम्मेदारी निभाना भी उतना ही आवश्यक है।

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निष्कर्ष

कुल मिलाकर यह फैसला उन महिलाओं के लिए राहत की खबर के रूप में देखा जा रहा है जो लिव इन रिलेशनशिप में वर्षों तक साथ रहने के बाद अलगाव की स्थिति में आर्थिक असुरक्षा का सामना करती हैं। प्रयागराज से आए इस फैसले को कानूनी दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है और यह बदलते सामाजिक संदर्भ में रिश्तों की जिम्मेदारियों को समझने की दिशा में एक ठोस कदम के रूप में देखा जा रहा है।

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TAGGED:इलाहाबाद हाईकोर्टकानूनी खबरगुजारा भत्ताप्रयागराजफैमिली लॉमहिला अधिकारलिव इन रिलेशनशिप
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