वाराणसी: मोक्षदायिनी काशी में ऋतुराज बसंत के आगमन का अर्थ केवल मौसम में बदलाव नहीं होता, बल्कि यह संकेत होता है कि देवाधिदेव महादेव के विवाह के मंगल कार्य अब आरम्भ होने वाले हैं। परम्पराओं के इस शहर में, जहाँ शिव कण-कण में बसते हैं, वहां बसंत पंचमी (शुक्रवार) के पावन अवसर पर एक ऐसी अलौकिक घटना साक्षी बनने जा रही है, जिसका इंतजार हर काशीवासी साल भर करता है।
टेढ़ीनीम स्थित श्री काशी विश्वनाथ मंदिर के महंत आवास पर बाबा विश्वनाथ की चल रजत प्रतिमा के ‘तिलकोत्सव’ के साथ ही काशी के सुप्रसिद्ध लोकउत्सव “तिलकोत्सव से रंगोत्सव” की औपचारिक और भव्य शुरुआत हो जाएगी। यह वह दिन है जब काशी के लोग भक्त नहीं, बल्कि घराती बनकर अपने आराध्य का तिलक चढ़ाते हैं और पूरा वातावरण शिवमय हो जाता है।
सदियों से चली आ रही इस अविस्मरणीय लोक-परम्परा का निर्वहन इस वर्ष भी पूरी भव्यता और वैदिक रीति-नीति के साथ किया जाएगा। शुक्रवार को बसंत पंचमी के दिन, टेढ़ीनीम स्थित महंत आवास का कोना-कोना वैदिक मंत्रोच्चार से गूंज उठेगा। शिवाजंली के संयोजक संजीव रत्न मिश्र ने इस दिव्य आयोजन की रूपरेखा साझा करते हुए बताया कि सायंकाल के समय, जब काशी की गलियां शाम की आरती की तैयारियों में मग्न होंगी, ठीक उसी समय महंत आवास पर एक अद्भुत दृश्य उपस्थित होगा। परिवार की वरिष्ठ सदस्य श्रीमती मोहिनी देवी के स्नेहपूर्ण सानिध्य में, सुप्रसिद्ध अंकशास्त्री और महंत डॉ. वाचस्पति तिवारी बाबा की पंचबदन रजत प्रतिमा का पूजन करेंगे। यह पूजन सामान्य नहीं होगा, बल्कि 11 वैदिक ब्राह्मणों के समवेत स्वर में गूंजते रुद्राष्टाध्यायी के पाठ के बीच बाबा का विशेष श्रृंगार और अर्चन किया जाएगा, जो देखने वालों को एक अलौकिक दुनिया का आभास कराएगा।
इस आयोजन की सबसे भावुक और मर्मस्पर्शी बात यह है कि यहाँ बाबा विश्वनाथ जगत के नियंता के रूप में नहीं, बल्कि एक दूल्हे के रूप में पूजे जाते हैं। परम्परा के अनुसार, विश्वनाथ मंदिर में होने वाली प्रसिद्ध सप्तर्षि आरती से ठीक पूर्व, काशी के संभ्रांत नागरिक और भक्तजन ‘वधु पक्ष’ (माता गौरा के मायके वाले) की भूमिका निभाते हुए बाबा का विधिवत तिलकोत्सव करेंगे। थाल में सजे अक्षत, रोली, चंदन और मंगल द्रव्यों के साथ जब बाबा के मस्तक पर तिलक लगाया जाएगा, तो वहां मौजूद हर हृदय “हर-हर महादेव” के उद्घोष के साथ प्रफुल्लित हो उठेगा। यह रस्म केवल एक पूजा नहीं, बल्कि उस आत्मीय रिश्ते का प्रमाण है जो काशीवासी अपने भोले बाबा के साथ साझा करते हैं।
बसंत पंचमी का यह तिलकोत्सव महज एक दिन का उत्सव नहीं है, बल्कि यह उस लंबी शृंखला की पहली कड़ी है जो रंगभरी एकादशी तक अनवरत चलती रहेगी। शुक्रवार को तिलकोत्सव संपन्न होने के बाद, शिव-विवाह की रस्में और भी प्रगाढ़ होती जाएंगी। महाशिवरात्रि के ठीक दो दिन पूर्व, इसी महंत आवास पर बाबा को शगुन की हल्दी लगाई जाएगी, जहाँ मंगल गीतों और ढोलक की थाप पर महिलाएं शिव-विवाह के लोकगीत गाकर वातावरण को आनंदित कर देंगी। इसके पश्चात महाशिवरात्रि का महापर्व आएगा और अंततः रंगभरी एकादशी के दिन माता गौरा का गौना संपन्न होगा।
संजीव रत्न मिश्र बताते हैं कि यह पूरी यात्रा बाबा के सगुन और निर्गुण दोनों रूपों के अद्भुत समन्वय का प्रतीक है, जहाँ तिलकोत्सव से उठी आनंद की लहरें होली के रंगों में बदल जाती हैं। काशी अब अपने दामाद के स्वागत और गौरा की विदाई के इस दोहरे भावुक और उल्लासपूर्ण उत्सव के लिए पूरी तरह तैयार है।
