वेंटिलेटर-बेड की कमी से मासूम की जान पर बन आई, बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल

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Savan Nayak
Savan Nayak is the Bureau Chief for Uttar Pradesh at News Report, a registered Hindi newspaper. He specializes in ground reporting on crime, law and order,...
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गया के मासूम को इलाज न मिलने पर परिवार बेहाल।

वेंटिलेटर और बेड की कमी से जूझता परिवार, गया के मासूम को समय पर इलाज नहीं मिलने से उठे सवाल

गया/पटना: बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था एक बार फिर कठघरे में है। गया जिले के एक मासूम बच्चे को गंभीर हालत में वेंटिलेटर और बेड नहीं मिलने के कारण उसका परिवार इलाज के लिए अस्पताल-दर-अस्पताल भटकता रहा। जिंदगी और मौत के बीच झूल रहे बच्चे को समय पर समुचित चिकित्सा सुविधा नहीं मिल पाने से परिजन बेहाल हैं और स्थानीय लोग प्रशासन से जवाब मांग रहे हैं।

गया से शुरू हुई अस्पतालों की दौड़

जानकारी के अनुसार, गया जिले के रहने वाले राजीव कुमार अपने बीमार बेटे को लेकर पहले स्थानीय सरकारी अस्पताल पहुंचे। परिजनों का कहना है कि बच्चे की हालत बेहद गंभीर थी और उसे तत्काल वेंटिलेटर सपोर्ट की आवश्यकता थी। लेकिन अस्पताल प्रशासन ने बेड खाली नहीं होने की बात कहकर भर्ती से इनकार कर दिया।

परिवार के अनुसार, डॉक्टरों ने वेंटिलेटर उपलब्ध नहीं होने की जानकारी दी और बच्चे को बड़े अस्पताल में रेफर कर दिया। रेफरल पर्ची के साथ उम्मीद लेकर परिजन पटना रवाना हुए, जहां उन्हें बेहतर सुविधा मिलने की आशा थी।

पटना में भी नहीं मिली राहत

राजधानी पटना पहुंचने के बाद परिवार ने कई बड़े अस्पतालों के चक्कर लगाए। लेकिन वहां भी बेड और वेंटिलेटर की कमी सामने आई। कई घंटों तक परिजन एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल के बीच भागदौड़ करते रहे, मगर कहीं भी बच्चे को भर्ती नहीं किया जा सका। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, मासूम की हालत लगातार बिगड़ती जा रही थी। ऑक्सीजन सपोर्ट की जरूरत साफ दिखाई दे रही थी, लेकिन पर्याप्त संसाधन नहीं होने के कारण समय पर इलाज शुरू नहीं हो पाया।

परिजनों का आरोप, समय पर इलाज मिलता तो हालत न बिगड़ती

बच्चे के पिता राजीव कुमार का कहना है कि अगर गया में ही वेंटिलेटर और बेड की व्यवस्था होती तो स्थिति इतनी गंभीर नहीं होती। उन्होंने आरोप लगाया कि स्वास्थ्य केंद्रों में आपातकालीन सुविधाओं की कमी के कारण आम लोगों को जान जोखिम में डालकर बड़े शहरों की ओर भागना पड़ता है। माता-पिता की आंखों में चिंता और बेबसी साफ झलक रही है। उनका कहना है कि इलाज की तलाश में की गई भागदौड़ ने मानसिक और आर्थिक दोनों स्तर पर उन्हें तोड़ दिया है।

स्वास्थ्य व्यवस्था पर उठे गंभीर सवाल

यह घटना बिहार की सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाती है। आपात स्थिति में भी यदि गंभीर मरीजों के लिए पर्याप्त बेड और वेंटिलेटर उपलब्ध नहीं हैं, तो ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों के लोगों की स्थिति कितनी कठिन हो सकती है, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि जिला स्तर के अस्पतालों में आईसीयू और वेंटिलेटर की संख्या सीमित है, जबकि मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है। ऐसे में आपातकालीन प्रबंधन की समुचित व्यवस्था न होने से मरीजों की जान पर बन आती है।

जांच और कार्रवाई की मांग

घटना के बाद स्थानीय लोगों और सामाजिक संगठनों ने प्रशासन से मामले की जांच कराने और जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है। लोगों का कहना है कि अगर समय रहते स्वास्थ्य सुविधाओं को मजबूत नहीं किया गया, तो ऐसे मामले दोहराए जाते रहेंगे। सवाल यह भी उठ रहा है कि रेफरल व्यवस्था कितनी प्रभावी है। यदि बड़े अस्पतालों में भी संसाधनों की कमी है, तो मरीजों को बिना समुचित समन्वय के रेफर करना कितनी हद तक उचित है।

परिवार की एक ही उम्मीद

इस बीच परिवार की पूरी कोशिश है कि किसी तरह बच्चे को बेहतर इलाज मिल सके। उनकी एक ही उम्मीद है कि समय रहते उचित चिकित्सा सुविधा उपलब्ध हो और मासूम सुरक्षित जिंदगी की जंग जीत सके। यह मामला केवल एक परिवार की पीड़ा नहीं, बल्कि स्वास्थ्य तंत्र की खामियों की ओर इशारा करता है। जरूरत है कि सरकार और संबंधित विभाग इस घटना को गंभीरता से लें और यह सुनिश्चित करें कि आपात स्थिति में किसी भी मरीज को बेड और वेंटिलेटर के लिए भटकना न पड़े।