काशी में सजा मां अन्नपूर्णा का स्वर्णमयी दरबार, धनतेरस पर उमड़ा आस्था का जनसैलाब, पांच दिनों तक होंगे दिव्य दर्शन
वाराणसी। देवाधिदेव महादेव की नगरी काशी में धनतेरस का पर्व मां अन्नपूर्णा की आराधना, धार्मिक आस्था और सनातन परंपराओं के अद्भुत संगम के रूप में मनाया जा रहा है। काशी के हृदय में स्थित बांसफाटक के श्री अन्नपूर्णा मंदिर में धनतेरस के पावन अवसर पर मां का स्वर्णमयी दरबार श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए सज गया है। भगवान शिव को भी अन्न की भिक्षा प्रदान करने वाली मां अन्नपूर्णा के इस दिव्य स्वरूप के दर्शन के लिए देश के विभिन्न हिस्सों से श्रद्धालु काशी पहुंच रहे हैं। मंदिर परिसर से लेकर आसपास की गलियों तक भक्तों की आवाजाही बनी हुई है। माता के जयकारों और भक्ति भाव से पूरा क्षेत्र भक्तिमय हो उठा है। धार्मिक मान्यता है कि मां अन्नपूर्णा अपने भक्तों को अन्न, धन, सुख और समृद्धि का आशीर्वाद प्रदान करती हैं।
मां के स्वर्णमयी स्वरूप के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं का उत्साह देखते ही बन रहा है। बृहस्पतिवार दोपहर से ही मंदिर के बाहर भक्तों की कतार लगनी शुरू हो गई थी। शुक्रवार 6 नवंबर की भोर पांच बजे मंदिर के कपाट श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए गए। इसके बाद दर्शनार्थियों का सिलसिला लगातार जारी है। श्रद्धालुओं की लंबी कतार बांसफाटक से गोदौलिया तक पहुंच गई है। हाथों में पूजा की थाली, मन में मां के दर्शन की अभिलाषा और जुबां पर जयकारे लिए भक्त अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रहे हैं। मंदिर प्रशासन और पुलिस की ओर से दर्शनार्थियों की सुविधा तथा सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए विशेष व्यवस्थाएं की गई हैं।
पांच दिनों तक मिलेगा मां के स्वर्णमयी स्वरूप का दर्शन
मां अन्नपूर्णा मंदिर में स्वर्णमयी स्वरूप के दर्शन 6 नवंबर से 10 नवंबर 2026 तक पांच दिनों के लिए होंगे। मंदिर में निर्धारित दर्शन व्यवस्था के अनुसार प्रतिदिन सुबह पांच बजे से रात 11 बजकर 15 मिनट तक श्रद्धालु माता के दर्शन कर सकेंगे। धनतेरस के दिन विशेष धार्मिक परंपरा के अनुसार मां का खजाना भी वितरित किया जाएगा। इसमें लगभग पांच क्विंटल लावा, दस लाख सिक्के और रजत सिक्के शामिल हैं। श्रद्धालु इस प्रसाद को मां का आशीर्वाद मानकर अपने घर लेकर जाते हैं। मान्यता है कि इसे घर के पूजा स्थल, तिजोरी अथवा अनाज के भंडार में रखने से परिवार में अन्न और धन-धान्य की निरंतरता बनी रहती है।
काशी में मां अन्नपूर्णा के खजाने का वितरण केवल एक धार्मिक रस्म नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही आस्था और परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। भक्त इस प्रसाद को पूरे श्रद्धाभाव से ग्रहण करते हैं। कई परिवारों में मां के खजाने को वर्षभर सुरक्षित रखने की परंपरा है। श्रद्धालुओं के लिए लावा और सिक्के मां की कृपा तथा परिवार में सुख-समृद्धि बने रहने के विश्वास का प्रतीक हैं। पांच दिनों तक चलने वाले इस विशेष दर्शन महोत्सव को लेकर मंदिर और आसपास के क्षेत्रों में विशेष उत्साह देखने को मिल रहा है।
मां अन्नपूर्णा और बाबा विश्वनाथ की पौराणिक कथा
काशी में मां अन्नपूर्णा की महिमा का संबंध स्वयं देवाधिदेव भगवान शिव से जुड़ा हुआ है। पौराणिक मान्यता के अनुसार एक बार भगवान शिव ने संसार को यह संदेश दिया कि समस्त भौतिक जगत नश्वर है और अन्न भी माया का ही स्वरूप है। तब माता पार्वती ने संसार को अन्न की वास्तविक महत्ता का बोध कराने के लिए मां अन्नपूर्णा का स्वरूप धारण किया। मान्यता है कि जब संसार में अन्न का संकट उत्पन्न हुआ तो माता ने काशी में अन्न का भंडार खोलकर समस्त प्राणियों की भूख मिटाई। स्वयं भगवान शिव भी भिक्षापात्र लेकर माता के समक्ष पहुंचे और उनसे अन्न की भिक्षा ग्रहण की। इसी पौराणिक प्रसंग के कारण काशी में मां अन्नपूर्णा को अन्न, पोषण और समृद्धि की अधिष्ठात्री देवी के रूप में पूजा जाता है।
काशी में बाबा विश्वनाथ के दर्शन के साथ मां अन्नपूर्णा के दर्शन का भी विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। माता को जगत का भरण पोषण करने वाली जगज्जननी के रूप में पूजित किया जाता है। सनातन धर्म में अन्न को ब्रह्म माना गया है और अन्नदान को महादान की संज्ञा दी गई है। मां अन्नपूर्णा की आराधना इसी भावना का संदेश देती है कि संसार में कोई भी व्यक्ति भूखा न रहे और प्रत्येक परिवार के घर में अन्न का भंडार सदैव भरा रहे। यही वजह है कि धनतेरस के अवसर पर मां के स्वर्णमयी स्वरूप के दर्शन और खजाने के प्रसाद को श्रद्धालु विशेष पुण्यदायी मानते हैं।
धनतेरस पर मां का खजाना प्राप्त करने की विशेष परंपरा
काशी में धनतेरस के दिन मां अन्नपूर्णा के दरबार में वितरित होने वाला खजाना श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र रहता है। मंदिर की परंपरा के अनुसार भक्तों को लावा और सिक्के प्रसाद स्वरूप दिए जाते हैं। श्रद्धालु इसे अपने घर ले जाकर पूजा स्थल, तिजोरी अथवा अनाज के भंडार में सुरक्षित रखते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार मां का यह खजाना घर में सुख-समृद्धि और धन-धान्य की निरंतरता का प्रतीक है। इसी विश्वास के साथ बड़ी संख्या में श्रद्धालु धनतेरस के दिन मां के दरबार में पहुंचते हैं।
पूर्वांचल के विभिन्न जिलों के साथ देश के दूसरे हिस्सों से भी श्रद्धालु मां के स्वर्णमयी स्वरूप का दर्शन करने काशी पहुंचते हैं। कई परिवारों में पीढ़ियों से मां अन्नपूर्णा के खजाने को घर में सुरक्षित रखने की परंपरा चली आ रही है। श्रद्धालुओं का मानना है कि मां के इस प्रसाद को घर में रखने से अन्न और धन की बरकत बनी रहती है। हालांकि इस परंपरा का मूल संदेश अन्न के सम्मान, जरूरतमंदों की सहायता और सेवा भाव से भी जुड़ा हुआ है।
धनतेरस पर भगवान धन्वंतरि और मां लक्ष्मी की पूजा का महत्व
धनतेरस का पर्व भगवान धन्वंतरि, मां लक्ष्मी, भगवान कुबेर और यमराज की आराधना से भी जुड़ा है। धार्मिक मान्यता के अनुसार समुद्र मंथन के दौरान भगवान धन्वंतरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे। इसलिए इस दिन आरोग्य, स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना की जाती है। धनतेरस पर अपनी सामर्थ्य के अनुसार सोना, चांदी, नए बर्तन और उपयोगी वस्तुओं की खरीदारी करने की परंपरा भी है। हालांकि इस पर्व का महत्व केवल खरीदारी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह परिवार के स्वास्थ्य, आर्थिक खुशहाली, दान-पुण्य और धार्मिक आस्था का भी पर्व है।
धनतेरस के दिन घर में पूजा स्थल और मुख्य द्वार की साफ सफाई कर शाम को स्वच्छ वस्त्र धारण करके भगवान धन्वंतरि, मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा की जाती है। पूजा में पुष्प, अक्षत, रोली, चंदन, फल और मिठाई अर्पित की जाती है। श्रद्धालु भगवान धन्वंतरि से परिवार के सभी सदस्यों के उत्तम स्वास्थ्य और आरोग्य की प्रार्थना करते हैं। मां लक्ष्मी और भगवान कुबेर की आराधना कर घर में सुख और समृद्धि की कामना की जाती है। इस दिन संध्या के समय यमराज के निमित्त दीपदान करने की भी धार्मिक परंपरा है। पूजा के बाद परिवार के सदस्यों में प्रसाद वितरित किया जाता है और जरूरतमंदों को भोजन तथा अन्नदान करने का विशेष महत्व माना जाता है।
मां अन्नपूर्णा की कृपा प्राप्त करने के लिए इस दिन अन्न का सम्मान करने, भोजन की बर्बादी रोकने और किसी जरूरतमंद को भोजन कराने का संकल्प भी लेना चाहिए। मां अन्नपूर्णा की आराधना में अन्नदान और सेवा भाव का विशेष महत्व है। श्रद्धालु मां का स्मरण करते हुए ॐ अन्नपूर्णायै नमः मंत्र का जाप भी करते हैं।
10 नवंबर को अन्नकूट महोत्सव में सजेगी 108 प्रकार के भोग की झांकी
मां अन्नपूर्णा के पांच दिवसीय स्वर्णमयी दर्शन महोत्सव का समापन भी विशेष धार्मिक परंपराओं के साथ होगा। 10 नवंबर को मंदिर में अन्नकूट महोत्सव मनाया जाएगा। इस अवसर पर मां को 108 प्रकार के भोग अर्पित किए जाने की परंपरा है। विभिन्न प्रकार के फल, मेवा, मिष्ठान और पकवानों से भव्य भोग की झांकी सजाई जाएगी। अन्नकूट महोत्सव के माध्यम से अन्न के प्रति कृतज्ञता और मां अन्नपूर्णा के प्रति श्रद्धा प्रकट की जाती है। इस आयोजन के साथ ही मां के स्वर्णमयी स्वरूप के दर्शन का विशेष क्रम संपन्न होगा और कपाट अगले वर्ष तक के लिए बंद कर दिए जाएंगे।
काशी की यह परंपरा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सनातन संस्कृति के उस मूल संदेश का प्रतीक है जिसमें अन्न, सेवा, दान और परोपकार को विशेष महत्व दिया गया है। मां अन्नपूर्णा के दरबार में हर श्रद्धालु अपनी श्रद्धा और विश्वास के साथ पहुंचता है। कोई परिवार की खुशहाली की कामना करता है तो कोई स्वास्थ्य, सुख, शांति और समृद्धि का आशीर्वाद मांगता है। मां के दरबार से मिलने वाला प्रसाद श्रद्धालुओं के लिए आस्था और विश्वास का प्रतीक बन जाता है।
काशी की परंपरा में बसती है मां अन्नपूर्णा की महिमा
धनतेरस के अवसर पर काशी की गलियों में गूंजते मां अन्नपूर्णा के जयकारे और मंदिर के स्वर्णमयी दरबार की दिव्य आभा श्रद्धालुओं के लिए विशेष आध्यात्मिक अनुभूति का अवसर बन रही है। एक ओर बाबा विश्वनाथ की नगरी में देवाधिदेव महादेव का आध्यात्मिक वैभव है तो दूसरी ओर मां अन्नपूर्णा का अन्न और पोषण से जुड़ा आशीर्वाद। यही काशी की सनातन पहचान है, जो देश और दुनिया के श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करती है।
मां अन्नपूर्णा से यही प्रार्थना है कि किसी भी घर का चूल्हा कभी ठंडा न पड़े, कोई व्यक्ति भूखा न सोए और प्रत्येक परिवार के जीवन में सुख, शांति, स्वास्थ्य एवं समृद्धि बनी रहे। मां सभी भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण करें और समस्त संसार पर अपनी कृपा बनाए रखें।
न्यूज रिपोर्ट परिवार की ओर से समस्त देशवासियों को धनतेरस के पावन पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं एवं बधाई। मां अन्नपूर्णा और बाबा विश्वनाथ सभी के जीवन में सुख, समृद्धि और खुशहाली प्रदान करें।
हर हर महादेव। जय मां अन्नपूर्णा।
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