28 सफर पर निकला जुलूस अंजुमनों ने किया नौहा और मातम
वाराणसी: रामनगर में 28 सफर के मौके पर बुधवार की रात हजरत मोहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की वफात और उनके बड़े नवासे इमाम हसन अलैहिस्सलाम की शहादत की याद में जुलूस निकाला गया। इस मौके पर अंजुमन मुहाफिजे अजा से जुड़े अकीदतमंदों ने नौहा ख्वानी और मातम के जरिए खिराजे अकीदत पेश किया। जुलूस के दौरान अलम ताबूत दुलदुल और ताजिया के साथ अंजुमनों ने अपने पारंपरिक अंदाज में अजादारी की। इस दौरान या हुसैन और या हसन की सदाओं के बीच माहौल गमगीन नजर आया।
प्राप्त जानकारी के अनुसार धार्मिक परंपरा में 28 सफर को पैगंबर हजरत मोहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की वफात और इमाम हसन अलैहिस्सलाम की शहादत की याद से जोड़ा जाता है। इस मौके पर शिया समुदाय में मजलिस नौहा मातम और जुलूसों के जरिए अकीदत और गम का इजहार किया जाता है।
अजाखाना ए खदीजतुल कुबरा से शुरू हुआ जुलूस
रामनगर में 28 सफर का यह जुलूस पुराना रामनगर स्थित अजाखाना ए खदीजतुल कुबरा से निकाला गया। जुलूस के प्रारंभ से पहले मजलिस का आयोजन हुआ। मजलिस का आगाज तिलावते कलामे पाक से किया गया। इसके बाद सोजख्वानी की रस्म अंजाम दी गई। सोजख्वानी के फराएज इब्राहिम रजा और उनके हमनवा ने अंजाम दिए। इसके बाद मुख्तलिफ शायरों ने कलाम पेश किए। शायरों के कलाम के बाद मौलाना अमीन हैदर बनारस ने मजलिस को खिताब किया और अहलेबैत की कुर्बानियों और उनकी शिक्षाओं का जिक्र किया।
मौलाना अमीन हैदर बनारस ने मजलिस को खिताब करते हुए कहा कि इस्लाम जो आज जिंदा है वह अहलेबैत की कुर्बानी की देन है। मजलिस में करबला और अहलेबैत की कुर्बानियों का जिक्र करते हुए अकीदतमंदों को उनके सब्र सच्चाई और हक की राह पर कायम रहने की सीख से जोड़ा गया। मजलिस के दौरान माहौल पूरी तरह गम और अकीदत में डूबा रहा। अकीदतमंदों ने खामोशी और एहतराम के साथ मजलिस सुनी और इसके बाद जुलूस में शिरकत की।
नौहा मातम और जंजीरजनी के बीच आगे बढ़ा जुलूस
मजलिस के बाद जुलूस आगे बढ़ा। जुलूस में शामिल अंजुमनों ने नौहा ख्वानी की और मातम किया। जंजीरजनी के जरिए भी अकीदतमंदों ने अपने गम और अकीदत का इजहार किया। जुलूस में दुलदुल ताजिया शबीहे ताबूत और अलम शामिल रहे। इन धार्मिक प्रतीकों के साथ अंजुमनों की मौजूदगी ने जुलूस को पारंपरिक स्वरूप दिया। रामनगर की गलियों से गुजरते हुए जुलूस में शामिल लोगों ने नौहे पढ़े और अहलेबैत की याद में मातम किया।
जुलूस पुराना रामनगर से निकलकर शास्त्री चौक अयोध्या मैदान चौक और साहित्यनाका होते हुए हसनबाग टेंगरामोड़ स्थित इमामबाड़े की ओर रवाना हुआ। निर्धारित रास्ते से गुजरते हुए अंजुमनों और अकीदतमंदों ने नौहा और मातम जारी रखा। हर पड़ाव पर अकीदतमंदों ने अपने धार्मिक रिवाज के मुताबिक अकीदत पेश की। जुलूस का अंतिम पड़ाव हसनबाग टेंगरामोड़ स्थित इमामबाड़ा रहा जहां पहुंचने के बाद धार्मिक रस्में पूरी की गईं।
इमामबाड़े में ताजिए को सुपुर्द ए खाक किया गया
हसनबाग टेंगरामोड़ स्थित इमामबाड़े पहुंचने के बाद शबीहे ताबूत अलम और दुलदुल को ठंडा किया गया। इसके बाद ताजिए को सुपुर्द ए खाक किया गया। इस दौरान मौजूद अकीदतमंदों ने फातिहा और दुआ के जरिए अपने मरहूम और शहीदों की याद में अकीदत पेश की। जुलूस के समापन के साथ 28 सफर की यह अजादारी पूरी हुई। पूरी रस्म में धार्मिक एहतराम और गम का माहौल बना रहा।
वाराणसी के रामनगर में ताजिया अलम दुलदुल और ताबूत के जुलूस की परंपरा पहले भी सामने आती रही है। उपलब्ध समाचार अभिलेखों में रामनगर से अंजुमनों की ओर से अलम दुलदुल और ताबूत के जुलूस के टेंगरा मोड़ स्थित इमामबाड़े पहुंचने का उल्लेख मिलता है। इससे रामनगर में अजादारी से जुड़ी इस परंपरा की निरंतरता का पता चलता है। वाराणसी में मुहर्रम और अन्य अय्याम ए अजा के दौरान अलग अलग इलाकों में मजलिस नौहा मातम और जुलूस आयोजित किए जाते रहे हैं।
अहलेबैत की याद में अकीदत का इजहार
28 सफर की अजादारी में पैगंबर ए इस्लाम हजरत मोहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम और इमाम हसन अलैहिस्सलाम की याद को केंद्र में रखा गया। शिया परंपरा में इस अवसर पर मजलिस और मातम के जरिए अहलेबैत के प्रति मोहब्बत और वफादारी का इजहार किया जाता है। मजलिस में पेश किए गए कलाम और नौहे अकीदतमंदों को ऐतिहासिक घटनाओं और अहलेबैत की कुर्बानियों की याद दिलाते हैं। अकीदत का यह सिलसिला अजादारी की उस परंपरा का हिस्सा है जिसमें गम और याद के साथ सब्र इंसाफ और सच्चाई के पैगाम को भी महत्व दिया जाता है।
इस मौके पर इस्तेमाल होने वाले अलम ताबूत और दुलदुल धार्मिक प्रतीक के तौर पर जुलूस का अहम हिस्सा रहे। अंजुमनों ने सामूहिक रूप से नौहा ख्वानी और मातम किया। फारसी और उर्दू धार्मिक परंपरा में इस्तेमाल होने वाले शब्दों के साथ मजलिस और नौहा ख्वानी में अहलेबैत की शहादत और सब्र का जिक्र किया गया। मजलिस का माहौल गमगीन होने के साथ साथ रूहानी भी रहा और अकीदतमंदों ने खामोशी और एहतराम के साथ पूरी रस्म में भाग लिया।
जुलूस में शामिल रहे सैकड़ों अकीदतमंद
जुलूस में मोहम्मद मेंहदी बाबा सय्यद वजीर हसन मौलाना फरमान रजा मौलाना तहजीबुल हसन अजादार हुसैन आजम रिजवी गुड्डू जावेद अज्जू मोहम्मद सय्यद अख्तर रजा आबिदी नदीम आबिदी आलम कैफ रेहान जैन सय्यद छब्बन आबिदी शमीमुल हसन शानू कुमैल रजा एबाद रजा यूसुफ रिजवी समर अब्बास सय्यद रजी जैदी मोहम्मद मेंहदी चुन्ने बाकिर रजा शबिहुल हसन फातमी नकी हसन विक्की मिर्जा मुशीर हसन मुन्ना मिर्जा जहीर हसन जैदी कासिम रजा मोहम्मद आसिफ मुजम्मिल मिर्जा अरमान सरफराज कुमैल बशर राजू जिम्मी जेनिश रुस्तम अरशद इमरान राशिद मीसम राशिद आबिदी मोहम्मद अस्र जैदी और मुज्तबा समेत सैकड़ों लोग शामिल रहे।
अंजुमन मुहाफिजे अजा की ओर से आयोजित इस जुलूस में स्थानीय अकीदतमंदों की भागीदारी रही। जुलूस के दौरान धार्मिक रस्मों को पारंपरिक तरीके से पूरा किया गया। मजलिस से लेकर जुलूस और फिर इमामबाड़े में ताजिए को सुपुर्द ए खाक किए जाने तक कार्यक्रम कई चरणों में संपन्न हुआ। इस दौरान नौहा ख्वानी सोजख्वानी मातम जंजीरजनी और फातिहा की रस्में प्रमुख रूप से शामिल रहीं।
वाराणसी की अजादारी में रामनगर की खास पहचान
वाराणसी में अजादारी की परंपरा लंबे समय से धार्मिक और सांस्कृतिक जीवन का हिस्सा रही है। शहर के अलग अलग हिस्सों में मुहर्रम चेहल्लुम और अय्याम ए अजा के दौरान मजलिस जुलूस ताबूत अलम और दुलदुल की जियारत की परंपरा देखने को मिलती है। पुराने समाचार अभिलेखों में भी रामनगर और टेंगरा मोड़ क्षेत्र में अंजुमनों की ओर से जुलूस निकाले जाने और इमामबाड़े में उसके समापन का उल्लेख मिलता है। रामनगर की इस परंपरा में स्थानीय अकीदतमंदों की भागीदारी के साथ मजलिस नौहा और मातम को विशेष स्थान प्राप्त है।
28 सफर की इस रात भी इसी परंपरा की झलक देखने को मिली। मजलिस में कलाम और सोजख्वानी से शुरुआत हुई और उसके बाद जुलूस ने रामनगर के विभिन्न मार्गों से गुजरते हुए हसनबाग टेंगरामोड़ स्थित इमामबाड़े तक अपना सफर पूरा किया। वहां ताजिए को सुपुर्द ए खाक करने के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ। अजादारी के दौरान अकीदतमंदों ने अपने धार्मिक विश्वास के अनुरूप अहलेबैत की याद में खिराजे अकीदत पेश किया और उनके सब्र व कुर्बानी को याद किया।
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