वाराणसी के डोमरी में ‘शहरी वन’ ने बनाया गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड, अगले ही दिन पौधों की सुरक्षा पर उठे सवाल
वाराणसी के डोमरी क्षेत्र में बनाए जा रहे ‘शहरी वन’ ने रविवार को गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड में जगह बनाकर ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की। इस अभियान में बड़ी संख्या में पौधे रोपे गए और बताया गया कि इससे चीन द्वारा 2018 में बनाए गए रिकॉर्ड को भी पीछे छोड़ दिया गया है। सेना, एनडीआरएफ, पुलिस बल और हजारों विद्यार्थियों की भागीदारी से आयोजित इस वृक्षारोपण अभियान को पर्यावरण संरक्षण की दिशा में बड़ा कदम बताया गया था।
हालांकि इस उपलब्धि के अगले ही दिन जमीनी स्थिति को लेकर कई सवाल खड़े हो गए। सोमवार को स्थल निरीक्षण के दौरान पौधों की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर गंभीर चिंताएं सामने आईं। कई स्थानों पर पर्याप्त घेराबंदी नहीं दिखी और निगरानी व्यवस्था भी कमजोर नजर आई।
पौधों को नुकसान पहुंचा रहे पशु
स्थानीय लोगों का कहना है कि खुले में घूम रही भैंसें और अन्य पशु कई जगह पौधों को नुकसान पहुंचाते दिखाई दिए। यदि समय रहते मजबूत सुरक्षा व्यवस्था नहीं की गई तो लाखों पौधों को सुरक्षित रखना मुश्किल हो सकता है।
ग्रामीणों का कहना है कि इतनी बड़ी संख्या में पौधे लगाने के बाद उनकी नियमित निगरानी और सुरक्षा बेहद जरूरी है, अन्यथा यह अभियान केवल कागजों तक सीमित रह सकता है।
बाढ़ का भी बना हुआ है खतरा
डोमरी क्षेत्र गंगा तट के करीब स्थित है और यहां जून से अगस्त के बीच बाढ़ की स्थिति बनना सामान्य बात मानी जाती है। ऐसे में आशंका जताई जा रही है कि यदि समय रहते उचित प्रबंधन नहीं किया गया तो जलभराव की स्थिति में पौधों को नुकसान पहुंच सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि बाढ़ और जलभराव से बचाव के लिए अतिरिक्त सुरक्षा उपाय करना जरूरी होगा, ताकि लगाए गए पौधे सुरक्षित रह सकें और इस परियोजना का उद्देश्य पूरा हो सके।
मियावाकी तकनीक से विकसित किया जा रहा शहरी वन
डोमरी में लगाए गए लगभग ढाई लाख पौधों को जीवित रखने और उन्हें घने जंगल का रूप देने के लिए जमीन की उर्वरता पर विशेष काम किया जा रहा है। मिट्टी को उपजाऊ बनाने के लिए चार फीट गहरी खुदाई कर 100 टन कोकोपीट और 250 टन गोबर की खाद का वैज्ञानिक मिश्रण तैयार किया गया है।
इसके साथ ही पौधों के पोषण के लिए हर महीने लगभग 35 हजार लीटर ‘जीवामृत’ का छिड़काव किया जा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार इससे पौधों की वृद्धि तेजी से होगी और वे जल्दी मजबूत बन सकेंगे।
सिंचाई के लिए बनाए जाएंगे तालाब
मियावाकी पद्धति के विशेषज्ञ विशाल श्रीवास्तव ने बताया कि पौधों की देखभाल की यह प्रक्रिया शुरुआती छह महीनों तक लगातार चलेगी और उसके बाद अगले दो वर्षों तक अंतराल पर जारी रखी जाएगी।
गर्मियों में पानी की कमी से निपटने के लिए परिसर में ही चार विशेष तालाब खोदे जाने की योजना है। इससे पौधों को नियमित सिंचाई मिल सकेगी और परियोजना को दीर्घकालिक रूप से सुरक्षित रखा जा सकेगा।
सुरक्षा के लिए तैनात किए गए गार्ड
प्रशासन का कहना है कि पौधों की सुरक्षा को लेकर विशेष इंतजाम किए जा रहे हैं। इसके लिए पांच सुरक्षाकर्मियों की तैनाती कर दी गई है और अतिरिक्त सुरक्षा के लिए पुलिस बल की तैनाती को लेकर भी बातचीत चल रही है।
अधिकारियों ने कहा कि डोमरी का ‘मिनी काशी’ वास्तव में हराभरा बने, इसके लिए केवल रिकॉर्ड बनाना ही नहीं बल्कि पौधों को सुरक्षित रखना भी उतना ही जरूरी है। पर्यावरण संरक्षण से जुड़े इस अभियान में किसी भी प्रकार की लापरवाही नहीं बरती जाएगी।
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