वाराणसी में रंगभरी एकादशी पर निकली बाबा की भव्य पालकी यात्रा, आस्था और उल्लास से सराबोर हुई काशी
वाराणसी: रंगभरी एकादशी के पावन अवसर पर शुक्रवार को काशी में आस्था, परंपरा और उल्लास का अद्भुत संगम देखने को मिला। सदियों पुरानी परंपरा के अनुसार पूर्व महंत आवास से बाबा की भव्य पालकी यात्रा निकाली गई। जैसे ही महादेव गौरा संग नगर भ्रमण के लिए निकले, पूरा शहर भक्तिरस और रंगों में डूब गया। गलियों में हर हर महादेव के जयघोष गूंज उठे और श्रद्धालुओं की भारी भीड़ ने इस दिव्य क्षण को ऐतिहासिक स्वरूप दे दिया।
पुनर्मिलन और गृहस्थ जीवन का प्रतीक है रंगभरी एकादशी
रंगभरी एकादशी को काशी में विशेष महत्व प्राप्त है। मान्यता है कि यह पर्व भगवान शिव और माता पार्वती के पुनर्मिलन तथा गृहस्थ जीवन की शुरुआत का प्रतीक है। इसी परंपरा के निर्वहन में पूर्व महंत आवास से बाबा और गौरा की चल प्रतिमा का विधिवत पूजन अर्चन किया गया। इसके बाद उन्हें सुसज्जित पालकी में विराजमान कर यात्रा प्रारंभ की गई। पालकी के मुख्य द्वार से बाहर आते ही श्रद्धालुओं ने अबीर और गुलाल उड़ाकर स्वागत किया। वातावरण भक्ति गीतों और पारंपरिक वाद्ययंत्रों की ध्वनि से गुंजायमान हो उठा।
सुरक्षा के व्यापक इंतजाम, ड्रोन से निगरानी
पालकी यात्रा को लेकर प्रशासन की ओर से व्यापक सुरक्षा इंतजाम किए गए थे। महंत आवास के बाहर बैरिकेडिंग कर मार्ग को नियंत्रित किया गया ताकि यात्रा सुचारु रूप से आगे बढ़ सके। पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों की मौजूदगी में पूरे मार्ग पर कड़ी निगरानी रखी गई। संवेदनशील स्थानों पर अतिरिक्त पुलिस बल तैनात रहा। भीड़ को देखते हुए ड्रोन कैमरों के माध्यम से भी निगरानी की व्यवस्था की गई। यातायात व्यवस्था में आवश्यक बदलाव कर श्रद्धालुओं की आवाजाही को सुव्यवस्थित रखा गया।
गलियों में गूंजे जयघोष, छतों से हुई फूलों की वर्षा
जैसे जैसे पालकी काशी की संकरी और ऐतिहासिक गलियों से आगे बढ़ी, दोनों ओर खड़े श्रद्धालु बाबा पर गुलाल अर्पित करते दिखाई दिए। घरों की छतों और खिड़कियों से महिलाओं और बच्चों ने फूलों और रंगों की वर्षा कर स्वागत किया। कई स्थानों पर भजन कीर्तन मंडलियों ने पारंपरिक लोकगीतों के माध्यम से वातावरण को और अधिक भक्तिमय बना दिया। ढोल नगाड़ों की थाप और शंखनाद के बीच पूरा क्षेत्र आध्यात्मिक ऊर्जा से भर उठा।
श्रीकाशी विश्वनाथ धाम रहा अंतिम पड़ाव
इस भव्य पालकी यात्रा का अंतिम पड़ाव श्रीकाशी विश्वनाथ धाम रहा जहां बाबा और गौरा की चल प्रतिमा को दर्शन के लिए पहुंचाया जाना निर्धारित है। धाम परिसर में विशेष सजावट की गई है और सुरक्षा प्रबंध भी सुदृढ़ किए गए हैं। प्रशासन ने श्रद्धालुओं से शांति और अनुशासन बनाए रखने की अपील की है ताकि सभी भक्त सुगमता से दर्शन कर सकें।
सांस्कृतिक एकता का प्रतीक है यह परंपरा
रंगभरी एकादशी केवल एक धार्मिक अनुष्ठान भर नहीं बल्कि काशी की सांस्कृतिक एकता और सामाजिक समरसता का प्रतीक भी है। यह वह अवसर है जब पूरा शहर रंगों में सराबोर होकर शिव भक्ति में लीन हो जाता है। शुक्रवार को निकली यह पालकी यात्रा एक बार फिर यह प्रमाणित कर गई कि काशी की परंपराएं आज भी उतनी ही जीवंत और प्रासंगिक हैं जितनी सदियों पहले थीं।
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