वाराणसी में श्रद्धा और वैदिक परंपरा के साथ मनाया गया श्रावणी महोत्सव
वाराणसी: सावन पूर्णिमा और रक्षाबंधन के पावन अवसर पर धर्म और अध्यात्म की नगरी काशी में शुक्रवार को श्रावणी महोत्सव श्रद्धा आस्था और वैदिक परंपराओं के साथ मनाया गया। मणिकर्णिका क्षेत्र स्थित श्री सतुआ बाबा आश्रम की परंपरा से जुड़े वैदिक अनुष्ठानों में हेमाद्रि संकल्प एवं स्नान तर्पण सप्तऋषि पूजन यज्ञोपवीत पूजन तथा अन्य धार्मिक विधान संपन्न किए गए। आयोजन में विभिन्न स्थानों से आए वैदिक विद्वानों और श्रद्धालुओं ने भाग लिया।
सतुआ बाबा आश्रम में हुआ श्रावणी उपाकर्म
ताजा प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार श्रीविश्वनाथ धाम के श्रीभैरव द्वार के निकट गंगा घाट पर सतुआ बाबा आश्रम के पीठाधीश्वर जगद्गुरु संतोषाचार्य सतुआ बाबा के सानिध्य में श्रावणी उपाकर्म का आयोजन हुआ। इसमें विभिन्न प्रदेशों से आए वैदिक विद्वानों ने हिस्सा लिया। आयोजन में राजकीय चिकित्सा अधिकारी डॉ शिवशक्ति प्रसाद द्विवेदी पंडित अंकित द्विवेदी पंडित दयानाथ पंडित जगत नारायण द्विवेदी और पंडित राकेश द्विवेदी सहित अन्य लोग उपस्थित रहे।
हेमाद्रि संकल्प और स्नान से हुआ श्रावणी उपाकर्म का शुभारंभ
श्रावणी उपाकर्म की वैदिक परंपरा में आत्मशुद्धि प्रायश्चित संकल्प और स्वाध्याय का विशेष महत्व माना जाता है। काशी में इस अवसर पर गंगा तट पर वैदिक मंत्रोच्चार के बीच स्नान और तर्पण के विधान किए गए। विभिन्न स्थानों पर ब्राह्मणों और वेदपाठी बटुकों ने परंपरागत विधि से श्रावणी संस्कार संपन्न किया।
ताजा रिपोर्टों के मुताबिक गंगा तट पर हेमाद्रि संकल्प दशविधि स्नान पंचगव्य प्राशन और स्नानांग तर्पण जैसे विधान किए गए। कई स्थानों पर अपामार्ग कुशा और दुर्वा से मार्जन तथा गंगा मिट्टी का लेपन कर पुनः स्नान किया गया। इन धार्मिक विधानों का उद्देश्य वर्षभर में जाने अनजाने हुए दोषों के लिए प्रायश्चित और आत्मशुद्धि की कामना करना बताया गया।
सप्तऋषियों और देवी अरुंधती का हुआ पूजन
श्रावणी उपाकर्म के प्रमुख चरणों में ऋषि पूजन का विशेष महत्व है। गंगा स्नान और तर्पण के बाद सप्तऋषियों तथा देवी अरुंधती का वैदिक विधि से पूजन किया गया। इसके साथ ही सूर्योपासना और मां गायत्री की आराधना भी की गई।
सतुआ बाबा आश्रम से जुड़ी श्रावणी परंपरा में भी स्नान के बाद देव तर्पण ऋषि तर्पण पितृ तर्पण सप्तऋषि पूजन सूर्योपासना और गायत्री पूजन किए जाने का उल्लेख पूर्व में प्रकाशित वाराणसी की रिपोर्टों में मिलता है। इसके बाद यज्ञोपवीत का पूजन कर उसे वैदिक मंत्रों से अभिमंत्रित करने की परंपरा निभाई जाती है।
नए यज्ञोपवीत धारण की निभाई परंपरा
श्रावणी उपाकर्म का एक महत्वपूर्ण हिस्सा यज्ञोपवीत परिवर्तन भी है। धार्मिक विधि पूर्ण होने के बाद पुराने यज्ञोपवीत को त्यागकर नए यज्ञोपवीत का पूजन और अभिमंत्रण किया जाता है। इसके बाद वैदिक मंत्रों के साथ नया यज्ञोपवीत धारण किया जाता है।
वाराणसी में इस वर्ष भी श्रावणी उपाकर्म के विभिन्न आयोजनों में यह परंपरा निभाई गई। हिन्दुस्तान की रिपोर्ट के अनुसार गंगा तट पर हुए अनुष्ठानों के बाद पुराने जनेऊ को बदलकर नए यज्ञोपवीत को गायत्री मंत्र से अभिमंत्रित कर धारण किया गया।
काशी में कई स्थानों पर गूंजे वैदिक मंत्र
श्रावणी महोत्सव केवल सतुआ बाबा आश्रम तक सीमित नहीं रहा। सावन पूर्णिमा के अवसर पर काशी के विभिन्न घाटों और धार्मिक संस्थानों में भी श्रावणी उपाकर्म के आयोजन हुए।
अहिल्याबाई घाट अस्सी घाट मानमंदिर घाट और केदारघाट सहित विभिन्न स्थानों पर ब्राह्मण समाज वेदपाठी बटुकों और धार्मिक संस्थाओं ने श्रावणी के विधान पूरे किए। गंगा तट पर स्नान तर्पण और प्रायश्चित के बाद विभिन्न स्थानों पर ऋषि पूजन एवं यज्ञोपवीत पूजन किया गया।
बीएचयू और संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में भी श्रावणी उपाकर्म की परंपरा निभाई गई। बीएचयू में तुलसी घाट पर हेमाद्रि संकल्प दशविधि स्नान पंचगव्य प्राशन और स्नानांग तर्पण के बाद मालवीय भवन में ऋषि पूजन उपाकर्म और यज्ञोपवीत पूजन किया गया।
श्रावणी उपाकर्म का धार्मिक महत्व
वैदिक परंपरा में श्रावणी उपाकर्म को आत्मशुद्धि और ऋषि परंपरा के स्मरण से जुड़ा महत्वपूर्ण संस्कार माना जाता है। इसका संबंध केवल यज्ञोपवीत बदलने से नहीं बल्कि प्रायश्चित संकल्प संस्कार और स्वाध्याय से भी है।
पिछले वर्ष सतुआ बाबा आश्रम से जुड़े श्रावणी आयोजन की रिपोर्ट में वैदिक विद्वानों ने बताया था कि श्रावणी उपाकर्म में वर्षभर में ज्ञात अज्ञात रूप से हुई त्रुटियों के लिए प्रायश्चित किया जाता है। गंगा या किसी पवित्र जलस्रोत के तट पर स्नान और तर्पण के बाद ऋषियों का पूजन तथा यज्ञोपवीत का अभिमंत्रण किया जाता है।
सतुआ बाबा आश्रम की वैदिक परंपरा
मणिकर्णिका क्षेत्र स्थित सतुआ बाबा आश्रम काशी की धार्मिक और वैदिक परंपराओं से जुड़ा प्रमुख केंद्र है। आश्रम की अपनी वेबसाइट के अनुसार यहां संस्कृत और वेदों की शिक्षा की परंपरा को आगे बढ़ाया जाता है तथा गुरुकुल परंपरा के माध्यम से विद्यार्थियों को वैदिक और शास्त्रीय ज्ञान उपलब्ध कराया जाता है।
सतुआ बाबा आश्रम से जुड़ी श्रावणी परंपरा का उल्लेख पिछले वर्षों की वाराणसी की समाचार रिपोर्टों में भी मिलता रहा है। वर्ष 2025 में मणिकर्णिका स्थित आश्रम में स्नान के बाद देव तर्पण ऋषि तर्पण पितृ तर्पण सप्तऋषि पूजन सूर्योपासना और मां गायत्री की पूजा का उल्लेख किया गया था।
आस्था परंपरा और संस्कार का संगम बना आयोजन
सावन पूर्णिमा के अवसर पर काशी में हुए श्रावणी महोत्सव ने एक बार फिर शहर की प्राचीन वैदिक परंपराओं को जीवंत किया। गंगा तट पर मंत्रोच्चार स्नान और तर्पण से लेकर सप्तऋषि पूजन तथा यज्ञोपवीत संस्कार तक पूरे वातावरण में धार्मिक आस्था दिखाई दी।
सतुआ बाबा आश्रम के सानिध्य में आयोजित श्रावणी उपाकर्म में वैदिक परंपरा की निरंतरता और गुरु शिष्य परंपरा का भाव प्रमुख रूप से दिखाई दिया। धार्मिक अनुष्ठानों के साथ श्रद्धालुओं और वैदिक विद्वानों ने सनातन परंपराओं के संरक्षण और नई पीढ़ी तक उन्हें पहुंचाने का संदेश भी दिया।
इस प्रकार श्रावणी महोत्सव काशी में केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि वैदिक संस्कार ऋषि परंपरा आत्मशुद्धि और गुरु शिष्य परंपरा को जोड़ने वाला महत्वपूर्ण अवसर बनकर सामने आया।
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