अबू धाबी में पीएम मोदी का शाही स्वागत, एफ 16 सुरक्षा घेरे से लेकर गार्ड ऑफ ऑनर तक भारत यूएई संबंधों को नई ऊंचाई देने निकले प्रधानमंत्री
अबू धाबी/नई दिल्ली: भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संयुक्त अरब अमीरात यूएई दौरे की शुरुआत शुक्रवार को बेहद भव्य और कूटनीतिक गर्मजोशी के साथ हुई। जैसे ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का विशेष विमान यूएई के हवाई क्षेत्र में पहुंचा वहां की वायुसेना के अत्याधुनिक एफ 16 लड़ाकू विमानों ने उनके विमान को एस्कॉर्ट कर सम्मान दिया। यह दृश्य केवल एक औपचारिक सुरक्षा व्यवस्था नहीं बल्कि भारत और यूएई के बीच लगातार मजबूत हो रहे रणनीतिक संबंधों की एक बड़ी तस्वीर के रूप में देखा जा रहा है। इस एस्कॉर्ट का वीडियो भी सामने आया है जिसने दोनों देशों के संबंधों की गहराई को लेकर नई चर्चा शुरू कर दी है।
अबू धाबी पहुंचने पर प्रधानमंत्री मोदी का स्वागत पूरे राजकीय सम्मान के साथ किया गया। यूएई के राष्ट्रपति और शासक शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान ने स्वयं प्रधानमंत्री का गर्मजोशी से स्वागत किया। इसके बाद प्रधानमंत्री को गार्ड ऑफ ऑनर भी दिया गया। स्वागत के दौरान दोनों नेताओं के बीच आत्मीयता और विश्वास का भाव स्पष्ट रूप से दिखाई दिया जो पिछले कुछ वर्षों में भारत और यूएई के संबंधों की नई पहचान बन चुका है।
रणनीतिक साझेदारी को नई दिशा देने वाला दौरा
यह दौरा केवल औपचारिक मुलाकातों तक सीमित नहीं माना जा रहा बल्कि इसे भारत और यूएई के बीच व्यापक रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत करने वाले महत्वपूर्ण पड़ाव के रूप में देखा जा रहा है। बीते कुछ वर्षों में दोनों देशों के बीच आर्थिक व्यापारिक रक्षा और ऊर्जा क्षेत्रों में संबंध तेजी से मजबूत हुए हैं और अब यह यात्रा उस साझेदारी को नई दिशा देने वाली मानी जा रही है।
सूत्रों के अनुसार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और यूएई के राष्ट्रपति मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान के बीच कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर विस्तृत चर्चा होने की संभावना है। इसमें व्यापार निवेश ऊर्जा सुरक्षा तकनीकी सहयोग और लोगों के बीच आपसी संबंध प्रमुख विषय हो सकते हैं। दोनों देशों के बीच आर्थिक संबंधों को और मजबूत करने के लिए नई योजनाओं पर भी विचार किया जा सकता है।
ऊर्जा सुरक्षा पर विशेष फोकस
ऊर्जा सुरक्षा इस यात्रा के सबसे महत्वपूर्ण एजेंडों में शामिल बताई जा रही है। आधिकारिक सूत्रों के अनुसार एलपीजी आपूर्ति और रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व के क्षेत्र में दो महत्वपूर्ण समझौता ज्ञापनों पर सहमति बनने की संभावना जताई जा रही है। ऐसे समय में जब वैश्विक ऊर्जा बाजार लगातार अस्थिरता के दौर से गुजर रहे हैं तब भारत के लिए यूएई जैसे भरोसेमंद साझेदार की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है।
भारत का ऊर्जा आयात ढांचा लगातार विस्तार कर रहा है और ऐसे में खाड़ी देशों के साथ संबंध केवल व्यापारिक नहीं बल्कि रणनीतिक आवश्यकता भी बन चुके हैं। माना जा रहा है कि इस यात्रा में ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला को अधिक सुरक्षित और दीर्घकालिक बनाने पर भी चर्चा हो सकती है।
विदेश मंत्रालय ने बताया महत्वपूर्ण दौरा
विदेश मंत्रालय ने प्रधानमंत्री के इस दौरे को भारत और यूएई के बीच रणनीतिक और आर्थिक संबंधों को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया है। मंत्रालय के अनुसार यूएई बीते पच्चीस वर्षों में भारत का तीसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार रहा है जबकि निवेश के मामले में यह भारत के लिए सातवां सबसे बड़ा स्रोत बना हुआ है।
दोनों देशों के आर्थिक संबंधों की एक और बड़ी कड़ी वहां रह रहे भारतीय समुदाय से जुड़ी है। यूएई में लगभग पैंतालीस लाख से अधिक भारतीय रहते हैं जो वहां की अर्थव्यवस्था और सामाजिक ढांचे में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। ऐसे में इस यात्रा को वहां रहने वाले भारतीयों के हितों और उनके योगदान से जुड़े मुद्दों पर चर्चा का अवसर भी माना जा रहा है।
यूरोप दौरे का भी रहेगा कार्यक्रम
प्रधानमंत्री के इस बहु देशीय दौरे का दूसरा चरण यूरोप की ओर बढ़ेगा। विदेश मंत्रालय में सचिव पश्चिम सिबी जॉर्ज ने जानकारी दी थी कि यूएई के बाद प्रधानमंत्री मोदी नीदरलैंड का दौरा करेंगे। वर्ष 2017 के बाद यह उनका दूसरा नीदरलैंड दौरा होगा। वहां प्रधानमंत्री किंग विलेम अलेक्जेंडर क्वीन मैक्सिमा और प्रधानमंत्री रॉब जेटन से मुलाकात करेंगे। इस दौरान कृषि तकनीक जल प्रबंधन और निवेश जैसे विषयों पर चर्चा होने की संभावना है।
इसके बाद प्रधानमंत्री स्वीडन के गोथेनबर्ग जाएंगे जहां वे अपने स्वीडिश समकक्ष उल्फ क्रिस्टरसन के साथ बैठक करेंगे। इस दौरान दोनों देशों के संबंधों की व्यापक समीक्षा की जाएगी और व्यापार तथा तकनीकी सहयोग के नए अवसरों की तलाश की जाएगी।
भारत की वैश्विक भूमिका पर टिकी निगाहें
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यह यात्रा केवल एक राजनयिक कार्यक्रम नहीं बल्कि भारत की बदलती वैश्विक भूमिका का बड़ा संकेत भी है। पश्चिम एशिया से लेकर यूरोप तक फैला यह दौरा भारत की बढ़ती कूटनीतिक सक्रियता और वैश्विक मंच पर उसके बढ़ते प्रभाव को दर्शाता है। अब सभी की निगाहें उन समझौतों और घोषणाओं पर टिकी हैं जो इस यात्रा के दौरान सामने आ सकती हैं और जो आने वाले वर्षों में भारत की विदेश नीति तथा आर्थिक हितों को नई दिशा दे सकती हैं।
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