25 हजार संविदा कर्मियों की छंटनी पर उठे सवाल, निजीकरण की तैयारी या प्रशासनिक फैसला?
लखनऊ: उत्तर प्रदेश की बिजली व्यवस्था एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। इस बार वजह बनी है पिछले कुछ वर्षों में बड़ी संख्या में संविदा कर्मियों की सेवाएं समाप्त किए जाने का मुद्दा। कर्मचारी संगठनों और संघर्ष समितियों का आरोप है कि प्रदेश की बिजली व्यवस्था में कार्यरत लगभग 25 हजार संविदा कर्मियों को चरणबद्ध तरीके से बाहर किया गया है। इस पूरे घटनाक्रम को लेकर अब केवल कर्मचारियों में ही नहीं बल्कि ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े जानकारों और उपभोक्ताओं के बीच भी गंभीर सवाल उठने लगे हैं।
मामले को और अधिक संवेदनशील इसलिए माना जा रहा है क्योंकि एक ओर प्रदेश के ऊर्जा मंत्री अरविंद कुमार शर्मा सार्वजनिक मंचों से यह संदेश देते रहे हैं कि बिना उचित कारण किसी भी कर्मचारी को सेवा से नहीं हटाया जाएगा, वहीं दूसरी ओर कर्मचारी संगठनों का दावा है कि हजारों संविदा कर्मियों की सेवाएं समाप्त कर दी गईं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि आखिर विभागीय स्तर पर लिए जा रहे निर्णय और सरकार की घोषित मंशा के बीच यह अंतर क्यों दिखाई दे रहा है।
संघर्ष समिति ने निजीकरण की तैयारी का लगाया आरोप
संविदा कर्मियों के प्रतिनिधि संगठनों का कहना है कि यह केवल मानव संसाधन पुनर्गठन का मामला नहीं है बल्कि बिजली व्यवस्था में निजीकरण के लिए माहौल तैयार करने की एक बड़ी रणनीति का हिस्सा हो सकता है। उनका आरोप है कि पहले फील्ड स्तर पर कार्यरत कर्मचारियों की संख्या घटाई जा रही है, फिर व्यवस्था में उत्पन्न होने वाली कमियों को आधार बनाकर निजी भागीदारी या निजीकरण की आवश्यकता बताई जाएगी। हालांकि इस आरोप की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन कर्मचारी संगठन लगातार इस मुद्दे को प्रमुखता से उठा रहे हैं।
मानवबल मानकों पर भी उठ रहे हैं प्रश्न
कर्मचारी संगठनों के अनुसार वर्ष 2017 में उपकेंद्रों और वितरण व्यवस्था के लिए जो मानवबल मानक निर्धारित किए गए थे, वर्तमान व्यवस्था उनसे काफी अलग दिखाई देती है। उनका दावा है कि जिन स्थानों पर निर्धारित संख्या में कर्मचारियों की आवश्यकता थी, वहां अब अपेक्षाकृत कम कर्मियों के भरोसे काम कराया जा रहा है। इससे कार्य का दबाव बढ़ने के साथ साथ व्यवस्था की कार्यक्षमता भी प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है।
बिजली वितरण व्यवस्था एक ऐसा क्षेत्र है जहां फील्ड कर्मचारियों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण मानी जाती है। लाइन फाल्ट, ट्रांसफार्मर खराब होने, आपातकालीन मरम्मत और प्राकृतिक आपदाओं के दौरान यही कर्मचारी सबसे पहले मोर्चा संभालते हैं। ऐसे में कर्मचारी संख्या में कमी को लेकर उठ रहे सवालों ने पूरे मुद्दे को और गंभीर बना दिया है।
फील्ड कर्मचारियों की भूमिका पर बहस तेज
संघर्ष समिति का कहना है कि बड़ी संख्या में ऐसे संविदा कर्मचारी भी प्रभावित हुए हैं जिन्होंने वर्षों तक बिजली व्यवस्था को सुचारु बनाए रखने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। संगठन दावा करते हैं कि कई कर्मचारी कठिन परिस्थितियों में कार्य करते हुए दुर्घटनाओं का शिकार भी हुए, लेकिन बाद में उन्हें सेवा से अलग कर दिया गया। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि होना अभी शेष है, लेकिन इससे कर्मचारियों में असंतोष बढ़ा है।
दूसरी ओर उपभोक्ताओं की ओर से भी समय समय पर बिजली फाल्ट, मरम्मत में देरी और स्थानीय स्तर पर संसाधनों की कमी जैसी शिकायतें सामने आती रही हैं। कर्मचारी संगठन इन समस्याओं को मानवबल की कमी से जोड़कर देख रहे हैं।
ऊर्जा मंत्री और प्रबंधन के सामने चुनौती
पूरा विवाद अब ऊर्जा विभाग और पावर कॉरपोरेशन के शीर्ष प्रबंधन के लिए चुनौती बनता जा रहा है। यदि कर्मचारी संगठनों के आरोपों में तथ्य हैं तो सरकार को इस पर स्पष्ट स्थिति रखनी होगी। वहीं यदि संविदा कर्मियों की सेवाएं समाप्त करने के पीछे प्रशासनिक, तकनीकी या वित्तीय कारण रहे हैं तो उनकी पारदर्शी जानकारी भी सार्वजनिक की जानी चाहिए।
विशेषज्ञों का मानना है कि बिजली जैसी बुनियादी सेवा में मानव संसाधन संबंधी किसी भी बड़े निर्णय का प्रभाव सीधे उपभोक्ताओं तक पहुंचता है। इसलिए ऐसे मामलों में पारदर्शिता और संवाद दोनों आवश्यक हैं।
जनता और कर्मचारियों की निगाहें फैसले पर
फिलहाल कर्मचारी संगठन बहाली की मांग पर अड़े हुए हैं और पूरे मामले की निष्पक्ष समीक्षा की मांग कर रहे हैं। दूसरी ओर ऊर्जा विभाग की ओर से भविष्य की नीति और संविदा कर्मियों को लेकर क्या निर्णय लिया जाता है, इस पर सभी की नजरें टिकी हैं।
यह विवाद अब केवल संविदा कर्मियों के रोजगार तक सीमित नहीं रह गया है बल्कि प्रदेश की बिजली व्यवस्था, मानव संसाधन नीति और भविष्य में संभावित सुधारों को लेकर भी व्यापक बहस का विषय बन चुका है। आने वाले समय में सरकार और विभागीय प्रबंधन के कदम तय करेंगे कि यह मामला किस दिशा में आगे बढ़ता है और कर्मचारियों तथा उपभोक्ताओं की चिंताओं का समाधान किस प्रकार किया जाता है।
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