वाराणसी में चैत्र नवरात्रि का सातवां दिन: मां कालरात्रि की आराधना को उमड़ा जनसैलाब
वाराणसी,25 मार्च 2026: चैत्र नवरात्रि के सातवें दिन काशी में आस्था और भक्ति का अद्भुत संगम देखने को मिला। बुधवार की भोर होते ही मां कालरात्रि के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की लंबी कतारें मंदिरों के बाहर लग गईं। जैसे ही कपाट खुले, “जय माता दी” के जयघोष से पूरा वातावरण गूंज उठा। शहर के प्रमुख शक्तिपीठों में सुबह से देर रात तक दर्शन-पूजन का क्रम लगातार जारी रहा।
सुबह से ही मंदिरों में भारी भीड़
सातवें दिन मां दुर्गा के उग्र स्वरूप मां कालरात्रि की पूजा का विशेष महत्व माना जाता है। इसी आस्था के चलते वाराणसी के दुर्गाकुंड मंदिर, मां अन्नपूर्णा मंदिर, ललिता घाट स्थित देवी मंदिर सहित कई प्रमुख स्थलों पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी। महिलाएं, युवा और बुजुर्ग पारंपरिक वेशभूषा में मां के दर्शन के लिए घंटों कतार में खड़े नजर आए। प्रशासन की ओर से सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए थे, जिससे श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की असुविधा न हो।
मां कालरात्रि का स्वरूप और धार्मिक महत्व
नवरात्रि के सातवें दिन पूजित मां कालरात्रि को देवी दुर्गा का सबसे उग्र और शक्तिशाली रूप माना जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब दानवों का अत्याचार बढ़ गया, तब देवी ने कालरात्रि का रूप धारण कर उनका संहार किया। उनका रंग काला, केश बिखरे हुए और गले में बिजली के समान चमकती माला होती है। वे गर्दभ (गधे) पर सवार रहती हैं और उनके चार हाथों में खड्ग, लोहे का कांटा, वरमुद्रा और अभयमुद्रा होती है।
भले ही उनका स्वरूप भयंकर प्रतीत होता है, लेकिन वे अपने भक्तों के लिए सदैव शुभ फल देने वाली हैं। मान्यता है कि उनकी पूजा से भय, बाधाएं और नकारात्मक शक्तियां दूर होती हैं।
पूजा विधि और व्रत का विधान
सातवें दिन व्रत रखने वाले श्रद्धालु प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करते हैं और मां कालरात्रि का ध्यान करते हैं। पूजा में लाल या काले पुष्प, गुड़, सिंदूर और धूप-दीप अर्पित किए जाते हैं। गुड़ का भोग लगाना विशेष रूप से शुभ माना जाता है। इसके बाद “ॐ देवी कालरात्र्यै नमः” मंत्र का जाप कर मां से सुख-समृद्धि और रक्षा की कामना की जाती है।
तांत्रिक साधना और विशेष अनुष्ठानों के लिए भी यह दिन अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। कई साधक इस दिन विशेष पूजा-अर्चना कर आध्यात्मिक सिद्धियों की प्राप्ति का प्रयास करते हैं।
व्रत कथा: असुरों का अंत और धर्म की विजय
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शुंभ-निशुंभ और रक्तबीज नामक असुरों ने तीनों लोकों में आतंक फैला रखा था। तब देवी ने कालरात्रि का भयानक रूप धारण कर उनका वध किया। रक्तबीज के शरीर से गिरने वाली हर रक्त की बूंद से नया असुर उत्पन्न हो जाता था, जिसे समाप्त करने के लिए मां ने उसका रक्त भूमि पर गिरने से पहले ही पी लिया और अंततः उसका अंत किया।
यह कथा इस बात का प्रतीक है कि चाहे कितनी भी बड़ी विपत्ति क्यों न हो, देवी शक्ति के सामने उसका अंत निश्चित है।
काशी में धार्मिक आयोजन और भक्ति का माहौल
नवरात्रि के इस विशेष दिन वाराणसी के विभिन्न मंदिरों में दुर्गा सप्तशती पाठ, भजन-कीर्तन और जागरण का आयोजन किया गया। कई स्थानों पर कन्या पूजन और भंडारे भी आयोजित किए गए, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने भाग लिया।
गंगा घाटों पर भी श्रद्धालुओं ने स्नान कर मां की आराधना की और शाम को भव्य गंगा आरती में शामिल होकर दीपदान किया। पूरा शहर भक्ति और श्रद्धा के रंग में रंगा नजर आया।
प्रशासन अलर्ट, व्यवस्था चाक-चौबंद
श्रद्धालुओं की भारी भीड़ को देखते हुए जिला प्रशासन और पुलिस विभाग पूरी तरह सतर्क नजर आया। मंदिरों के आसपास बैरिकेडिंग, ट्रैफिक डायवर्जन और सुरक्षा बलों की तैनाती की गई थी। स्वास्थ्य विभाग की टीमों और एंबुलेंस को भी तैयार रखा गया था, ताकि किसी भी आपात स्थिति से तुरंत निपटा जा सके।
अधिकारियों ने श्रद्धालुओं से अपील की है कि वे संयम बनाए रखें और प्रशासन द्वारा जारी दिशा-निर्देशों का पालन करें, जिससे सभी भक्तों को सुगमता से मां के दर्शन का लाभ मिल सके।
आस्था का अटूट विश्वास
वाराणसी में नवरात्रि के सातवें दिन का यह दृश्य दर्शाता है कि काशी की धार्मिक परंपराएं आज भी जीवंत और मजबूत हैं। मां कालरात्रि के प्रति श्रद्धालुओं की गहरी आस्था उन्हें हर वर्ष यहां खींच लाती है।
भक्तों का विश्वास है कि मां के इस स्वरूप की पूजा करने से सभी प्रकार के भय समाप्त होते हैं और जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का आगमन होता है। इसी अटूट विश्वास के साथ श्रद्धालु मां के चरणों में शीश नवाकर अपनी मनोकामनाएं पूरी होने की प्रार्थना कर रहे हैं।
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