परमानंदपुर की बेटियों ने हैंडबॉल में रचा इतिहास, धूल भरे मैदान से अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंच
वाराणसी के निकट स्थित परमानंदपुर क्षेत्र की बेटियों ने सीमित संसाधनों के बावजूद खेल जगत में एक नई पहचान बनाई है। यहां की खिलाड़ी बिना आधुनिक सुविधाओं के भी हैंडबॉल में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंच चुकी हैं, जो पूरे पूर्वांचल के लिए गर्व की बात है।
धूल भरे मैदान से शुरू हुआ सफर
परमानंदपुर की सुबहें अब सिर्फ पारंपरिक गतिविधियों तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि यहां हैंडबॉल की गूंज भी सुनाई देती है। इन बेटियों के पास न आधुनिक मैदान था, न जिम और न ही महंगे किट। उन्होंने कच्चे मैदान और सीमित संसाधनों के बीच अपने सपनों को आकार दिया।
सुबह से शाम तक चलने वाले अभ्यास में कई बार खिलाड़ी नंगे पांव या उधार के जूतों में खेलती थीं, लेकिन उनके हौसले कभी कम नहीं हुए।
सामाजिक रूढ़ियों को तोड़कर बनाई पहचान
इन बेटियों की असली चुनौती खेल से ज्यादा समाज की सोच से थी। “लड़कियां खेलेंगी?” जैसे सवाल उनके सामने खड़े किए जाते थे, लेकिन उन्होंने अपने प्रदर्शन से इन धारणाओं को बदल दिया।
आज वही परिवार, जो पहले संकोच करते थे, अब अपनी बेटियों के सबसे बड़े समर्थक बन चुके हैं।
राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान
परमानंदपुर की नैना यादव और कोमल राजभर जैसे खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं। इसके अलावा गांव की कुल 24 बेटियां राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में लगातार बेहतर प्रदर्शन कर रही हैं।
ये खिलाड़ी अब केवल अपने लिए नहीं, बल्कि पूरे गांव और समाज के लिए खेल रही हैं।
बदलती सोच का प्रतीक बना गांव
आज परमानंदपुर में बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। जहां पहले बेटियों की दुनिया घर तक सीमित थी, अब वे मैदान में आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ रही हैं।
अभिभावकों की सोच भी बदली है और अब वे कहते हैं कि “बेटी खेलेगी, आगे बढ़ेगी”।
प्रशिक्षण और खिलाड़ियों की सूची
परमानंदपुर मिनी स्टेडियम में डॉ. एके सिंह के मार्गदर्शन में इन खिलाड़ियों को प्रशिक्षण दिया जा रहा है। यहां कुल 24 खिलाड़ी हैं, जिनमें 19 हैंडबॉल, 3 बालिका हॉकी और 1 फुटबॉल से जुड़ी हैं।
इनमें प्रमुख नाम हैं: नैना यादव, सुमन यादव, कोमल राजभर, रेशमा यादव, ऊषा प्रजापति, शिवांगी पांडेय, प्रीति यादव, काजल पटेल, सुरम्या पाठक, रितिका पटेल, स्नेहा मौर्या, अनीशा सिंह, सोनाली पाल, वंशिका प्रजापति, सेजल सिंह, मानसी चौहान, शताक्षी पटेल, रितिका प्रजापति, सोनाली, आयुषी और महिमा।
हौसलों की मिसाल बनीं बेटियां
परमानंदपुर की बेटियां यह साबित कर रही हैं कि सपनों की कोई सीमा नहीं होती और हौसलों का कोई लिंग नहीं होता। सीमित संसाधनों के बावजूद उनका यह सफर समाज के लिए प्रेरणा बन चुका है।
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