लखीमपुर से पकड़ी गई मादा तेंदुआ को वाराणसी होते हुए चंद्रप्रभा अभयारण्य भेजा गया, वन विभाग के फैसले पर उठे सवाल
लखीमपुर खीरी के मझगई रेंज में दो लोगों को घायल करने वाली मादा तेंदुआ को वन विभाग ने पकड़ने के बाद उसके प्राकृतिक आवास से करीब 550 किलोमीटर दूर स्थानांतरित कर वाराणसी के रास्ते चंदौली स्थित चंद्रप्रभा वन्यजीव अभयारण्य में छोड़ने का निर्णय लिया है। इस फैसले ने वन्यजीव विशेषज्ञों और स्थानीय लोगों के बीच कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
ग्रामीणों ने पकड़ा, दो लोगों को किया था घायल
जानकारी के अनुसार, मझगई रेंज के ग्राम लोहरा बीरान में पांच दिन पहले इस मादा तेंदुआ को ग्रामीणों ने पकड़ लिया था। इससे पहले तेंदुए ने दो लोगों को घायल कर दिया था, जिसके बाद क्षेत्र में दहशत का माहौल बन गया था। वन विभाग ने मौके पर पहुंचकर तेंदुए को अपने कब्जे में लिया और पिंजरे में सुरक्षित रखा।
स्वास्थ्य परीक्षण के बाद वाराणसी लाया गया
मंगलवार को पकड़े जाने के बाद तेंदुए को मझगई रेंज कार्यालय में रखा गया था। शुक्रवार रात रेंजर अंकित सिंह के नेतृत्व में वन विभाग की टीम उसे वाराणसी के लिए रवाना हुई। शनिवार सुबह करीब 11 बजे टीम तेंदुए को लेकर वाराणसी पहुंची, जहां उसका स्वास्थ्य परीक्षण किया गया। जांच में तेंदुआ पूरी तरह स्वस्थ पाया गया।
रामनगर में रखा गया, चंद्रप्रभा में छोड़ा जाएगा
स्वास्थ्य परीक्षण के बाद तेंदुए को रामनगर स्थित वन्यजीव प्रभाग में रखा गया। वन विभाग के निर्देशानुसार रविवार को उसे चंदौली के चंद्रप्रभा वन्यजीव अभयारण्य में छोड़ा जाएगा। यह अभयारण्य वाराणसी से लगभग 70 किलोमीटर दूर स्थित है और घने जंगलों व विविध वन्यजीवों के लिए जाना जाता है।
चंद्रप्रभा अभयारण्य: प्राकृतिक आवास या चुनौती?
चंद्रप्रभा वन्यजीव अभयारण्य, जिसे काशी वाइल्ड लाइफ सेंक्चुरी भी कहा जाता है, उत्तर प्रदेश के चंदौली जिले में स्थित है। वर्ष 1957 में स्थापित यह क्षेत्र राजदरी और देवदरी जलप्रपात, घने जंगलों और तेंदुआ, भालू व सांभर जैसे वन्यजीवों के लिए प्रसिद्ध है।
हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि मैदानी क्षेत्र में रहने वाले तेंदुए को पहाड़ी और भिन्न पारिस्थितिकी वाले क्षेत्र में छोड़ना उसके व्यवहार और जीवित रहने की क्षमता को प्रभावित कर सकता है।
550 किमी दूर स्थानांतरण पर उठे सवाल
वन विभाग द्वारा इतने लंबे दूरी तक तेंदुए को स्थानांतरित करने के फैसले पर सवाल उठ रहे हैं। आमतौर पर वन्यजीवों को उनके मूल आवास या आसपास के सुरक्षित क्षेत्रों में ही छोड़ा जाता है, ताकि वे अपने परिचित वातावरण में आसानी से अनुकूलन कर सकें।
इस मामले में तेंदुए को एक बिल्कुल अलग भौगोलिक और पर्यावरणीय क्षेत्र में छोड़ा जा रहा है, जिससे उसके व्यवहार और क्षेत्रीय संघर्ष की संभावना बढ़ सकती है।
वन विभाग का पक्ष
बफर जोन की प्रभागीय वनाधिकारी कीर्ति चौधरी ने बताया कि तेंदुए को काशी वाइल्ड लाइफ सेंक्चुरी में छोड़ने के निर्देश प्राप्त हुए थे, जिनका पालन किया जा रहा है। उनका कहना है कि यह निर्णय मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने और तेंदुए को सुरक्षित वातावरण देने के उद्देश्य से लिया गया है।
मानव-वन्यजीव संघर्ष की बढ़ती चुनौती
यह घटना एक बार फिर मानव-वन्यजीव संघर्ष की बढ़ती समस्या को उजागर करती है। जंगलों के सिमटने और मानव आबादी के विस्तार के कारण वन्यजीव अक्सर आबादी वाले क्षेत्रों में पहुंच जाते हैं, जिससे दोनों पक्षों के लिए खतरा उत्पन्न होता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के मामलों में दीर्घकालिक समाधान के लिए वन्यजीव गलियारों (वाइल्डलाइफ कॉरिडोर) का विकास और स्थानीय स्तर पर संरक्षण योजनाओं को मजबूत करना आवश्यक है।
आगे क्या होगा, नजर बनी रहेगी
अब सभी की नजर इस बात पर टिकी है कि चंद्रप्रभा अभयारण्य में छोड़े जाने के बाद यह तेंदुआ नए वातावरण में खुद को कितना अनुकूलित कर पाता है। यदि वह वहां सहज रूप से रह पाता है तो यह निर्णय सफल माना जाएगा, अन्यथा इसके दुष्परिणाम भी सामने आ सकते हैं।
फिलहाल वन विभाग इस पूरी प्रक्रिया पर नजर बनाए हुए है और तेंदुए की गतिविधियों की निगरानी की योजना भी बनाई जा रही है, ताकि किसी भी संभावित खतरे को समय रहते रोका जा सके।
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