अमेरिकी टैरिफ नीति से भारतीय फार्मा सेक्टर में हलचल, कंपनियों के सामने नई रणनीति की चुनौती
नई नीति से वैश्विक दवा उद्योग में हलचल
नई दिल्ली/वॉशिंगटन: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के एक ताजा नीति संकेत ने वैश्विक दवा उद्योग, खासकर भारतीय फार्मा सेक्टर में हलचल पैदा कर दी है। ट्रंप प्रशासन ने पेटेंटेड दवाओं और उनसे जुड़े कच्चे माल (API) पर कड़े आयात शुल्क लगाने की दिशा में कदम बढ़ाया है, यदि कंपनियां अमेरिका के साथ मूल्य निर्धारण समझौते नहीं करतीं या अपना उत्पादन वहां स्थानांतरित नहीं करतीं। इसे अमेरिका की “घरेलू उत्पादन बढ़ाने” की रणनीति का अहम हिस्सा माना जा रहा है।
टैरिफ बढ़ाने का सख्त प्रस्ताव
नई नीति के तहत संकेत दिया गया है कि जो फार्मा कंपनियां अमेरिका में मैन्युफैक्चरिंग यूनिट स्थापित करेंगी, उन्हें शुरुआती तौर पर लगभग 20 प्रतिशत टैरिफ का सामना करना पड़ सकता है, जो वर्ष 2030 तक बढ़कर 100 प्रतिशत तक पहुंच सकता है। वहीं, जो कंपनियां इन शर्तों को नहीं मानेंगी, उन पर सीधे 100 प्रतिशत आयात शुल्क लागू किया जा सकता है। इस सख्त रुख से साफ है कि अमेरिका दवा निर्माण में आत्मनिर्भरता की दिशा में तेजी से बढ़ रहा है।
भारत पर संभावित असर
भारत, जिसे “दुनिया की फार्मेसी” कहा जाता है, इस नीति से विशेष रूप से प्रभावित हो सकता है। फिलहाल भारत ने अमेरिका के साथ न तो किसी “रिशोरिंग एग्रीमेंट” पर सहमति जताई है और न ही “मोस्ट फेवर्ड नेशन (MFN)” मूल्य निर्धारण समझौता किया है। ऐसे में भारतीय कंपनियां अमेरिकी नीति निर्माताओं के फोकस में बनी हुई हैं और भविष्य में उन पर दबाव बढ़ने की संभावना है।
जेनेरिक दवाओं को फिलहाल राहत
इस बीच एक राहत भरी खबर यह है कि व्हाइट हाउस द्वारा 2 अप्रैल को जारी बयान के अनुसार, फिलहाल जेनेरिक दवाओं और बायोसिमिलर उत्पादों को इस नए टैरिफ दायरे से बाहर रखा गया है। यह भारत के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि देश के कुल फार्मा निर्यात का लगभग 34 प्रतिशत हिस्सा अमेरिका को जाता है। वित्त वर्ष 2025 में भारत ने अमेरिका को करीब 10.5 अरब डॉलर की दवाएं निर्यात कीं, जिनमें अधिकतर सस्ती जेनेरिक दवाएं शामिल थीं।
भविष्य में जोखिम बरकरार
हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि यह राहत अस्थायी हो सकती है। अमेरिकी वाणिज्य विभाग के अधिकारियों ने संकेत दिया है कि अगले एक वर्ष तक जेनेरिक दवाओं के आयात पर कड़ी निगरानी रखी जाएगी। यदि आयात का स्तर अधिक पाया गया, तो भविष्य में इस श्रेणी पर भी शुल्क या प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।
भारतीय कंपनियों के लिए नई रणनीति जरूरी
उद्योग विश्लेषकों के अनुसार, इस नीति बदलाव के बाद भारतीय फार्मा कंपनियों को अपनी वैश्विक रणनीति पर पुनर्विचार करना होगा। अमेरिका में कारोबार करने वाली कंपनियों को अपनी सप्लाई चेन को अधिक मजबूत और लचीला बनाना होगा, साथ ही संभावित नियामकीय बदलावों और जांच के लिए तैयार रहना पड़ेगा। कुछ कंपनियां अमेरिका में निवेश बढ़ाने या स्थानीय साझेदारी की दिशा में भी कदम उठा सकती हैं।
वैश्विक सप्लाई चेन पर असर
कुल मिलाकर, अमेरिकी टैरिफ नीति में यह बदलाव केवल व्यापारिक निर्णय नहीं है, बल्कि वैश्विक फार्मा आपूर्ति श्रृंखला को प्रभावित करने वाला एक रणनीतिक कदम है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि भारतीय कंपनियां इस चुनौती से कैसे निपटती हैं और क्या भारत-अमेरिका के बीच किसी नए समझौते की संभावनाएं बनती हैं।
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