बीएचयू ट्रॉमा सेंटर में बड़ी लापरवाही गलत ऑपरेशन के बाद बुजुर्ग महिला की मौत से हड़कंप
वाराणसी: काशी हिंदू विश्वविद्यालय के सर सुंदरलाल अस्पताल स्थित ट्रॉमा सेंटर में चिकित्सकीय लापरवाही का एक गंभीर मामला सामने आया है जिसने स्वास्थ्य व्यवस्था पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। 71 वर्षीय राधिका देवी जो स्पाइनल कॉर्ड ट्यूमर से पीड़ित थीं उनका कथित रूप से गलत ऑपरेशन कर दिया गया। इसके बाद उनकी हालत लगातार बिगड़ती चली गई और 27 मार्च को उनकी मृत्यु हो गई। इस घटना के सामने आने के बाद अस्पताल प्रशासन की कार्यप्रणाली और मरीजों की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ गई है।
भर्ती से लेकर सर्जरी तक घटनाक्रम
परिजनों के अनुसार बलिया निवासी राधिका देवी को 25 फरवरी को ट्रॉमा सेंटर में भर्ती कराया गया था। उन्हें न्यूरोसर्जरी विभाग में दिखाया गया जहां डॉक्टर अनुराग साहू की देखरेख में इलाज शुरू हुआ और 7 मार्च को सर्जरी की तारीख तय की गई। आरोप है कि निर्धारित न्यूरो सर्जरी के बजाय आर्थोपेडिक्स विभाग की टीम उन्हें ऑपरेशन थिएटर में ले गई और जांघ का ऑपरेशन शुरू कर दिया।
ऑपरेशन के दौरान सामने आई गंभीर चूक
परिजनों का कहना है कि ऑपरेशन के दौरान जब संबंधित स्थान पर फ्रैक्चर नहीं मिला तो डॉक्टरों को संदेह हुआ कि कहीं गलत मरीज का ऑपरेशन तो नहीं किया जा रहा है। इसके बाद जल्दबाजी में सर्जरी को रोककर चीरा सिल दिया गया और मरीज को बाहर भेज दिया गया। इस पूरे घटनाक्रम ने अस्पताल की आंतरिक प्रक्रिया और निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
परिजनों ने लगाए जानकारी छिपाने के आरोप
पीड़ित परिवार का आरोप है कि ऑपरेशन से पहले उन्हें सही जानकारी नहीं दी गई और सहमति प्रक्रिया का भी ठीक से पालन नहीं किया गया। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि जानकारी लेने पर अस्पताल स्टाफ द्वारा संतोषजनक जवाब नहीं दिया गया। गलत सर्जरी के बाद महिला की तबीयत लगातार बिगड़ती गई और उन्हें अल्सर याददाश्त में कमी जबड़े में कंपन मुंह में दर्द और सांस लेने में तकलीफ जैसी गंभीर समस्याएं होने लगीं।
दूसरे ऑपरेशन के बाद भी नहीं बच सकी जान
स्थिति गंभीर होने पर 18 मार्च को न्यूरोसर्जरी विभाग की टीम ने दोबारा ऑपरेशन किया लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी। सात दिनों तक अस्पताल में रहने के बाद 27 मार्च की सुबह राधिका देवी को अचानक सांस लेने में दिक्कत हुई और कार्डियोपल्मोनरी अरेस्ट के कारण उनकी मृत्यु हो गई।
जांच में सामने आई दो मरीजों के नाम की समानता
मामले को लेकर मृतका के पोते मृत्युंजय पाल ने एक अप्रैल को विश्वविद्यालय प्रशासन को लिखित शिकायत दी। इसके बाद कुलपति और आईएमएस निदेशक ने मामले की रिपोर्ट तलब की। जांच में यह तथ्य सामने आया कि ट्रॉमा सेंटर में एक ही नाम की दो महिलाएं भर्ती थीं जिनकी उम्र अलग अलग थी। इसी भ्रम की स्थिति में आर्थोपेडिक्स विभाग की टीम ने गलत मरीज का ऑपरेशन शुरू कर दिया।
जांच समिति के गठन पर उठे सवाल
मामले की गंभीरता को देखते हुए चार सदस्यीय जांच समिति का गठन किया गया। हालांकि प्रारंभ में जिस डॉक्टर की टीम पर आरोप था उन्हें ही समिति का अध्यक्ष बनाए जाने पर निष्पक्षता को लेकर सवाल उठे। बाद में संबंधित डॉक्टर द्वारा स्वयं अध्यक्ष पद से हटने का अनुरोध किए जाने के बाद समिति में बदलाव किया गया।
प्रशासन ने दिए सख्त निर्देश
अस्पताल प्रशासन का कहना है कि मामले की जांच जारी है और रिपोर्ट आने के बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी। साथ ही ट्रॉमा सेंटर में सभी सर्जरी प्रक्रियाओं के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन की सर्जिकल सेफ्टी चेकलिस्ट का सख्ती से पालन सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं। मरीज की पहचान और ऑपरेशन से पहले सभी आवश्यक प्रक्रियाओं को दोबारा जांचने पर विशेष जोर दिया गया है।
न्याय की मांग और बढ़ती चिंता
उधर मृतका के परिजन न्याय की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि इतने बड़े संस्थान में इस प्रकार की लापरवाही की उम्मीद नहीं थी। उन्होंने प्रशासन से दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की है। यह घटना स्वास्थ्य सेवाओं में जवाबदेही पारदर्शिता और सुरक्षा मानकों के पालन की आवश्यकता को एक बार फिर सामने लाती है।
यह मामला केवल एक परिवार का दर्द नहीं बल्कि पूरे स्वास्थ्य तंत्र के लिए एक चेतावनी है कि मरीजों की सुरक्षा से किसी भी प्रकार का समझौता नहीं किया जा सकता।
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