वाराणसी: परशुराम जयंती पर आस्था, ऊर्जा और परंपरा का अद्भुत संगम-गदाधारी सेवकों ने रचा भव्य आयोजन
वाराणसी: सनातन संस्कृति की आध्यात्मिक राजधानी काशी एक बार फिर श्रद्धा, उत्साह और परंपरा के रंग में सराबोर दिखाई दी, जब भगवान परशुराम जयंती के पावन अवसर पर गदाधारी सेना के युवा कार्यकर्ताओं और भाजपा से जुड़े कार्यकर्ताओं ने इस पर्व को भव्य और ऐतिहासिक रूप में मनाया। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय परिसर में आयोजित इस कार्यक्रम ने न केवल धार्मिक आस्था को जीवंत किया, बल्कि सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक जागरूकता का भी सशक्त संदेश दिया।
कार्यक्रम का आयोजन अत्यंत सुव्यवस्थित और आकर्षक रहा, जिसमें सैकड़ों की संख्या में श्रद्धालु, कार्यकर्ता और स्थानीय नागरिक शामिल हुए। पूरे परिसर में भक्तिमय वातावरण देखने को मिला जहां एक ओर वैदिक मंत्रोच्चार की गूंज थी, वहीं दूसरी ओर युवाओं में परंपरा के प्रति गर्व और जोश स्पष्ट झलक रहा था। मंच को धार्मिक प्रतीकों और पुष्प सज्जा से विशेष रूप से सजाया गया, जिससे आयोजन की गरिमा और भी बढ़ गई।
कार्यक्रम में प्रमुख हस्तियों की उपस्थिति
इस अवसर पर विश्व हिंदू परिषद के कार्यालय प्रभारी भूपेंद्र जी, विभाग मंत्री कन्हैया सिंह, भाजपा महानगर उपाध्यक्ष इंजीनियर अशोक यादव, विजय दुबे, ब्राह्मण परिषद के जिला अध्यक्ष सियाराम तिवारी, अजीत जी, बीजेपी जन कल्याण मंच के प्रदेश प्रवक्ता धर्मेंद्र पांडेय सहित कई प्रमुख सामाजिक और राजनीतिक हस्तियां उपस्थित रहीं। इनके अलावा प्रेम पासी, अरुण प्रताप सिंह, जनक रावत, दीपक अग्रहरि, अजय प्रताप सिंह, संजीव गुप्ता, बृजेश श्रीवास्तव, उदय, सुनील सिंह चौहान, आयुष मिश्रा और रमाकांत राय समेत दर्जनों कार्यकर्ताओं ने कार्यक्रम में सक्रिय भागीदारी निभाई।
वक्ताओं ने रखे परशुराम के आदर्श
वक्ताओं ने अपने संबोधन में भगवान परशुराम के जीवन, उनके आदर्शों और समाज के प्रति उनके योगदान को विस्तार से रखा। उन्होंने कहा कि परशुराम केवल एक योद्धा नहीं थे, बल्कि धर्म, न्याय और संतुलन के प्रतीक थे। उनका जीवन हमें अन्याय के खिलाफ खड़े होने, समाज में समानता स्थापित करने और धर्म की रक्षा के लिए समर्पित रहने की प्रेरणा देता है।
कौन थे भगवान परशुराम
भगवान परशुराम को सनातन धर्म में भगवान विष्णु का छठा अवतार माना जाता है। उनका जन्म महर्षि जमदग्नि और माता रेणुका के घर हुआ था। वे ब्राह्मण कुल में जन्मे, लेकिन उनके व्यक्तित्व में अद्भुत वीरता और युद्ध कौशल था। उनके हाथ में सदैव परशु कुल्हाड़ी रहने के कारण उन्हें परशुराम कहा गया।
पौराणिक कथाओं के अनुसार उस समय पृथ्वी पर अत्याचार और अधर्म अपने चरम पर था, विशेषकर कुछ क्षत्रिय शासकों द्वारा जनता पर अत्याचार किए जा रहे थे। ऐसे में भगवान परशुराम ने धर्म की स्थापना के लिए संघर्ष किया और अन्याय के विरुद्ध निर्णायक युद्ध लड़े। कहा जाता है कि उन्होंने 21 बार पृथ्वी को अत्याचारी क्षत्रियों से मुक्त कराया, जो उनके दृढ़ संकल्प और धर्मनिष्ठा का प्रतीक है।
इतना ही नहीं भगवान परशुराम को शस्त्र और शास्त्र दोनों का अद्भुत ज्ञाता माना जाता है। महाभारत काल में भी उनका उल्लेख मिलता है, जहां उन्होंने भीष्म, द्रोणाचार्य और कर्ण जैसे महान योद्धाओं को शिक्षा दी। यह दर्शाता है कि वे केवल योद्धा ही नहीं बल्कि एक महान गुरु और तपस्वी भी थे।
समाज के लिए प्रेरणा
कार्यक्रम में वक्ताओं ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि आज के समय में भगवान परशुराम के आदर्श और भी अधिक प्रासंगिक हो गए हैं। उनके जीवन से हमें यह सीख मिलती है कि शक्ति का उपयोग सदैव धर्म और न्याय के लिए होना चाहिए। साथ ही समाज में भाईचारा, समानता और समरसता बनाए रखना हर व्यक्ति की जिम्मेदारी है।
भक्तिमय वातावरण और संकल्प
कार्यक्रम के दौरान धार्मिक अनुष्ठान, हवन पूजन और भजन कीर्तन का आयोजन किया गया, जिसने पूरे माहौल को भक्तिमय बना दिया। अंत में सभी उपस्थित लोगों ने एकजुट होकर समाज में सकारात्मक बदलाव लाने और सनातन संस्कृति को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया।
इस भव्य आयोजन ने यह साबित कर दिया कि काशी की धरती पर परंपरा और आस्था आज भी उतनी ही जीवंत है, जितनी सदियों पहले थी। परशुराम जयंती का यह आयोजन न केवल एक धार्मिक उत्सव रहा, बल्कि यह एक सांस्कृतिक चेतना और सामाजिक एकता का प्रतीक बनकर सामने आया।
रिपोर्ट: सियाराम तिवारी
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