बांदा विशेष अदालत का फैसला
उत्तर प्रदेश के बांदा जिले की विशेष अदालत ने नाबालिग बच्चों के यौन शोषण और अश्लील तस्वीरें तथा वीडियो वायरल करने के मामले में सिंचाई विभाग के निलंबित जूनियर इंजीनियर रामभवन और उसकी पत्नी दुर्गावती को फांसी की सजा सुनाई है। अदालत ने तीसरे आरोपी की फाइल अलग कर दी है जिस पर ई मेल के माध्यम से जानकारी साझा करने का आरोप है। जमानत मिलने के बाद वह जेल से बाहर है। यह मामला लंबे समय से जांच एजेंसियों और स्थानीय प्रशासन के लिए चुनौती बना हुआ था।
सीबीआई की जांच और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य
जांच एजेंसी सीबीआई ने मामले में एम्स में कराई गई पीडित बच्चों की मेडिकल जांच और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को अदालत के सामने रखा। पेन ड्राइव में मौजूद आपत्तिजनक वीडियो का अवलोकन अदालत ने किया। लैपटॉप और मोबाइल से मिले डेटा को भी साक्ष्य के रूप में पेश किया गया। सीबीआई के अनुसार करीब बारह साल पुराने वीडियो फुटेज के आधार पर पीडितों की पहचान की गई। जांच के दौरान कुल 34 बच्चों की पहचान हुई जो इस अपराध का शिकार बने थे।
विदेशों तक फैला नेटवर्क और ब्लैकमेलिंग
सीबीआई की जांच में सामने आया कि आरोपी बच्चों के साथ किए गए अपराध से जुड़े वीडियो और तस्वीरें विदेशों तक भेजकर धन अर्जित करता था। पूछताछ में आरोपी ने स्वीकार किया कि वह पांच से सोलह वर्ष की आयु के बच्चों को लालच देकर अपने जाल में फंसाता था। इलेक्ट्रॉनिक उपकरण देने का प्रलोभन देकर बच्चों को बुलाया जाता था। इसके बाद पीडित परिवारों को तस्वीरें दिखाकर रुपये की मांग की जाती थी। जांच में यह भी सामने आया कि आरोपी सोशल मीडिया के माध्यम से भी सामग्री साझा करता था।
पत्नी की भूमिका और गवाहों को प्रभावित करने की कोशिश
जांच एजेंसी के अनुसार आरोपी की पत्नी दुर्गावती ने गवाहों को प्रभावित करने की कोशिश की। सीबीआई जब गवाहों की सूची तैयार कर रही थी तब उन लोगों को तोडने की कोशिशें की गईं जो मामले में अहम कडी थे। जांच के दौरान यह भी सामने आया कि बच्चों को लाने में आरोपी की पत्नी की भूमिका रही। इस आधार पर अदालत ने दोनों को दोषी माना।
एम्स की मेडिकल टीम की भूमिका
मामले की गंभीरता को देखते हुए दिल्ली स्थित एम्स की पांच सदस्यीय विशेष मेडिकल टीम बांदा पहुंची थी। महिला और पुरुष डॉक्टरों की टीम ने पीडित बच्चों की जांच की। जांच में यह तथ्य सामने आया कि कुछ बच्चों के साथ कई बार अपराध किया गया था। आरोपी का भी मेडिकल परीक्षण एम्स में कराया गया था। इन मेडिकल रिपोर्टों को अदालत ने महत्वपूर्ण साक्ष्य के रूप में स्वीकार किया।
अदालत की टिप्पणी और सजा
विशेष पॉक्सो अदालत के न्यायाधीश प्रदीप कुमार मिश्रा ने अपने विस्तृत फैसले में इस अपराध को जघन्यतम करार दिया। अदालत ने कहा कि कई जिलों में फैले इस अपराध में दोषियों का नैतिक स्तर बेहद गिरा हुआ पाया गया। अदालत ने सुधार की कोई संभावना न देखते हुए कडी से कडी सजा को आवश्यक बताया। इसी आधार पर दोनों दोषियों को फांसी की सजा सुनाई गई।
पीडितों के लिए मुआवजा और जुर्माना
अदालत ने उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया कि प्रत्येक पीडित बच्चे को दस दस लाख रुपये का मुआवजा दिया जाए। इसके साथ ही आरोपियों के घर से बरामद राशि को पीडितों में समान रूप से वितरित करने के निर्देश दिए गए। रामभवन पर विभिन्न धाराओं में दोष सिद्ध होने पर छह लाख पैंतालीस हजार रुपये का जुर्माना लगाया गया जबकि उसकी पत्नी दुर्गावती पर पांच लाख चालीस हजार रुपये का अर्थदंड लगाया गया।
घटना का स्थानीय प्रभाव
इस मामले के बाद एसडीएम कॉलोनी में वह कमरा जहां आरोपी रहता था लंबे समय तक खाली नहीं हो सका। वर्ष दो हजार तेईस में आरोपी का भाई सामान ले गया लेकिन किराया बकाया रहा। घटना के बाद मोहल्ले में लोगों में डर का माहौल बना रहा और लंबे समय तक किराए पर कमरा देने से लोग हिचकिचाते रहे। आज भी उस गली में सन्नाटा देखा जाता है।
पृष्ठभूमि और आगे की कार्रवाई
यह मामला बच्चों के खिलाफ अपराधों पर सख्त कार्रवाई की आवश्यकता को रेखांकित करता है। जांच एजेंसियों की लंबी जांच और अदालत की सुनवाई के बाद यह फैसला आया है। प्रशासन ने कहा है कि पीडितों को न्याय दिलाने के लिए सभी कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किया गया। इस फैसले के बाद स्थानीय स्तर पर बाल संरक्षण से जुड़ी व्यवस्थाओं को मजबूत करने की जरूरत पर भी चर्चा शुरू हो गई है।
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