लखनऊ: उत्तर प्रदेश में पत्रकारों के खिलाफ हो रहे कथित पुलिस उत्पीड़न पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने ऐसा तीखा और निर्णायक रुख अपनाया है, जिसने पुलिस महकमे में हलचल मचा दी है। हरदोई के पत्रकार हरिश्याम बाजपेयी से जुड़े मामले में उच्च न्यायालय ने पुलिस की कार्यशैली को कानून के खुले दुरुपयोग की श्रेणी में मानते हुए हरदोई के पुलिस अधीक्षक को कड़ी फटकार लगाई और साफ शब्दों में चेतावनी दी कि यदि अब भी पुलिस ने अपनी कार्यप्रणाली नहीं सुधारी तो व्यक्तिगत स्तर पर कार्रवाई तय है। अदालत की यह टिप्पणी केवल एक मामले तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे प्रदेश में पत्रकारों के खिलाफ हो रहे दमन और डर के माहौल पर सीधा प्रहार मानी जा रही है।
मामले की पृष्ठभूमि बेहद गंभीर और चौंकाने वाली है। पत्रकार हरिश्याम बाजपेयी को वर्ष 2022 में कथित रूप से एक फर्जी मुकदमे में फंसा दिया गया। लंबी कानूनी लड़ाई के बाद वर्ष 2024 में उन्हें नियमित जमानत मिली। जमानत मिलने के बाद से वह लगातार हर पेशी पर न्यायालय में स्वयं उपस्थित होते रहे। इसके बावजूद हरदोई पुलिस ने न केवल उन्हें फरार अभियुक्त दर्शाया, बल्कि वर्ष 2025 में उनके ऊपर पांच हजार रुपये का इनाम घोषित कर दिया। सबसे गंभीर तथ्य यह है कि पुलिस रिकॉर्ड में कथित रूप से एनकाउंटर की लिखित तैयारी और धमकी तक दर्ज की गई, जिसने पूरे मामले को जीवन और स्वतंत्रता के सीधे खतरे में बदल दिया।
सुनवाई के दौरान यह तथ्य भी उजागर हुआ कि सीओ सिटी अंकित मिश्रा द्वारा तैयार की गई आख्या न सिर्फ भ्रामक थी, बल्कि उसी के आधार पर पुलिस अधीक्षक को गुमराह किया गया। यही आख्या राज्य मानवाधिकार आयोग को भी भेजी गई, जहां यह मामला अभी विचाराधीन है। अदालत में यह साफ हुआ कि एक जमानतशुदा पत्रकार को जानबूझकर फरार दिखाना न केवल न्यायालय के आदेश की अवहेलना है, बल्कि यह प्रेस की स्वतंत्रता को दबाने का गंभीर प्रयास भी है।
पत्रकार की ओर से पैरवी करते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता तैफीक सिद्दीकी ने उच्च न्यायालय के समक्ष मजबूती से तर्क रखा कि यह पूरा प्रकरण कानून व्यवस्था का नहीं, बल्कि सत्ता और पुलिस बल के दुरुपयोग का मामला है। उन्होंने अदालत को बताया कि जिस आदेश के तहत पत्रकार को जमानत मिली, उसी आदेश को नजरअंदाज कर पुलिस ने फर्जी इनाम घोषित किया और एनकाउंटर जैसी गंभीर आशंका पैदा की। इसे उन्होंने न्यायिक व्यवस्था को ठेंगा दिखाने जैसा कृत्य बताया।
मामले की सुनवाई कर रही न्यायमूर्ति बबिता रानी और न्यायमूर्ति मो. अब्दुल मोईन की खंडपीठ ने हरदोई पुलिस के रवैये पर गहरी नाराजगी जताई। अदालत ने स्पष्ट चेतावनी दी कि पुलिस अधिकारी दिमाग खोलकर काम करें और भविष्य में पत्रकार के साथ कोई भी अप्रिय घटना होती है तो इसके लिए सीधे तौर पर संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कानून के तहत कठोर कार्रवाई की जाएगी। यह चेतावनी केवल औपचारिक नहीं, बल्कि पुलिस अधिकारियों की व्यक्तिगत जवाबदेही तय करने वाला सख्त संकेत माना जा रहा है।
इस सनसनीखेज मामले में उत्तर प्रदेश के अपर मुख्य सचिव गृह, पुलिस महानिदेशक, एडीजी लखनऊ जोन, आईजी लखनऊ जोन, जिलाधिकारी हरदोई, पुलिस अधीक्षक, संबंधित सीओ, थाना प्रभारी और रेलवेगंज चौकी इंचार्ज को पक्षकार बनाया गया है। इससे स्पष्ट है कि मामला किसी एक स्तर तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे प्रशासनिक ढांचे की भूमिका पर सवाल उठाता है।
यह प्रकरण प्रदेश में पत्रकारों के खिलाफ बढ़ते उत्पीड़न, फर्जी मुकदमों और दबाव की प्रवृत्ति को उजागर करता है। उच्च न्यायालय की यह सख्त और आग बरसाती टिप्पणी न केवल हरदोई पुलिस बल्कि पूरे प्रदेश के पुलिस तंत्र के लिए एक स्पष्ट चेतावनी है कि यदि पत्रकारों की आवाज दबाने की कोशिश की गई, तो अदालतें चुप नहीं बैठेंगी। कानून के राज में कलम को डराने वालों के लिए अब न्यायिक जवाबदेही तय मानी जा रही है।
