संकट का सारथी जब खाली तिजोरी और बिखरती अर्थव्यवस्था के बीच सोने ने बचाई थी भारत की साख
नई दिल्ली: भारत के आर्थिक इतिहास में वर्ष 1991 को सबसे कठिन दौरों में गिना जाता है। यह वह समय था जब देश की अर्थव्यवस्था गंभीर संकट में फंस चुकी थी और विदेशी मुद्रा भंडार लगभग समाप्त होने की स्थिति में पहुंच गया था। आज जब वैश्विक तनाव और तेल की बढ़ती कीमतों के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देशवासियों से तेल की बचत और सोने की खरीद सीमित करने की अपील कर रहे हैं तब 1991 का वह दौर फिर चर्चा में आ गया है जब भारत को अपनी आर्थिक साख बचाने के लिए सोना गिरवी रखना पड़ा था। आज भारत दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है और उसके पास विशाल स्वर्ण भंडार मौजूद है लेकिन उस समय हालात बिल्कुल अलग थे।
लाइसेंस राज और वैश्विक संकट ने बढ़ाई मुश्किलें
1990 के शुरुआती वर्षों में भारत की अर्थव्यवस्था कई समस्याओं से घिरी हुई थी। देश में लाइसेंस परमिट व्यवस्था का प्रभाव था जिसके कारण उद्योग और व्यापार पर सरकारी नियंत्रण अधिक था। विदेशी निवेश सीमित था और अर्थव्यवस्था पूरी तरह खुली नहीं थी। राजनीतिक अस्थिरता ने आर्थिक हालात को और कमजोर कर दिया था। इसी बीच खाड़ी युद्ध शुरू हो गया जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल आया। तेल की कीमतें बढ़ने से भारत पर आयात का बोझ तेजी से बढ़ गया।
उस समय भारत का विदेशी मुद्रा भंडार लगातार घट रहा था और स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी थी कि देश के पास केवल कुछ सप्ताह के आयात के लिए ही विदेशी मुद्रा बची थी। दूसरी ओर सोवियत संघ के विघटन की स्थिति ने भारत के निर्यात पर भी गहरा असर डाला। राजकोषीय घाटा लगातार बढ़ रहा था और आर्थिक अस्थिरता ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारत की साख को कमजोर कर दिया था।
आधी रात में शुरू हुआ ऑपरेशन गोल्ड
जब हालात बेहद गंभीर हो गए और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के डिफॉल्टर घोषित होने का खतरा बढ़ने लगा तब तत्कालीन चंद्रशेखर सरकार ने एक ऐतिहासिक और कठिन फैसला लिया। देश की आर्थिक साख बचाने के लिए सोना गिरवी रखने की योजना बनाई गई। इस पूरी प्रक्रिया को बेहद गोपनीय रखा गया क्योंकि भारत में सोना केवल धातु नहीं बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक सम्मान का प्रतीक माना जाता है।
तत्कालीन वित्त सलाहकार मनमोहन सिंह वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा और भारतीय रिजर्व बैंक के अधिकारियों की देखरेख में विशेष विमानों के जरिए देश का सोना विदेश भेजा गया। कुल 67 टन सोना विदेशों में गिरवी रखा गया। इसमें 47 टन सोना बैंक ऑफ इंग्लैंड और बैंक ऑफ जापान को भेजा गया जबकि 20 टन सोना यूनियन बैंक ऑफ स्विट्जरलैंड के पास रखा गया। इस कदम के जरिए भारत को विदेशी मुद्रा मिली जिससे तत्काल आर्थिक संकट को संभालने में मदद मिली और देश को दिवालिया होने से बचाया जा सका।
आर्थिक सुधारों की शुरुआत बना संकट
1991 का आर्थिक संकट केवल कठिनाई नहीं बल्कि बड़े बदलाव की शुरुआत भी साबित हुआ। इसी दौर के बाद भारत ने आर्थिक सुधारों की दिशा में कदम बढ़ाया। लाइसेंस राज को धीरे धीरे समाप्त किया गया और विदेशी निवेश के लिए दरवाजे खोले गए। उदारीकरण निजीकरण और वैश्वीकरण की नीतियों ने भारतीय अर्थव्यवस्था को नई दिशा दी। आने वाले वर्षों में भारत ने तेजी से आर्थिक विकास किया और विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत होता चला गया।
आज की स्थिति और सरकार की सावधानी
आज भारत की आर्थिक स्थिति 1991 की तुलना में कहीं अधिक मजबूत मानी जाती है। देश के पास पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार और मजबूत स्वर्ण भंडार है। फिर भी वैश्विक तनाव और मिडिल ईस्ट में जारी संघर्ष ने तेल की कीमतों और सप्लाई चेन को लेकर नई चिंताएं पैदा कर दी हैं। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयातित तेल और सोने से पूरा करता है इसलिए इन दोनों पर खर्च होने वाली विदेशी मुद्रा सरकार के लिए महत्वपूर्ण विषय बना हुआ है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा तेल की बचत और सोने की खरीद कम करने की अपील को आर्थिक सतर्कता के तौर पर देखा जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि 1991 के अनुभव ने भारत को यह सिखाया कि आर्थिक आत्मनिर्भरता और मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार किसी भी देश के लिए कितने महत्वपूर्ण होते हैं। यही कारण है कि आज सरकार वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच आर्थिक संतुलन बनाए रखने पर विशेष ध्यान दे रही है ताकि देश को दोबारा वैसी स्थिति का सामना न करना पड़े जब अपनी साख बचाने के लिए राष्ट्रीय संपत्ति को विदेशों में गिरवी रखना पड़े।
LATEST NEWS