वाराणसी: देवाधिदेव महादेव की अनन्य नगरी काशी में महाशिवरात्रि का पर्व केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आस्था, परंपरा और संस्कृति का जीवंत उत्सव होता है। जैसे-जैसे महाशिवरात्रि निकट आ रही है, वैसे-वैसे टेढ़ीनीम स्थित विश्वनाथ मंदिर के महंत आवास पर सदियों पुरानी शिव-विवाह परंपराएं पूरी भव्यता के साथ आकार लेने लगी हैं। बाबा विश्वनाथ की हल्दी, शिव-विवाह, भव्य शिव बारात और गौना की रस्मों को लेकर पूरे परिसर में भक्तिमय उल्लास व्याप्त है।
इस वर्ष महाशिवरात्रि का पर्व विशेष रूप से ऐतिहासिक बनने जा रहा है, क्योंकि पहली बार बाबा विश्वनाथ और माता गौरा की चल प्रतिमा असमिया पारंपरिक परिधान और आभूषणों में सजेगी। यह श्रृंगार न केवल देखने में अद्भुत होगा, बल्कि भारत की विविध सांस्कृतिक परंपराओं को एक सूत्र में पिरोने का भी सशक्त संदेश देगा।
शिवसागर से काशी तक पहुंचे असमिया परिधान
विश्वनाथ मंदिर के महंत वाचस्पति तिवारी ने जानकारी दी कि इस बार बाबा विश्वनाथ और माता गौरा के लिए जो परिधान और आभूषण चुने गए हैं, वे असम के ऐतिहासिक नगर शिवसागर से विशेष रूप से मंगाए गए हैं। यह निर्णय केवल सौंदर्य की दृष्टि से नहीं, बल्कि सांस्कृतिक समन्वय के भाव से लिया गया है। इसके माध्यम से काशी और असम की प्राचीन आध्यात्मिक विरासतों का सुंदर और अर्थपूर्ण संगम देखने को मिलेगा।
‘चेलेंग–गसोमा’ में सजे महादेव
महंत वाचस्पति तिवारी के अनुसार, बाबा विश्वनाथ की चल प्रतिमा को असमिया पुरुष पारंपरिक परिधान ‘चेलेंग’ और ‘गसोमा’ धारण कराया जाएगा। यह परिधान असम की सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक माना जाता है। इस वेशभूषा में बाबा विश्वनाथ का स्वरूप अत्यंत गरिमामय, राजसी और दिव्य दिखाई देगा, जो शिव-विवाह की भव्यता को और अधिक ऊंचाई प्रदान करेगा।
नववधू के रूप में माता गौरा का मनोहारी श्रृंगार
माता गौरा का श्रृंगार इस वर्ष श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र रहेगा। उन्हें लाल और सुनहरे रंग की रेशमी असमिया पारंपरिक ‘मेखेला साड़ी’ पहनाई जाएगी। इसके साथ माता गौरा को असमिया पारंपरिक आभूषणों से अलंकृत किया जाएगा, जिनमें अर्धचंद्राकार हार जूनबीरी, पारंपरिक कंगन गुमखारू और मांगटिका थुरिया शामिल हैं। इन आभूषणों के साथ माता गौरा का स्वरूप एक नववधू के रूप में अत्यंत अलौकिक और मनोहारी प्रतीत होगा।
काशी की कलाकार निभा रहीं श्रृंगार की परंपरा
यह संपूर्ण श्रृंगार टेढ़ीनीम स्थित महंत आवास पर काशी की सुप्रसिद्ध सांस्कृतिक कलाकार आकांक्षा गुप्ता द्वारा किया जा रहा है। वे लोककल्याण और अखंड सौभाग्य की कामना के भाव से माता गौरा का श्रृंगार कर रही हैं। महंत वाचस्पति तिवारी ने बताया कि काशी में कलाकार के हाथों किया जा रहा यह श्रृंगार परंपरा, भक्ति और कला का अनूठा उदाहरण है, जो पीढ़ियों से चली आ रही आस्थाओं को जीवंत बनाए हुए है।
शिव बारात में काशी की हस्तकला की झलक
महंत आवास आयोजन समिति के संयोजक संजीव रत्न मिश्र ने बताया कि इस वर्ष निकलने वाली ऐतिहासिक शिव बारात में भी एक नया और विशेष आकर्षण जोड़ा गया है। शिव बारात में शामिल प्रतीकात्मक बाबा विश्वनाथ की प्रतिमा को काशी में ही तैयार मलमल और जरी से बने राजसी परिधान धारण कराए जाएंगे। यह पोशाक भी कलाकार आकांक्षा गुप्ता द्वारा तैयार की जा रही है। इसके माध्यम से काशी की पारंपरिक बुनाई, कारीगरी और हस्तकला को देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं के समक्ष प्रस्तुत करने का प्रयास किया जा रहा है।
हल्दी से रंगभरी एकादशी तक चलेगा उत्सव का क्रम
महंत वाचस्पति तिवारी ने बताया कि महाशिवरात्रि से पूर्व 13 फरवरी, शुक्रवार को बाबा विश्वनाथ की हल्दी की रस्म संपन्न होगी। इसके बाद महाशिवरात्रि के दिन विधिवत शिव-विवाह का आयोजन किया जाएगा। महाशिवरात्रि के पश्चात टेढ़ीनीम स्थित महंत आवास गौरा-सदनिका का रूप ले लेता है। यहीं से अमलका यानी रंगभरी एकादशी के दिन माता गौरा की गौना पालकी यात्रा निकाली जाती है।
परंपरा के अनुसार, काशीवासी रजत पालकी में बाबा विश्वनाथ और माता गौरा को विराजमान कर विश्वनाथ मंदिर तक ले जाते हैं। वहां बाबा से होली खेलने की अनुमति मांगी जाती है, और इसी के साथ काशी में फागोत्सव का उल्लासपूर्ण आरंभ होता है।
परंपरा, भक्ति और संस्कृति का जीवंत उत्सव
इस वर्ष असमिया परिधान और काशी की प्राचीन परंपराओं का यह अद्भुत संगम महाशिवरात्रि को एक नई ऐतिहासिक पहचान देगा। शिव–गौरा का यह दिव्य और सांस्कृतिक रूप न केवल श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक आनंद से भर देगा, बल्कि भारत की विविधता में एकता का सशक्त संदेश भी देगा। काशी में शिव-विवाह का यह अनुपम और भव्य दृश्य श्रद्धालुओं के लिए लंबे समय तक स्मृतियों में बसने वाला अनुभव बनने जा रहा है।
