वाराणसी में बीएचयू के एमए इतिहास प्रश्नपत्र पर बढ़ा विवाद, छात्र प्रदर्शन के बीच तेज हुई राजनीतिक बहस
वाराणसी: काशी हिंदू विश्वविद्यालय में एमए इतिहास चौथे सेमेस्टर की परीक्षा में पूछे गए एक प्रश्न को लेकर शुरू हुआ विवाद अब विश्वविद्यालय परिसर से निकलकर राजनीतिक और वैचारिक चर्चा का विषय बनता जा रहा है। परीक्षा में शामिल एक शब्दावली पर छात्रों के एक वर्ग ने आपत्ति जताते हुए इसे अकादमिक निष्पक्षता और सामाजिक संवेदनशीलता से जुड़ा विषय बताया है। इस पूरे घटनाक्रम के बाद परिसर में छात्र प्रदर्शन, विभिन्न संगठनों की प्रतिक्रियाएं और सोशल मीडिया पर चल रही बहसों ने माहौल को और गर्म कर दिया है।
मामले ने उस समय तूल पकड़ा जब एमए इतिहास चौथे सेमेस्टर की परीक्षा में ब्राह्मणवादी पितृसत्ता शब्द से जुड़ा एक प्रश्न पूछा गया। कुछ छात्रों ने इस प्रश्न पर आपत्ति दर्ज कराते हुए कहा कि यह प्रश्न पाठ्यक्रम की सीमा से बाहर है और इससे वैचारिक मतभेदों के साथ सामाजिक असहमति की स्थिति भी उत्पन्न हो सकती है। छात्रों का कहना है कि विश्वविद्यालय जैसे शैक्षणिक संस्थानों में प्रश्नों का स्वरूप संतुलित और अकादमिक दृष्टि से निष्पक्ष होना चाहिए।
इतिहास विभाग के बाहर छात्रों का प्रदर्शन
इसी मुद्दे को लेकर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़े छात्रों ने इतिहास विभाग के बाहर प्रदर्शन किया। प्रदर्शन के दौरान छात्र बैनर और पोस्टर लेकर पहुंचे और विश्वविद्यालय प्रशासन के खिलाफ नारेबाजी की। प्रदर्शनकारी छात्रों ने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की मांग उठाई।
प्रदर्शन में शामिल छात्रों का कहना था कि संबंधित प्रश्नपत्र इतिहास विभाग की प्रोफेसर सुतापा दास द्वारा तैयार किया गया था। हालांकि इस संबंध में विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से अब तक कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है। प्रशासन की चुप्पी के कारण छात्रों के बीच चर्चा और भी तेज हो गई है।
विभागाध्यक्ष को सौंपा गया ज्ञापन
एबीवीपी की बीएचयू इकाई ने इतिहास विभाग का घेराव करते हुए विभागाध्यक्ष को ज्ञापन भी सौंपा। परिषद की ओर से मामले की समीक्षा और जवाबदेही तय करने की मांग की गई। छात्रों ने कहा कि परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता और संतुलन बनाए रखना विश्वविद्यालय प्रशासन की जिम्मेदारी है।
इकाई अध्यक्ष पल्लव सुमन ने कहा कि बीएचयू जैसी प्रतिष्ठित संस्था में किसी भी वैचारिक दृष्टिकोण से प्रेरित प्रश्नों का शामिल होना चिंताजनक विषय है। उनके अनुसार विश्वविद्यालय ज्ञान, शोध और निष्पक्ष चिंतन का केंद्र होना चाहिए, न कि वैचारिक संघर्ष का मंच।
वहीं इकाई के सहमंत्री विकास कुमार ने कहा कि ऐसे प्रश्न छात्रों के बीच वैचारिक विभाजन पैदा कर सकते हैं। उन्होंने मांग की कि भविष्य में प्रश्नपत्र निर्माण प्रक्रिया में संतुलन और निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए स्पष्ट व्यवस्था बनाई जाए।
राजनीतिक प्रतिक्रियाओं ने बढ़ाई चर्चा
यह विवाद अब राजनीतिक गलियारों तक भी पहुंच गया है। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अजय राय ने भी इस मामले को लेकर प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि शिक्षा संस्थानों का मूल उद्देश्य समाज में ज्ञान, संवेदनशीलता और एकता का विस्तार करना होना चाहिए, न कि ऐसी परिस्थितियां बनाना जिससे सामाजिक या जातीय तनाव बढ़े।
अजय राय ने आरोप लगाया कि इस प्रकार की शब्दावली को परीक्षा में शामिल करने से समाज में विभाजन की मानसिकता को बढ़ावा मिल सकता है। उन्होंने अपने बयान में कहा कि भारत की सनातन परंपरा में ब्राह्मण समाज की ऐतिहासिक भूमिका महत्वपूर्ण रही है। वेद, उपनिषद, संस्कृत साहित्य और भारतीय दर्शन के संरक्षण और विकास में इस समाज का उल्लेखनीय योगदान रहा है।
उन्होंने कहा कि किसी भी समुदाय को संदेह या विवाद के दायरे में खड़ा करने वाली सोच भारतीय संस्कृति और संविधान की मूल भावना के अनुरूप नहीं मानी जा सकती।
पूर्व विवादों का भी किया उल्लेख
अपने बयान के दौरान अजय राय ने कहा कि इससे पहले उत्तर प्रदेश की दरोगा भर्ती परीक्षा में ब्राह्मण समाज से जुड़े प्रश्नों और घूसखोर पंडित फिल्म को लेकर भी विवाद सामने आ चुके हैं। उनके अनुसार बीएचयू में इस तरह का प्रश्न सामने आने से शिक्षा व्यवस्था में वैचारिक हस्तक्षेप की आशंकाओं को बल मिलता है।
उन्होंने विश्वविद्यालय प्रशासन से विवादित प्रश्न की समीक्षा करने और भविष्य में ऐसे मामलों से बचने के लिए आवश्यक कदम उठाने की मांग की।
छात्रों ने भी रखी अपनी राय
इस मुद्दे पर विश्वविद्यालय के कुछ छात्र भी खुलकर अपनी राय रख रहे हैं। छात्र शिवम सोनकर ने कहा कि ऐसे प्रश्नों के माध्यम से काशी हिंदू विश्वविद्यालय की शैक्षणिक पहचान को प्रभावित करने का प्रयास किया जा रहा है। उनका कहना था कि विश्वविद्यालय को शिक्षा और अनुसंधान का केंद्र बनाए रखना चाहिए, जहां विचारों पर चर्चा हो लेकिन वैचारिक संघर्ष को बढ़ावा न मिले।
प्रशासन की प्रतिक्रिया पर टिकी नजर
फिलहाल विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। हालांकि परिसर में इस मुद्दे को लेकर बहस लगातार तेज होती जा रही है। छात्रों, संगठनों और विभिन्न पक्षों की प्रतिक्रियाओं के बीच अब सभी की नजर विश्वविद्यालय प्रशासन की अगली कार्रवाई और संभावित जांच प्रक्रिया पर टिकी हुई है।
LATEST NEWS