कॉल स्पूफिंग का बढ़ता जाल: भरोसे की आड़ में हो रहा डिजिटल हमला
डिजिटल युग ने हमारी जिंदगी को आसान जरूर बनाया है, लेकिन इसी सुविधा के बीच एक ऐसा खतरा भी पनप रहा है जो सीधे आपकी जेब पर हमला करता है। आज मोबाइल फोन सिर्फ बातचीत का जरिया नहीं रह गया है, बल्कि बैंकिंग, लेनदेन और निजी सूचनाओं का केंद्र बन चुका है। इसी बदले हुए माहौल में साइबर अपराधियों ने भी अपने तरीके बेहद चालाक और तकनीकी बना लिए हैं। इन्हीं में से एक खतरनाक तरीका है कॉल स्पूफिंग, जो भरोसे की आड़ में लोगों को जाल में फंसाने का काम करता है।
क्या है कॉल स्पूफिंग और कैसे काम करती है यह तकनीक
कॉल स्पूफिंग को आसान भाषा में समझें तो यह एक ऐसी तकनीक है जिसमें कॉल करने वाला व्यक्ति अपनी असली पहचान छिपाकर कोई भी मनचाहा नंबर आपके फोन पर प्रदर्शित कर सकता है। स्क्रीन पर वही नंबर दिखाई देता है जिस पर आमतौर पर आप भरोसा करते हैं। कई बार यह नंबर किसी बैंक, पुलिस थाने, सरकारी कार्यालय या आपके जान पहचान वाले व्यक्ति का लगता है। यही भ्रम इस अपराध की सबसे बड़ी ताकत है। ठग इंटरनेट आधारित कॉलिंग सिस्टम और विशेष सॉफ्टवेयर का उपयोग कर कॉल की पहचान बदल देते हैं। कई मामलों में विदेशी सर्वर और अवैध टेलीकॉम नेटवर्क की मदद ली जाती है, जिससे कॉल की असली लोकेशन और स्रोत का पता लगाना कठिन हो जाता है।
डिजिटल अरेस्ट और मानसिक दबाव की रणनीति
पिछले कुछ वर्षों में देश में कॉल स्पूफिंग से जुड़े मामलों में तेजी देखी गई है। खासतौर पर डिजिटल अरेस्ट जैसे मामलों में ठग खुद को सीबीआई, ईडी, पुलिस या आरबीआई का अधिकारी बताकर लोगों को डराते हैं। वे दावा करते हैं कि आपका नाम किसी मनी लॉन्ड्रिंग या ड्रग्स केस में सामने आया है और आप जांच के दायरे में हैं। इसके बाद वीडियो कॉल के जरिए कथित पूछताछ शुरू होती है। सामने वर्दी जैसा बैकग्राउंड, फर्जी पहचान पत्र और सख्त लहजा दिखाकर मानसिक दबाव बनाया जाता है। घबराहट में लोग अपनी जमा पूंजी अलग अलग खातों में ट्रांसफर कर देते हैं। कई मामलों में पीड़ितों को घंटों तक कॉल पर रोके रखा जाता है ताकि वे किसी से सलाह न ले सकें।
आंकड़े बता रहे हैं खतरे की गंभीरता
आंकड़े इस समस्या की गंभीरता को साफ दिखाते हैं। वर्ष 2025 में देशभर में साइबर धोखाधड़ी से लोगों ने 19000 करोड़ रुपये से अधिक की राशि गंवाई। इसमें कॉल स्पूफिंग की बड़ी भूमिका सामने आई। सरकार ने इस चुनौती से निपटने के लिए वर्ष 2025 में सीआईओआर सिस्टम लागू किया, जिसके बाद अंतरराष्ट्रीय स्पूफ कॉल्स में लगभग 97 प्रतिशत तक कमी दर्ज की गई। इसके बावजूद अपराधी नए तरीके तलाश रहे हैं। कभी वे लोकल नंबर का सहारा लेते हैं, तो कभी किसी बैंक या सरकारी कार्यालय का नंबर दिखाकर लोगों को भ्रमित करते हैं। तकनीक लगातार बदल रही है और अपराधी भी उसी गति से खुद को अपडेट कर रहे हैं।
कैसे करें खुद का बचाव
विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह के अपराध में तकनीक से ज्यादा मानव मनोविज्ञान का इस्तेमाल होता है। डर, घबराहट और जल्दबाजी में लिया गया फैसला ही सबसे बड़ी चूक बन जाता है। किसी भी अनजान कॉल पर ओटीपी, सीवीवी, पासवर्ड या बैंक संबंधी जानकारी साझा न करें। यदि कोई खुद को अधिकारी बताकर धमकी देता है तो तुरंत कॉल काट दें। संबंधित विभाग के आधिकारिक नंबर पर स्वयं संपर्क कर सत्यापन करें। संदेह की स्थिति में 1930 साइबर क्राइम हेल्पलाइन पर शिकायत दर्ज कराई जा सकती है। यह याद रखना जरूरी है कि कोई भी बैंक या सरकारी एजेंसी फोन पर पैसे ट्रांसफर करने के लिए दबाव नहीं बनाती।
डिजिटल सुविधाएं जितनी तेज और आसान हुई हैं, जोखिम भी उतना ही जटिल हुआ है। ऐसे में जागरूकता और सतर्कता ही सबसे मजबूत कवच है। एक पल की समझदारी वर्षों की मेहनत से कमाई पूंजी को सुरक्षित रख सकती है। कॉल स्पूफिंग जैसी तकनीकें भले ही उन्नत हों, लेकिन सचेत नागरिक इनके सामने सबसे बड़ी दीवार साबित हो सकते हैं।
