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India

तमिलनाडु: सथानकुलम कस्टोडियल डेथ केस में 9 पुलिसकर्मियों को फांसी की सजा

Sandeep Srivastava Sub Editor News Report Newspaper
Last updated: 06/04/2026 22:40
By
Sandeep Srivastava
Sandeep Srivastava Sub Editor News Report Newspaper
BySandeep Srivastava
Sandeep Srivastava serves as a Sub Editor at News Report, a registered Hindi newspaper dedicated to ethical, accurate, and reader-focused journalism. He is responsible for copy...
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6 Min Read
तमिलनाडु सथानकुलम कस्टोडियल डेथ केस में फांसी की सजा पाने वाले पुलिसकर्मी
मदुरै कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला सामने आया।
Contents
  • सथानकुलम कस्टोडियल डेथ केस: न्याय का ऐतिहासिक फैसला, 9 पुलिसकर्मियों को फांसी की सजा
  • 6 साल बाद मिला न्याय
  • क्या था पूरा मामला?
  • जांच में सामने आई भयावह सच्चाई
  • सीसीटीवी सबूतों की कमी के बावजूद सख्त फैसला
  • दोषियों को मिली कड़ी सजा
  • न्यायपालिका का सख्त संदेश
  • मानवाधिकार और जवाबदेही पर बड़ा सवाल
  • एक मिसाल, जो लंबे समय तक याद रहेगी

सथानकुलम कस्टोडियल डेथ केस: न्याय का ऐतिहासिक फैसला, 9 पुलिसकर्मियों को फांसी की सजा

तमिलनाडु: बहुचर्चित सथानकुलम कस्टोडियल डेथ केस में सोमवार का दिन भारतीय न्यायिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक मोड़ के रूप में दर्ज हो गया। मदुरै की सेशन कोर्ट ने इस मामले में दोषी पाए गए 9 पुलिसकर्मियों को फांसी की सजा सुनाते हुए इसे “रेयरेस्ट ऑफ रेयर” की श्रेणी में रखा। अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट शब्दों में कहा कि यह केवल एक आपराधिक घटना नहीं, बल्कि सत्ता के घोर दुरुपयोग, मानवाधिकारों के उल्लंघन और अमानवीय बर्बरता का प्रतीक है, जिसे किसी भी परिस्थिति में स्वीकार नहीं किया जा सकता।

6 साल बाद मिला न्याय

करीब छह वर्षों तक चली लंबी और जटिल न्यायिक प्रक्रिया के बाद यह फैसला सामने आया है। इस केस ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था और न्याय की प्रतीक्षा कर रहे परिजनों के लिए यह फैसला एक बड़ी राहत के रूप में सामने आया। अदालत ने दोषियों को मृतकों के परिवार को कुल 1 करोड़ 40 लाख रुपये मुआवजा देने का भी आदेश दिया, जिससे न्याय के साथ-साथ पीड़ित परिवार को आर्थिक सहायता भी मिल सके।

क्या था पूरा मामला?

यह मामला 19 जून 2020 का है, जब लॉकडाउन के दौरान पुलिस ने सथानकुलम क्षेत्र में मोबाइल फोन की दुकान चलाने वाले 59 वर्षीय पी. जयराज और उनके 31 वर्षीय बेटे जे. बेनिक्स को हिरासत में लिया था। आरोप था कि उन्होंने प्रतिबंध के बावजूद अपनी दुकान खुली रखी थी। इसके बाद दोनों को थाने ले जाया गया और फिर न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया।

लेकिन कुछ ही दिनों के भीतर पिता-पुत्र की मौत की खबर सामने आई, जिसने पूरे देश में आक्रोश और आंसू दोनों पैदा कर दिए। परिजनों और स्थानीय लोगों ने आरोप लगाया कि दोनों को पुलिस हिरासत में बेरहमी से पीटा गया था। मेडिकल रिपोर्ट्स में भी गंभीर चोटों के निशान और अत्यधिक रक्तस्राव के संकेत मिले, जिसने इन आरोपों को और मजबूत किया।

जांच में सामने आई भयावह सच्चाई

मामले की गंभीरता को देखते हुए पहले जांच राज्य की सीबी-सीआईडी को सौंपी गई, लेकिन बाद में इसे केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) को ट्रांसफर कर दिया गया। सीबीआई ने गहन जांच के बाद एक इंस्पेक्टर, दो सब-इंस्पेक्टर सहित कुल 10 पुलिसकर्मियों को गिरफ्तार किया और उनके खिलाफ हत्या समेत कई गंभीर धाराओं में मामला दर्ज किया।

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जांच के दौरान सामने आए तथ्य बेहद चौंकाने वाले थे। एक महिला कांस्टेबल की गवाही इस केस में निर्णायक साबित हुई। उसने अदालत में बताया कि पिता-पुत्र को पूरी रात लगातार पीटा गया था। थाने के अंदर मौजूद टेबल, लाठियों और अन्य वस्तुओं पर खून के निशान मिले थे, जो इस बर्बरता की पुष्टि करते थे।

सीसीटीवी सबूतों की कमी के बावजूद सख्त फैसला

जांच के दौरान यह भी सामने आया कि सथानकुलम थाने का सीसीटीवी सिस्टम नियमित रूप से डेटा ओवरराइट कर देता था, जिसके कारण कई महत्वपूर्ण सबूत नष्ट हो गए। इसके बावजूद अदालत ने गवाहों के बयान, मेडिकल रिपोर्ट और अन्य परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर दोष सिद्ध किया।

कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि यह घटना आकस्मिक नहीं थी, बल्कि सुनियोजित और निरंतर यातना का परिणाम थी। इस प्रकार की बर्बरता किसी भी सभ्य समाज में अस्वीकार्य है और ऐसे मामलों में कठोरतम सजा ही न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप है।

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दोषियों को मिली कड़ी सजा

मामले में कुल 10 आरोपी थे, जिनमें से एक की कोविड-19 के दौरान मृत्यु हो चुकी है। शेष 9 पुलिसकर्मियों जिनमें एक इंस्पेक्टर, एक सब इंस्पेक्टर, हेड कॉन्स्टेबल और अन्य कॉन्स्टेबल शामिल हैं, को अदालत ने दोषी करार देते हुए फांसी की सजा सुनाई। फैसले के बाद सभी दोषियों को कड़ी सुरक्षा के बीच कोर्ट परिसर से बाहर ले जाया गया।

न्यायपालिका का सख्त संदेश

यह फैसला केवल एक मामले का निपटारा नहीं है, बल्कि पूरे देश के पुलिस तंत्र और कानून व्यवस्था के लिए एक कड़ा संदेश है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया कि वर्दी के नाम पर किसी भी प्रकार का अत्याचार अब बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। कानून से ऊपर कोई नहीं है, चाहे वह किसी भी पद या अधिकार में क्यों न हो।

मानवाधिकार और जवाबदेही पर बड़ा सवाल

सथानकुलम की यह घटना मानवाधिकारों की सुरक्षा और पुलिस जवाबदेही को लेकर एक बड़ी बहस का कारण बनी। इसने यह सवाल खड़ा किया कि क्या हिरासत में लिए गए व्यक्तियों की सुरक्षा के लिए पर्याप्त व्यवस्था है? क्या पुलिसकर्मियों को उनके अधिकारों की सीमाएं स्पष्ट रूप से समझाई जाती हैं?

एक मिसाल, जो लंबे समय तक याद रहेगी

यह फैसला अब एक मिसाल बन चुका है। एक ऐसी नजीर, जो आने वाले समय में हर उस व्यक्ति को सोचने पर मजबूर करेगी, जिसके हाथ में कानून लागू करने की जिम्मेदारी है। यह उन तमाम लोगों के लिए उम्मीद की किरण है, जो न्याय की राह में संघर्ष कर रहे हैं।

संदेश साफ है,न्याय में देरी हो सकती है, लेकिन न्याय मिलता जरूर है। और जब मिलता है, तो वह न केवल पीड़ितों को राहत देता है, बल्कि पूरे समाज को एक नई दिशा भी दिखाता है।

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