वाराणसी: बेटे को छुड़ाने की कीमत, रामनगर राजकीय सम्प्रेक्षण गृह पर गंभीर आरोपों से मचा हड़कंप, रोते-बिलखते परिजनों का वीडियो बना व्यवस्था पर बड़ा सवाल
वाराणसी/रामनगर: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के संसदीय क्षेत्र काशी एक बार फिर ऐसे मामले को लेकर चर्चा में है, जिसने न केवल प्रशासनिक तंत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, बल्कि बाल संरक्षण व्यवस्था की संवेदनशीलता और पारदर्शिता को भी कटघरे में ला खड़ा किया है। वाराणसी के रामनगर स्थित राजकीय सम्प्रेक्षण गृह पर लगे कथित वसूली के आरोपों ने पूरे मामले को बेहद गंभीर बना दिया है। जौनपुर निवासी एक गरीब दंपति का रोता-बिलखता वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें वे अपने बेटे को छोड़ने की प्रक्रिया के दौरान कर्मचारियों और व्यवस्था पर पैसे मांगने जैसे गंभीर आरोप लगाते दिखाई दे रहे हैं।
यह मामला अब केवल एक परिवार की पीड़ा का विषय नहीं रह गया है, बल्कि यह सवाल उठने लगे हैं कि जिन संस्थानों को समाज के सबसे संवेदनशील वर्ग बच्चों और उनके परिवारों की सुरक्षा और संरक्षण के लिए बनाया गया है, यदि वहीं कथित रूप से मजबूरी और गरीबी की कीमत तय होने लगे तो आखिर व्यवस्था की आत्मा कहां खड़ी है?
वीडियो में दिखाई दे रही एक मां की आंखों से बहते आंसू और पिता की टूटी आवाज केवल एक परिवार की तकलीफ नहीं, बल्कि उस दर्द की तस्वीर बनकर सामने आई है जिसे अक्सर सरकारी फाइलों और कार्यालयी प्रक्रियाओं के पीछे दबा दिया जाता है।
500 रुपये मुलाकात के लिए, 1500 रुपये छोड़ने के लिए-परिजनों के आरोप ने बढ़ाई गंभीरता
पीड़ित पिता चंद्रमोहन और उनकी पत्नी ने बेहद गंभीर आरोप लगाते हुए दावा किया है कि उनके बेटे लवकुश से मिलने के लिए उनसे 500 रुपये लिए गए। इतना ही नहीं, उनका आरोप है कि न्यायालय द्वारा बच्चे को छोड़ने का आदेश मिलने के बाद भी प्रक्रिया पूरी कराने के नाम पर 3000 रुपये की मांग की गई। परिजनों ने जैसे-तैसे करके 1500 रुपए की व्यवस्था करके दी तब जा कर उनके बच्चे लवकुश को छोड़ा गया,वो भी इस शर्त पर की किसी से कहना नहीं कि पैसे लिए गए है।
परिजनों का कहना है कि वे कई दिनों से अपने बेटे को घर लाने के लिए सम्प्रेक्षण गृह के चक्कर काट रहे थे। हर बार उन्हें कभी कागजी प्रक्रिया, कभी अधिकारी और कभी अन्य औपचारिकताओं के नाम पर उलझाया गया। जब सारी प्रक्रिया पूरी होने के बाद भी बच्चा नहीं छोड़ा गया तो उन्होंने सवाल उठाए। आरोप है कि इसके बाद पैसों की मांग सामने आई।
वायरल वीडियो में पिता की आवाज में नाराजगी से ज्यादा बेबसी दिखाई देती है। उनका दर्द जैसे व्यवस्था से पूछ रहा हो कि यदि न्यायालय का आदेश भी किसी गरीब परिवार को राहत नहीं दिला सकता, तो फिर उसके पास न्याय पाने का रास्ता आखिर बचता क्या है?
गरीब की कोई सुनवाई नहीं-कैमरे के सामने छलका दर्द
वीडियो में महिला बार-बार यही आरोप लगाती सुनाई दे रही है कि गरीब होने की वजह से उनकी मजबूरी का फायदा उठाया गया। पति पत्नी का कहना है कि उन्होंने कई बार गुहार लगाई, लेकिन उनकी बात सुनने वाला कोई नहीं मिला।
परिजनों ने यह भी दावा किया कि उनके जैसे कई और लोग भी ऐसी परेशानियों से गुजरते होंगे, लेकिन भय, दबाव और व्यवस्था के डर से सामने नहीं आते। वायरल वीडियो में कथित रूप से ऐसी बातें भी सुनाई दे रही हैं कि मामले को किसी से न बताने की सलाह दी जा रही है। यदि ऐसा है तो यह मामला और गंभीर हो जाता है।
क्योंकि सवाल केवल पैसों का नहीं है, सवाल उस विश्वास का है जो एक आम नागरिक सरकारी संस्थानों से रखता है।
बीते सप्ताह की घटना से जुड़ने लगे सवाल, फिर कठघरे में आया संस्थान
इस पूरे घटनाक्रम ने इसलिए भी ज्यादा हलचल पैदा कर दी है, क्योंकि अभी बीते सप्ताह जौनपुर की ही एक किशोरी की संदिग्ध परिस्थितियों में बालिका गृह के बाथरूम में मौत का मामला सुर्खियों में रहा था। उस घटना की जांच अभी जारी ही थी कि अब यह नया वीडियो सामने आने के बाद बाल संरक्षण संस्थानों की कार्यप्रणाली पर बहस और तेज हो गई है।
लोग सवाल पूछ रहे हैं कि आखिर इन संस्थानों के भीतर क्या चल रहा है। क्या नियमित निगरानी हो रही है। क्या जिम्मेदार अधिकारी समय समय पर व्यवस्थाओं की समीक्षा कर रहे हैं। और यदि सब कुछ ठीक है तो फिर लगातार ऐसे मामले सामने क्यों आ रहे हैं।
जीरो टॉलरेंस की नीति के बीच उठे बड़े सवाल
प्रदेश सरकार लगातार भ्रष्टाचार और अनियमितताओं पर जीरो टॉलरेंस की नीति की बात करती रही है। लेकिन यदि एक सरकारी संरक्षण गृह से इस तरह के आरोप सामने आते हैं तो विपक्ष ही नहीं, आम लोग भी सवाल उठा रहे हैं कि क्या नीचे तक वही सख्ती पहुंच पा रही है जिसकी घोषणा मंचों से की जाती है।
सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या सम्प्रेक्षण गृहों की मॉनिटरिंग नियमित रूप से हो रही है। क्या गरीब परिवारों के साथ ऐसा व्यवहार पहली बार हुआ है। क्या विभागीय अधिकारियों को पहले से कोई शिकायत मिली थी। और यदि नहीं मिली तो शिकायत व्यवस्था और निगरानी तंत्र आखिर किस स्थिति में है।
यह सिर्फ वीडियो नहीं, व्यवस्था के चेहरे पर उठता आईना है
स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ताओं और कई लोगों ने मामले की निष्पक्ष तथा उच्चस्तरीय जांच की मांग उठाई है। मांग की जा रही है कि सम्प्रेक्षण गृह के सीसीटीवी फुटेज, रजिस्टर, आगंतुक रिकॉर्ड और संबंधित कर्मचारियों की भूमिका की गहन जांच हो ताकि सच्चाई सामने आ सके।
लोगों का कहना है कि यदि आरोप गलत हैं तो सच सामने आना चाहिए और यदि आरोप सही साबित होते हैं तो दोषियों पर ऐसी कार्रवाई होनी चाहिए जो आने वाले समय में उदाहरण बन सके।
फिलहाल प्रशासन की चुप्पी, लेकिन सवालों का शोर तेज
इस पूरे मामले में अभी तक प्रशासन की ओर से कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। लेकिन सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो ने इतना जरूर कर दिया है कि अब सवाल फाइलों के पन्नों तक सीमित नहीं हैं। सवाल सड़क पर हैं, जनता के बीच हैं और व्यवस्था के दरवाजे पर दस्तक दे रहे हैं।
फिलहाल यह स्पष्ट करना जरूरी है कि वायरल वीडियो में लगाए गए आरोप परिजनों के दावे हैं, जिनकी आधिकारिक पुष्टि और जांच अभी बाकी है। लेकिन इतना तय है कि इस वीडियो ने एक बार फिर उस व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं, जिसका उद्देश्य बच्चों और परिवारों को संरक्षण देना है।
अब निगाहें प्रशासन पर टिकी हैं। लोग जानना चाहते हैं कि यह मामला भी जांच के आश्वासन में सिमट जाएगा या फिर जिम्मेदारों तक जवाबदेही की आंच पहुंचेगी।
न्यूज़ रिपोर्ट पूछ रहा सवाल बनकर पीड़ितों की आवाज की अगर एक पिता को अपने बेटे तक पहुंचने के लिए भी कीमत चुकाने का आरोप लगाना पड़े, तो आखिर व्यवस्था किसके लिए है? और इसके ज़िम्मेदार कौन है?
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