संकट मोचन में उमड़ा आस्था का सैलाब हनुमान जयंती पर भक्तों ने मांगा संकटों से मुक्ति का आशीर्वाद
वाराणसी आस्था की नगरी वाराणसी में गुरुवार को हनुमान जयंती के अवसर पर भक्ति और श्रद्धा का अद्भुत संगम देखने को मिला। शहर के प्रसिद्ध संकट मोचन मंदिर में तड़के सुबह से ही श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लग गईं। मंदिर परिसर जय बजरंगबली और संकट मोचन हनुमान के जयकारों से गूंज उठा। भक्तों ने विधि विधान से पूजा अर्चना कर अपने जीवन के कष्टों से मुक्ति और सुख समृद्धि की कामना की।
चैत्र पूर्णिमा पर मनाई गई हनुमान जयंती
हिंदू पंचांग के अनुसार चैत्र मास की पूर्णिमा तिथि को हनुमान जयंती मनाई जाती है और वर्ष 2026 में यह पर्व 2 अप्रैल को मनाया गया। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन भगवान हनुमान का जन्म हुआ था जिन्हें शक्ति भक्ति और सेवा का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन सच्चे मन से पूजा करने व्रत रखने और हनुमान जी की कथा का पाठ करने से सभी प्रकार के संकट दूर होते हैं और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
संकट मोचन मंदिर बना आस्था का केंद्र
वाराणसी का संकट मोचन मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल ही नहीं बल्कि आस्था और विश्वास का प्रमुख केंद्र है। यहां यह मान्यता प्रचलित है कि जो भी भक्त सच्चे मन से हनुमान जी के चरणों में अपनी प्रार्थना रखता है उसके सभी संकट दूर हो जाते हैं। यही कारण है कि इस मंदिर का नाम संकट मोचन पड़ा। हनुमान जयंती के अवसर पर यहां विशेष पूजा हनुमान चालीसा पाठ और भंडारे का आयोजन किया गया जिसमें हजारों श्रद्धालु शामिल हुए।
पौराणिक मान्यता और जन्म कथा
पौराणिक कथाओं के अनुसार हनुमान जी का जन्म माता अंजना और वानरराज केसरी के यहां हुआ था। माता अंजना पूर्व जन्म में एक अप्सरा थीं जिन्हें श्राप के कारण पृथ्वी पर वानर रूप में जन्म लेना पड़ा। इस श्राप से मुक्ति पाने के लिए उन्होंने भगवान शिव की कठोर तपस्या की और उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर उन्हें पुत्र प्राप्ति का वरदान मिला।
इसी दौरान अयोध्या के राजा दशरथ पुत्रेष्टि यज्ञ कर रहे थे जिससे प्राप्त दिव्य खीर का एक अंश एक पक्षी द्वारा उड़ाकर ले जाया गया और पवन देव की सहायता से वह माता अंजना के हाथों में गिरा। माता अंजना ने उसे प्रसाद मानकर ग्रहण किया जिसके प्रभाव से चैत्र पूर्णिमा के दिन हनुमान जी का जन्म हुआ। पवन देव के कारण ही उन्हें पवनपुत्र कहा जाता है।
बाल्यकाल की अद्भुत कथा
हनुमान जी के बाल्यकाल की कथा उनके अद्भुत साहस को दर्शाती है। कहा जाता है कि बचपन में उन्होंने सूर्य को फल समझकर निगलने का प्रयास किया। तब देवराज इंद्र ने उन्हें रोकने के लिए वज्र से प्रहार किया जिससे वे मूर्छित होकर गिर पड़े। इस घटना से क्रोधित होकर पवन देव ने वायु का प्रवाह रोक दिया जिससे सृष्टि में संकट उत्पन्न हो गया। बाद में सभी देवताओं ने उन्हें विभिन्न शक्तियों का वरदान देकर पुनर्जीवित किया।
रामायण में महत्वपूर्ण भूमिका
रामायण और रामचरितमानस में हनुमान जी की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। वे भगवान राम के परम भक्त और दूत के रूप में जाने जाते हैं। लंका दहन संजीवनी बूटी लाना और सीता माता की खोज जैसे अनेक कार्यों में उनकी वीरता और भक्ति का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है। उनकी निष्ठा और समर्पण को आदर्श के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
पूजा और कथा का महत्व
धार्मिक मान्यता है कि हनुमान जयंती के दिन व्रत रखकर कथा पढ़ने और हनुमान चालीसा का पाठ करने से शनि दोष और मंगल दोष का प्रभाव कम होता है। यह दिन आत्मविश्वास साहस और सकारात्मक ऊर्जा को बढ़ाने के लिए भी विशेष माना जाता है। हनुमान जी का स्मरण जीवन के कष्टों को दूर करने वाला माना गया है और श्रद्धालु इसी विश्वास के साथ पूजा अर्चना करते हैं।
आस्था और श्रद्धा का उत्सव
हनुमान जयंती केवल एक धार्मिक पर्व नहीं बल्कि आस्था शक्ति और भक्ति का प्रतीक है। संकट मोचन मंदिर में उमड़ी भीड़ इस बात का प्रमाण है कि लोगों की आस्था आज भी अटूट है। भक्तों के हाथों में प्रसाद और मन में विश्वास के साथ हर कोई बजरंगबली के चरणों में अपनी प्रार्थना अर्पित करता नजर आया। यह पर्व समाज को साहस सेवा और समर्पण का संदेश भी देता है।
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