लोकसभा में महिला आरक्षण विधेयक गिरा दो तिहाई बहुमत से 54 वोट कम सत्ता और विपक्ष में तीखी टकराहट
नई दिल्ली: संसद के विशेष सत्र के दौरान बहुप्रतीक्षित महिला आरक्षण से जुड़े 131वें संविधान संशोधन विधेयक को लोकसभा में आवश्यक समर्थन नहीं मिल सका और अंततः यह प्रस्ताव गिर गया। इस घटनाक्रम ने देश की लगभग आधी आबादी से जुड़ी उम्मीदों को गहरा झटका दिया है। शुक्रवार शाम को हुई वोटिंग में बिल के पक्ष में 298 और विरोध में 230 वोट पड़े जबकि इसे पारित कराने के लिए कुल 352 मतों की आवश्यकता थी। इस प्रकार विधेयक निर्धारित सीमा से 54 वोट पीछे रह गया और संसद में बहुमत के अभाव में पारित नहीं हो सका।
मतदान के आंकड़ों ने साफ किया गणित
लोकसभा अध्यक्ष ने मतदान के विस्तृत आंकड़े साझा करते हुए बताया कि कुल 528 सदस्यों ने इस महत्वपूर्ण प्रक्रिया में भाग लिया। पहले चरण की वोटिंग में 489 वोट पड़े थे जिनमें 278 समर्थन में और 211 विरोध में थे। इसके बाद अंतिम चरण में भी समर्थन अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंच सका। चूंकि यह एक संवैधानिक संशोधन विधेयक था इसलिए इसे पारित कराने के लिए दो तिहाई बहुमत अनिवार्य था। हालांकि सरकार इस जरूरी संख्या को जुटाने में सफल नहीं हो पाई जिससे विधेयक गिर गया।
सदन में दिखी तीखी राजनीतिक टकराहट
इस विधेयक को लेकर लोकसभा में पहले से ही सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखा वैचारिक संघर्ष देखने को मिल रहा था। सरकार इसे महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को मजबूत करने की दिशा में ऐतिहासिक पहल बता रही थी और प्रधानमंत्री ने सभी दलों से इस बिल का समर्थन करने की अपील भी की थी। इसके बावजूद विपक्ष के कई दलों ने प्रस्ताव के विभिन्न पहलुओं पर आपत्तियां दर्ज कराईं जिससे सहमति का माहौल नहीं बन सका।
परिसीमन पर सरकार का जोर
बहस के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री ने परिसीमन की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि देश के अलग अलग संसदीय क्षेत्रों में मतदाताओं की संख्या में भारी असमानता है। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि कहीं एक सांसद पर 49 लाख मतदाताओं की जिम्मेदारी है तो कहीं केवल 60 हजार मतदाता हैं। इस तरह की असमानता जनप्रतिनिधियों के कार्य को प्रभावित करती है। उनके अनुसार परिसीमन की प्रक्रिया इसी असंतुलन को दूर करने के लिए समय समय पर अपनाई जाती रही है और इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
विपक्ष ने बताया छलावा
वहीं विपक्ष की ओर से इस विधेयक का कड़ा विरोध किया गया। विपक्ष के नेता ने इसे छलावा करार देते हुए कहा कि यह प्रस्ताव महिलाओं को वास्तविक रूप से सशक्त करने के बजाय राजनीतिक रणनीति का हिस्सा अधिक लगता है। उन्होंने यह भी कहा कि पहले भी महिला आरक्षण से जुड़े प्रस्तावों के क्रियान्वयन में देरी के संकेत मिल चुके हैं और वर्तमान विधेयक भी उसी दिशा में एक और कदम हो सकता है।
राजनीतिक गणित पर उठे सवाल
विपक्ष का यह भी आरोप रहा कि इस विधेयक के साथ परिसीमन को जोड़कर देश के चुनावी नक्शे में व्यापक बदलाव की तैयारी की जा रही है। उनके अनुसार इससे राजनीतिक संतुलन प्रभावित हो सकता है और यह केवल महिलाओं के प्रतिनिधित्व का मुद्दा नहीं बल्कि इसके पीछे जटिल राजनीतिक गणित भी छिपा हुआ है। विपक्ष ने इस प्रस्ताव को मूल मुद्दों से ध्यान भटकाने की कोशिश के रूप में भी देखा।
लोकतांत्रिक विमर्श पर व्यापक असर
महिला आरक्षण विधेयक का इस तरह गिरना न केवल एक राजनीतिक घटना है बल्कि इसका सामाजिक और लोकतांत्रिक विमर्श पर भी व्यापक प्रभाव पड़ने की संभावना है। यह मुद्दा लंबे समय से चर्चा में रहा है और इससे जुड़ी उम्मीदें देशभर की महिलाओं के बीच गहराई से जुड़ी रही हैं। ऐसे में इसका पारित न होना कई सवाल खड़े करता है।
आगे की राह पर टिकी निगाहें
अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार इस विधेयक को भविष्य में नए स्वरूप में फिर से प्रस्तुत करती है या यह मुद्दा फिलहाल ठंडे बस्ते में चला जाता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस विषय पर सहमति बनाना आसान नहीं होगा लेकिन इसकी आवश्यकता लगातार बनी रहेगी। फिलहाल संसद में हुए इस घटनाक्रम ने सत्ता और विपक्ष के बीच गहरे मतभेद को एक बार फिर उजागर कर दिया है और आने वाले समय में इस मुद्दे पर बहस जारी रहने की संभावना है।
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